शेर-ए-गढ़वाल कप्तान राम प्रसाद नौटियाल की 121 वीं जयंती
कप्तान राम प्रसाद नौटियाल को पुष्पांजलि अर्पित कर याद किया
शेर-ए-गढ़वाल कप्तान राम प्रसाद नौटियाल के कृतित्व एवं व्यक्तित्व को याद किया शेर-ए-गढ़वाल कप्तान राम प्रसाद नौटियाल के गांव में स्थापित हो एक संग्रहालय शेर-ए-गढ़वाल कप्तान राम प्रसाद नौटियाल सहित विभिन्न हस्तियों के कृतित्व एवं व्यक्तित्व को पाठ्यक्रम में किया जाए शामिल
देहरादून। (शनिवार, 01 अगस्त 2026) कप्तान राम प्रसाद नौटियाल विचार मंच देहरादून के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में शेर-ए-गढ़वाल कप्तान राम प्रसाद नौटियाल की 121 वीं जयंती पर याद करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व को याद करते हुए वक्ताओं ने भावी पीढ़ी को अपने श्रेष्ठ व्यक्तित्वों का ज्ञान करवाने के लिए शेर-ए-गढ़वाल कप्तान राम प्रसाद नौटियाल सहित विभिन्न हस्तियों के कृतित्व एवं व्यक्तित्व को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। जिला पंचायत हाल में कर्नल सी.एम. नौटियाल की अध्यक्षता आयोजित कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री, तीरथ सिंह रावत तथा मुख्य वक्ता डॉ योगेश धस्माणा थे। शोधपरक विचार गोष्ठी में पूर्व मुख्यमंत्री, तीरथ सिंह रावत ने कहा कि कप्तान रामप्रसाद नौटियाल वीर सैनानी की तरह लड़े इसीलिए शेर-ए-गढ़वाल कहलाये। वर्तमान व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि, हमने आजादी तो हासिल की लेकिन आजादी का सपना अभी अधूरा है। आजादी के बाद देश में बढ़ता भ्रष्टाचार चिंता का सबब है। संस्कार ऊपर से नीचे की ओर चलते हैं, यदि नेतृत्व करने वाले चाहें तो अधीनस्थ अधिकारियों की भ्रष्टाचार करने की हिम्मत नहीं कर सकता।
मुख्य वक्ता डॉ धस्माणा ने शेर-ए-गढ़वाल कप्तान राम प्रसाद नौटियाल के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शेर-ए-गढ़वाल कप्तान राम प्रसाद नौटियाल के 1942 में गुजडु में प्रचण्ड आन्दोलन किया गया था। गुजडु आन्दोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली तथा उनके प्रचण्ड आन्दोलन के कारण ही गुजडु को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। कप्तान राम प्रसाद एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व थे। कप्तान नौटियाल हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, संघर्ष और देशभक्ति की जीवंत मिसाल हैं। उनके त्याग, संघर्ष और राष्ट्र के प्रति समर्पण को जितना याद किया जाए, उतना ही कम है।
उन्होंने कहा कि, यदि हृदय में स्वतंत्रता को महसूस करने भाव समाप्त हो जाते हैं तो उन्माद में बदल कर बंजरता को जन्म देती है। बांज स्वतंत्रता कभी भी संस्कार युक्त नहीं हो सकती है। इस अवसर पर गोष्ठी में उपस्थित अनेक विद्वान एवं बुद्धिजीवी वक्ताओं ने अपने विचार रखे और स्वतंत्रता आंदोलन में कप्तान नौटियाल के अतुलनीय योगदान को श्रद्धापूर्वक याद किया।
विचार गोष्ठी में वक्ताओं द्वारा उनके मूल गांव कांडा मल्ला, बीरोंखाल में उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए एक संग्रहालय स्थापित किए जाने की मांग भी उठाई गयी। जिससे हमारी आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों और अपनी गौरवशाली विरासत से जोड़ने का संकल्प प्राप्त हो सके l आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, तो हमें अपने महान आजादी के वीरों को नहीं भूलना चाहिए। आजादी की नींव हमारे असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, संघर्ष और बलिदान पर रखी गई है। उनके योगदान का भावी पीढ़ी को ज्ञान कराने के लिए इस प्रकार के कार्यक्रम व्यापक स्तर पर आयोजित होने चाहिए।
वक्ताओं ने कार्यक्रम के संयोजक राज्य आंदोलनकारी नंदकिशोर नौटियाल का विशेष आभार व्यक्त करते हुए कहा कि, वो एक महान स्वतंत्रता सेनानी की स्मृतियों को जीवंत रखते हुए उनके संघर्ष और योगदान को आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाने का पुनीत पुण्य कार्य कर रहे हैं। इस पुण्य कार्य के लिए वो बधाई के पात्र हैं।
विचार गोष्ठी में पूर्व राज्य सूचना आयुक्त डॉ विपिन घिल्डियाल, डॉ प्रकाश चमोली, डॉ एस.एस. असवाल, एडवोकेट कृष्णानंद मैठानी, प्रदीप रावत, वरिष्ठ पत्रकार नागेंद्र उनियाल, सुनीता विद्यार्थी, मनीष सुन्दरियाल आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
विचार गोष्ठी का संचालन सुभाष चन्द्र नौटियाल ने किया।

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