एक सैनिक के उद्गार
उर्दलेप ग्लेशियर से
(4 अगस्त 1984 का भाव पक्ष)
सैनिक की मुस्कान
ले.कर्नल बुद्धि बल्लभ ध्यानी (अवकाश प्राप्त)
ओ! सेनानी, सज धज कर, तुम कहां जा रहे हो
कुछ तो दम लो
कौन है तुम्हारे इंतज़ार में
जो तुम बिन, बिना उत्तर दिए, चले जा रहे रहे हो।
हे कर्मवीर! सुनो जरा, निर्जन है यह मार्ग
नहीं कोई जाता वहां
न होती है धरती, न पौधे न हवा
लौट चलो
वहां होती है सिर्फ बर्फ
और होती हैं प्राण घातक बौछारें
और बताऊं
अगर सुनो तो
न वहां कोई जीवन, न जीया है वहां कोई
मौत भी मौत है चारों तरफ
अरे ! सुनो तो
तुम चले जा रहे हो
सुना है नटखट है वहां प्रकृति
होते रहते हैं हर क्षण परिवर्तन
बर्फ की नदियां बहती हैं
और टूटते रहते बर्फ के पहाड़
टिक न सकोगे क्षणभर
अब तुम्हारी इच्छा
पर एक बात और सुनो
वहां कभी शंकर रहते थे
पार्वती के साथ
ऊंचे शिखर से
सबकी रक्षा करते थे।
पर उसके बाद वहां न कोई गया
फिर तुम अकेले हो।
क्या तुम्हें, काम सौंप दिया शंकर ने
और तुमने व्रत ले लिया है
देश रक्षा का
तब तो ठीक है
हे पार्थ!
मैं भी रक्षा करूंगी
यहीं पर तुम्हारे इंतज़ार में
और बिछाऊंगी श्रद्धा के फूल
लौटते मार्ग में
ओ सैनानी!
मैं धन्य हो गयी
कम से कम तुम
मुस्करा तो दिये
यह मेरी भूल है
तुम तो सदा ही
मुस्काराते ही रहते हो
क्योंकि !
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
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