पर्यटन के क्षेत्र में केदारखण्डीय प्राचीन कला का संभावित योगदान
डा0 निहारिका अग्रवाल
कला, संस्कृति एवं साहित्य किसी भी देश, राज्य अथवा समाज का दर्पण होते हैं, जो वहॉं के परिवेश एवं रीति रिवाजों से अवगत करवाता है। जिस प्रकार विश्व में भारतीय संस्कृति, धर्म एवं संस्कारों का अपना विशिष्ट स्थान रहा है, उसी प्रकार भारतीय संस्कृति में गढ़वाल का भी अपना विशेष स्थान सर्वविदित है। ’पुराण वाड्.मय में गढ़वाल को केदारखण्ड के नाम से उल्लिखित किया गया है। केदारखण्ड स्कन्दपुराण का एक भाग है जो 206 अध्यायों में उपनिबद्ध है। केदारखण्ड पुराण में गढ़वाल के सम्पूर्ण तीर्थों का वर्णन है।’ 1 केदारखण्ड में श्वेताख्यपर्वत अर्थात हिमालय के पॉंच खण्ड होने का संकेत मिलता है ये खण्ड हैं-ं 1. मानस, 2. नेपाल, 3. कश्मीर 4. जालन्धर, 5. केदार
यथा - तीर्थाणि प्रवराश्येव श्वेताख्ये पर्वतोत्मे।
अग्रेमानस प्रस्तावे यथा नेपालके मुने।।
काश्मीरे चैव प्रस्तावे जालाध्रि वै यथा पुनः।
यथा केदार प्रस्तावे कथितानि मयाडद्यत
केदारखण्ड 204/56-57 2
वर्तमान समय में गढ़वाल मण्डल को 7 जिलों में विभाजित किया गया है - ’पौड़ी, चमोली, देहरादून, हरिद्वार, रूद्रप्रयाग, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी’ 3 यहॉं मुख्यतः हिन्दी और गढ़वाली भाषाएॅं बोली जाती हैं। हमारा गढ़वाल मण्डल दो भागों में विभक्त है - पौड़ी गढ़वाल, एवं टिहरी गढ़वांल उपरोक्त दृष्टिकोण से स्पष्ट होता है कि हमारी केदारखण्डीय (गढ़वाली) संस्कृति अत्यन्त प्राचीन एवं विशाल है जिसे चंद शब्दों में बॉंध पाना असंभव है। यहॉं के प्राकृतिक सौन्दर्य, सदैव हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाएँ , अद्वितीय तीर्थधाम एवं धार्मिक स्थल स्वयं को आत्मिक शान्ति तथा संतोष प्रदान करने के साथ ही असंख्य पर्यटकों को वर्ष भर आकर्षित करते हैं, जिससे व्यापार को बढ़ावा मिलता है और हम आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं। किन्तु पर्यटन की दृष्टि से गढ़वाल का यह पर्वतीय अंचल अभी तक उपेक्षित रहा है। धार्मिक दृष्टि से इस देवभूमि का अतीत जितना महत्वपूर्ण एवं गौरवशाली रहा है उसकी तुलना में पर्यटन की दृष्टि से उसका मूल्यांकन नहीं किया गया है। प्रतिवर्ष देश के विभिन्न अंचलों से आने वाले लाखों तीर्थयात्री अपने धार्मिक अभीष्ट की पूर्ति करके, यहॉं के रमणीय प्राकृतिक एवं दर्शनीय स्थलों को देखकर अभिभूत तो होते हैं, किंतु यहॉं की कलात्मक संस्कृति से अनभिज्ञ रह जाते हैं। इस प्रकार उन्हें एक पंथ दो काज का दोहरा लाभ प्राप्त नहीं होता।
कलात्मक सौन्दर्य चित्रकला के दृष्टिकोण से - चित्रकला के दृष्टिकोण से केदारखण्ड में कला का विकास शैलचित्रों के रूप में आरम्भ होता है। यहॉं अनेक स्थानों पर शैलचित्र प्राप्त हुए हैं, परन्तु पर्वतीय अंचल की उपेक्षा के कारण गढ़वाल चित्रकला के विषय में कुछ स्थानीय नागरिकों के अतिरिक्त अन्य प्रान्तीय लोगों में भी इनके ज्ञान का अभाव है। उदाहरण स्वरूप ’गवारख्या की गुफा, किमनी गॉंव के शैलचित्र एवं हुडली गुफा के शैलचित्रों’ 4 के विषय में गढ़वाल में निवसित कुछ लोगों को ही ज्ञान प्राप्त है। इन गुफाओं के अतिरिक्त भी संभवतः और भी शैलचित्र केदारखण्ड में उपलब्ध होंगे जो वर्तमान समय में उपेक्षित होंगे। कलात्मक दृष्टिकोण से यदि ’चमोली की ग्वारख्या गुफा का अध्ययन किया जाय तो वहॉं अनेक पशुओं के चित्र मिलते हैं जो अल्मोड़ा की लाखु गुफा से अधिक चटकीले हैं। चमोली के ही किमनी गॉंव के शैलचित्रों में हथियारों एवं पशुओं के चित्र हैं, जिन्हें सफेद रंग से रंगा गया है। उत्तरकाशी की हुडली गुफा के शैलचित्रों में नीले रंग का प्रयोग किया गया है।’ 5 इसके पश्चात् ’इस राज्य का इतिहास 1658 ई. से आरम्भ होता है।’ 6 16वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक केदारखण्ड में चित्रकला की ’गढ़वाली शैली’ प्रचलित थी। गढ़वाली शैली पहाड़ी शैली का ही एक भाग है, जिसका विकास गढ़वाल नरेशों के संरक्षण में हुआ। अनेक पुस्तकों में उल्लेख मिलता है कि औरंगजेब की सेना से बचने के लिए सुलेमान शिकोह ने सत्रह होगों के साथ गढ़वाल के राजा पृथ्वीशाह के यहॉं शरण ली थी। इन्हीं सत्रह लोगों में मौलाराम के पूर्वज श्यामदास और उनके पुत्र हरदार (कैहरदार) थे। ये दोनों व्यक्ति दिल्ली के चित्रकार थे। जब सुलेमान शिकोह को पृथ्वीशाह ने मुगल सेना को सौंप दिया तब श्यामदास और हरदास गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर में ही बस गए। इस प्रकार गढ़वाल राज्य में इन दोंनों चित्रकारों के द्वारा पुनः चित्रकारी का कार्य आरम्भ हुआ। ’हरदास के पुत्र हीरानन्द, हीरानन्द के पुत्र मंगतराम पीढ़ी दर पीढ़ी चित्रांकन करते रहे। इसी कड़ी में मंगतराम के घर 1743 ई. में मौलाराम का जन्म हुआ। इन्हीं मौलाराम ने गढ़वाल के चित्रकारों में अत्यधिक ख्याति प्राप्त की। मौलाराम चित्रकार होने के साथ ही एक अच्छा कवि भी था और उसके द्वारा रचित चित्र तथा काव्य दोनों के उदाहरण प्राप्त हैं। 7 डा0 गिर्राज किशोर अग्रवाल की पुस्तक ’कला और कलम’ के पृष्ठ 230 पर उल्लेख किया गया है कि ’मौलाराम मुगल शैली का एक कुशल किन्तु कल्पनाहीन कारीगर मात्र था। वह कॉंगड़ा भी गया था और कॉंगड़ा कला से प्रभावित भी हुआ था। यह घटना संभवतः 1771 ई. के पश्चात् की है क्योंकि इसी समय से वह कॉंगड़ा शैली में कार्य करने लगा। इससे पूर्व का उसका एक चित्र ’मस्तानी’ मुगल ढ़ंग का है। उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि मौलाराम की कृतियों में मुगल एवं कॉंगड़ा कला का सम्मिश्रण था। गढ़वाल चित्रकला में
कहीं-कहीं पर मानकू एवं चैतू नामक दो अन्य चित्रकारों की भी चर्चा मिलती है परन्तु इन कलाकारों के विषय में कोई विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है।
अब तक की गई चर्चा से यह स्पष्ट होता है कि हमारी केदारखण्डीय संस्कृति और कला का अटूट सम्बन्ध रहा है, दोनों एक दूसरे की पूरक रही हैं, परन्तु उपेक्षा के कारण वर्तमान समय में लोगों के मध्य
गढ़वाली चित्रशैली के ज्ञान का अभाव है। इसी कारण विश्वपटल पर जहॉं हमारी केदारखण्डीय संस्कृति मानव की धार्मिक एवं प्राकृतिक तृष्णा को शान्त करती है, वहीं कला के विषय में अधिक ज्ञान के विस्तार की आवश्यकता है। यदि हम शैलचित्रों एवं गढ़वाली चित्रशैली के चित्रों के विषय में ज्ञान का विस्तार वैश्विक रूप से करें तो संभवतः पर्यटन के क्षेत्र में भी हम और अधिक विस्तार कर सकेंगे। इस प्रकार हम पर्यटकों को धर्म, संस्कृति, प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ ही कलात्मक रसानुभूति प्रदान कर दोहरा लाभ प्रदान कर सकेंगे।
कलात्मक सौन्दर्य चित्रकला के दृष्टिकोण से - चित्रकला के दृष्टिकोण से केदारखण्ड में कला का विकास शैलचित्रों के रूप में आरम्भ होता है। यहॉं अनेक स्थानों पर शैलचित्र प्राप्त हुए हैं, परन्तु पर्वतीय अंचल की उपेक्षा के कारण गढ़वाल चित्रकला के विषय में कुछ स्थानीय नागरिकों के अतिरिक्त अन्य प्रान्तीय लोगों में भी इनके ज्ञान का अभाव है। उदाहरण स्वरूप ’गवारख्या की गुफा, किमनी गॉंव के शैलचित्र एवं हुडली गुफा के शैलचित्रों’ 4 के विषय में गढ़वाल में निवसित कुछ लोगों को ही ज्ञान प्राप्त है। इन गुफाओं के अतिरिक्त भी संभवतः और भी शैलचित्र केदारखण्ड में उपलब्ध होंगे जो वर्तमान समय में उपेक्षित होंगे। कलात्मक दृष्टिकोण से यदि ’चमोली की ग्वारख्या गुफा का अध्ययन किया जाय तो वहॉं अनेक पशुओं के चित्र मिलते हैं जो अल्मोड़ा की लाखु गुफा से अधिक चटकीले हैं। चमोली के ही किमनी गॉंव के शैलचित्रों में हथियारों एवं पशुओं के चित्र हैं, जिन्हें सफेद रंग से रंगा गया है। उत्तरकाशी की हुडली गुफा के शैलचित्रों में नीले रंग का प्रयोग किया गया है।’ 5 इसके पश्चात् ’इस राज्य का इतिहास 1658 ई. से आरम्भ होता है।’ 6 16वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक केदारखण्ड में चित्रकला की ’गढ़वाली शैली’ प्रचलित थी। गढ़वाली शैली पहाड़ी शैली का ही एक भाग है, जिसका विकास गढ़वाल नरेशों के संरक्षण में हुआ। अनेक पुस्तकों में उल्लेख मिलता है कि औरंगजेब की सेना से बचने के लिए सुलेमान शिकोह ने सत्रह होगों के साथ गढ़वाल के राजा पृथ्वीशाह के यहॉं शरण ली थी। इन्हीं सत्रह लोगों में मौलाराम के पूर्वज श्यामदास और उनके पुत्र हरदार (कैहरदार) थे। ये दोनों व्यक्ति दिल्ली के चित्रकार थे। जब सुलेमान शिकोह को पृथ्वीशाह ने मुगल सेना को सौंप दिया तब श्यामदास और हरदास गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर में ही बस गए। इस प्रकार गढ़वाल राज्य में इन दोंनों चित्रकारों के द्वारा पुनः चित्रकारी का कार्य आरम्भ हुआ। ’हरदास के पुत्र हीरानन्द, हीरानन्द के पुत्र मंगतराम पीढ़ी दर पीढ़ी चित्रांकन करते रहे। इसी कड़ी में मंगतराम के घर 1743 ई. में मौलाराम का जन्म हुआ। इन्हीं मौलाराम ने गढ़वाल के चित्रकारों में अत्यधिक ख्याति प्राप्त की। मौलाराम चित्रकार होने के साथ ही एक अच्छा कवि भी था और उसके द्वारा रचित चित्र तथा काव्य दोनों के उदाहरण प्राप्त हैं। 7 डा0 गिर्राज किशोर अग्रवाल की पुस्तक ’कला और कलम’ के पृष्ठ 230 पर उल्लेख किया गया है कि ’मौलाराम मुगल शैली का एक कुशल किन्तु कल्पनाहीन कारीगर मात्र था। वह कॉंगड़ा भी गया था और कॉंगड़ा कला से प्रभावित भी हुआ था। यह घटना संभवतः 1771 ई. के पश्चात् की है क्योंकि इसी समय से वह कॉंगड़ा शैली में कार्य करने लगा। इससे पूर्व का उसका एक चित्र ’मस्तानी’ मुगल ढ़ंग का है। उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि मौलाराम की कृतियों में मुगल एवं कॉंगड़ा कला का सम्मिश्रण था। गढ़वाल चित्रकला में
कहीं-कहीं पर मानकू एवं चैतू नामक दो अन्य चित्रकारों की भी चर्चा मिलती है परन्तु इन कलाकारों के विषय में कोई विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है।
अब तक की गई चर्चा से यह स्पष्ट होता है कि हमारी केदारखण्डीय संस्कृति और कला का अटूट सम्बन्ध रहा है, दोनों एक दूसरे की पूरक रही हैं, परन्तु उपेक्षा के कारण वर्तमान समय में लोगों के मध्य
गढ़वाली चित्रशैली के ज्ञान का अभाव है। इसी कारण विश्वपटल पर जहॉं हमारी केदारखण्डीय संस्कृति मानव की धार्मिक एवं प्राकृतिक तृष्णा को शान्त करती है, वहीं कला के विषय में अधिक ज्ञान के विस्तार की आवश्यकता है। यदि हम शैलचित्रों एवं गढ़वाली चित्रशैली के चित्रों के विषय में ज्ञान का विस्तार वैश्विक रूप से करें तो संभवतः पर्यटन के क्षेत्र में भी हम और अधिक विस्तार कर सकेंगे। इस प्रकार हम पर्यटकों को धर्म, संस्कृति, प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ ही कलात्मक रसानुभूति प्रदान कर दोहरा लाभ प्रदान कर सकेंगे।

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