पव्वा दर्शन - TOURIST SANDESH

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बुधवार, 30 जनवरी 2019

पव्वा दर्शन

पव्वा दर्शन

राजनीति में पव्वे का बहुत महत्व है। जिस प्रकार  साहित्य समाज का दर्पण है उसी प्रकार पव्वा राजनीति का वास्तविक प्रतिबिम्ब है। बिन राजनीति पव्वा हासिल नहीं होता तथा बिन पव्वे की राजनीति अस्तित्वहीन है। राजनीति समाज के कमजोर तबके की आवाज बुलन्द करने की राह है, ऐसी बातें खामख्याली हैं। आधुनिक परिभाषा में राजनीति पव्वा या पॉवर हासिल करने का मार्ग मात्र है जिसमें समाज के कमजोर तबके के लोग आधार बनते हैं तो चारण-भाट ढाल बनकर मजबूती प्रदान करते हैं। पव्वा दर्शन के अनुसार राजनीति की आत्मा पव्वा यानि पावर में निहित है। राजनीति की आत्मा पव्वे में बसती है। पव्वा राजनीति की आस है, इसीलिए व्यक्तित्व जब बेपेंदी के लोटे होने लगते हैं तो राजनीति से आत्मसात् कर लेते हैं। राजनीति के आचार्य बुड़बक होकर शोषितों, वंछितों, कमजोर के रसताल में ध्वनि बनकर फेरी लगाते हैं, भले ही वे शोषितों वंछितों से सदैव दूरी बनाये रखते हैं परन्तु दिन-रात उन्हीं की फेरी लगाकर समाज में चक्कर काटते हैं। जो पत्रकार, लेखक, साहित्यकार किसी राजनीतिक पंडित की खडाऊं बन जाता है। वास्तव में वही जग प्रसिद्ध हो पाता है। उन पर पव्वा कमाल बन कर बरसता है, वे मालामाल होते हैं तो आचार्य जी सरताल। समीक्षक राजनीति के पंडितों के गुणगाते हैं तो खडाऊं पर चर्चा करते हैं। जो पव्वा दर्शन में फिट बैठते हैं इतिहास उन्हें युग-निर्माता बताता है तो चारण-भाट मसीहा कह कर फूले नहीं समाते हैं। पव्वा पॉवर का सड़क छाप दर्शन है जिसके तीन प्राय होते हैं चारण-भाट राजनीतिक पंडितों के पव्वे होते हैं जो कि आमजन को पॉवर का एहसास कराते हैं। पव्वा सत्ता का प्राय भी है जो पॉवर का एहसास कराती है तो पव्वा शराब का भी होता है जो कि राजनीतिक पंडितों के लिए सत्ता का मार्ग प्रशस्त करता है। इस कलयुग में वही पव्वा दर्शन का हकदार है जो कि, पव्वों से आत्मसात् करने की कला में माहिर हैं। पव्वा सत्ता की हनक भी है जो कि, पव्वा यानि पॉवर के रूप में प्रकट होकर डराती भी है। पव्वा दर्शन ऐसा लीलाधारी है जो कि अनेकों स्वरूप में प्रकट होकर दिव्य बन जाता है। दैहिक, दैविक और भौतिक ताप को हरने वाला पव्वा दर्शन विमुखों के लिए दुर्लभ है। यदि संसारिक दुःखों से मुक्ति पाना है तो पव्वा दर्शन से आत्मसात् करना चाहिए। सत्ता की गलियों में पव्वा प्रमियों की कमी नहीं है, इनकी नाक मीलों दूर से पव्वा सुगन्ध को सुंघ लेती है। इधर पव्वा खुला और उधर पव्वा दर्शन चालू हुआ। पव्वा दर्शन से आत्मसात् करने वाले ही वास्तव में सत्ता के आयोजक, वियोजक, नियोजक तथा अभियोजक होते हैं। सत्ता की धुरी उनके ही आस-पास घूमती है। देश-विदेश तथा अंतरराष्ट्रीय घटना क्रम पव्वा दर्शन से ही संभव है। कौन, कब, कहां, कैसे फिट होगा इसका नियंत्रक पव्वे ही होते हें। वास्तव में  कलयुग में पव्वा दर्शन दिव्यता लिए हुए है, जो सत्ता का एहसास कराते हुए सांसारिक सुखों के लिए आधार स्तंभ है। अतः पव्वा दर्शन से आत्मसात् किजिए और जीवन में सुखी रहिऐ।

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