मालू सालू संस्कृति से निकली रोजगार की राह - TOURIST SANDESH

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गुरुवार, 24 जनवरी 2019

मालू सालू संस्कृति से निकली रोजगार की राह

मालू सालू संस्कृति से निकली रोजगार की राह

  1. सरकार को दिखाया आईना , पलायन को मात देने की बताई राह
  2. रिखणीखाल (पौड़ी गढ़वाल) में देवेश आदमी ने लगाई मालू , कंधार के पत्तों की पत्तल-दोने की यूनिट


जिला पौड़ी गढ़वाल के रिखणीखाल ब्लॉक के जुई गांव में देवेश आदमी ने रोजगार सृजन की नई पहल की है। देवेश ने खुद के सोच व समझ से एक मशीन तैयार की है उस मशीन से मालू और कंधार के पत्तल-दोने तैयार किए जा रहे हैं। आमतौर पर यह मशीन बाजार में 8-10 लाख तक है परन्तु देशी जुगाड़ से देवेश आदमी ने मात्र ढाई लाख में यह मशीन तैयार कर स्वरोजगार की नई राह तैयार की है। इस मशीन में कुछ कल पुर्जे ट्रैक्टर व कुछ आटा चक्की के लगे हैं। ग्राम जुई में इस मशीन से मालू तथा कंधार के पत्तों से पत्तल व दोने तैयार कर बाजार में सप्लाई की जा रही है। देवेश आदमी के साथ यूनिट की संचालक सुषमा गुंसाई ‘नीर’ व वीरेन्द्र सिंह नेगी आदि शामिल हैं। ज्ञात हो की सुषमा गुंसाई आंगन बाड़ी कार्यकर्ता तथा लेखिका भी हैं। वीरेन्द्र नेगी कुछ समय पहले नौकरी छोड़कर गांव वापस चले आए थे। पलायन को मात देने के लिए वीरेन्द्र नेगी ने बकरी पालन तथा व्यावसायिक खेती को स्वरोजगार के रूप में अपनाया। देवेश आदमी की पहल पर जुई गांव में एक व्यवसायिक यूनिट लगाई गई इस स्वरोजगार के खुलने से जहां 15 स्थानीय महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराया गया वहीं  स्थानीय संसाधनों का सद्पयोग करते हुए कैसे पलायन को मात दी जा सकती है सरकार को आईना भी दिखाया। पहाड़ों में उद्योग लगाने के लिए बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकार वास्तव में धरातलीय सच्चाई से बहुत दूर खड़ी है। सरकार को देवेश आदमी जैसे उद्यमी से पहाड़ों में स्वरोजगार बढ़ाने के लिए उपायों पर चर्चा करनी चाहिए। ज्ञात हो की देवेश कुछ माह पूर्व नौकरी छोड़कर गांव वापस आ चुके हैं। कुछ करने की चाह ने देवेश को सामाजिक कार्यकर्ता के साथ-साथ रचनात्मक कार्य के लिए प्रेरित किया। देवेश की बालावाला (देहरादून) में एक पहाड़ी उत्पादों की दुकान भी है। जिससे पहाड़ों उत्पादों की सप्लाई की जाती है। देवेश ने बताया की आज उनके द्वारा तैयार की गई मशीन की बाजार में बहुत मांग है। ऐसी मशीने जल्द ही रूद्रप्रयाग और अल्मोड़ा में भी स्थापित करने की तैयारी कर रहे हैं। देवेश ने बताया की यदि हम पहाड़ों में इस प्रकार की यूनिटें लगाते हैं तो यह प्लास्टिक का सशक्त विकल्प हो सकता है। उत्तराखण्ड के बेरोजगारों के लिए यह स्वरोजगार के रूप में बढ़ा विकल्प हो सकता है। आवश्यकता है इस दिशा में सकारात्मक सोच की तथा सरकार द्वारा पहल करने की। 

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