स्व-अनुशासन से सुदृढ़ होगा गणतंत्र - TOURIST SANDESH

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बुधवार, 23 जनवरी 2019

स्व-अनुशासन से सुदृढ़ होगा गणतंत्र

स्व-अनुशासन से सुदृढ़ होगा गणतंत्र

प्रत्येक वर्ष गणतंत्र दिवस पर राजपथ पर आयोजित होने वाली राष्ट्र की सैन्यशक्ति परेड से राष्ट्र का कौन नागरिक आत्मगौरव की अनुभूति नहीं करता होगा? निसंदेह! इस अनुशासित परेड को मनोमुग्धकारी दृश्य प्रत्येक राष्ट्र के नागरिक के अंदर नव ऊर्जा का संचार करते हुए देशभक्ति की भावना को भर देता है। इसकी तैयारी के लिए हमारे वीर जाबांज स्व अनुशासित होकर कई दिनों पूर्व से कड़ी मेहनत, लगन से नियमित अभ्यास करते हैं। इन वीर जांबाजो ं का सिर्फ एक ही लक्ष्य होता है वह जीवन का श्रेष्ठतम प्रदर्शन करना अपनी इन कोशिशों में हमारे जांबाज सदैव खरे उतरते हैं। वास्तव में जांबाजों के स्व-अनुशासन के दम पर ही यह सुंदर, संतुलित मनोहारी राष्ट्र का गौरव को बढ़ाने वाला दृश्य प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस को राष्ट्र के सम्मुख प्रदर्शित होता है। कल्पना कीजिए कि यदि हमारे जांबाजों में स्व-अनुशासन न होता तो क्या इस प्रकार की परेड राजपथ पर संभव है। कदापि नहीं! देश के रक्षा प्रहरियों के स्व-अनुशासन निःसंदेह स्वतुल्य है। इसी स्व- अनुशासन दम पर ही हमारे वीर सैनिक देश की रक्षा करने में समर्थ हैं। राष्ट्र पिता महात्मा गांधी कहते थे कि स्व-अनुशासन ही सफलता की चाबी है। किसी भी राष्ट्र कि उन्नति का मूल आधार उसके अनुशासित नागरिक ही होते हैं। जीवन में स्व-अनुशासन की प्रदर्शित करने के लिए गायत्री महाविद्या के साधक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के शब्दों में ‘हम बदलंगे’ युग बदलेगा, हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा तथा मनः स्थिति बदले तो परिस्थिति सुधरे जैसे आदर्श  वाक्य सूत्र स्व-अनुशासन की महत्ता को प्रतिपादित करते हैं। पं. श्री राम शर्मा आचार्य का स्पष्ट मत था कि, यदि हमें जीवन में काम, क्रोध लोभ, मोह तथा अहंकार जैसी आसुरी प्रवृत्तियों से स्वयं को मुक्त रखना है तो जीवन में स्व-अनुशासन बहुत अनिवार्य है। स्व-अनुशासित होकर ही घर परिवार समाज तथा राष्ट्र को समृद्धि बनाया जा सकता है। स्व-अनुशासन व्यक्तित्व विकास तथा चरित्र निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द का कहना था कि अनुशासन की बात करना उतना असरकारी नहीं होता जितना कि उस पर अमल करने से प्रभावकारी होता है। मेरी आने वाली पीढ़ियों वह नहीं करती जो मैं बोलता हूं बल्कि उसको जीवन में धारण करती हैं जो में स्वयं करता हूँ विश्व में जितने भी महापुरुष हुए हैं, सभी ने अपने जीवन में स्व-अनुशासन को धारण किया है।
स्वयं का जीवन हो या सामाजिक जीवन या राष्ट्र जीवन सदैव स्व-अनुशासन स ही आगे बढ़ता है। जिनके निज जीवन में स्व-अनुशासन नहीं होता, उनके प्रगति के द्वार सदैव बंध रहते हैं। जीवन में स्व-अनुशासन ही सफलता व उन्नति  का आधार है। जीवन में सकारात्मक परिणाम लाने के लिए स्व-अनुशासन नितांत आवश्यक है। स्व-अनुशासन से जीवन में कठिन से कठिन समस्या का सहजता से हल ढूंढा जा सकता है। व्यक्ति की विवेक शक्ति भी स्व-अनुशासन से ही विकसित होती है। स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे कि लक्ष्यों और उपलब्धियों के मध्य सेतु आत्मानुशासन ही है। यदि हमने जीवन में स्वयं के लिए अनुशासन का पालन करना सीख लिया तो दुनिया की कोई भी ताकत हमें लक्ष्यों तक पहुंचने से नहीं रोक सकती है। भारत देश की सभ्यता विश्व की श्रेष्ठतम् सभ्यताओं में है। यह श्रेष्ठतम सभ्यता सिर्फ यहां के निवासियों के स्व-अनुशासन के कारण ही संभव हो पायी है। जब-जब हम स्व अनुशासन से भटके हैं तब-तब हम गुलामी की ओर बढ़े हैं। किसी भी देश की स्वतंत्रता तथा स्वावलम्बन तभी तक बना रह सकता है जब तक राष्ट्र के नागरिकों में स्व अनुशासन का भाव जागृत हो मात्र संविधान प्रदत्त अधिकारों व कानूनों के दम पर हम भारतवासी अपने गौरवशाली लोकतांत्रिक गणराज्य को सक्षम व सशक्त नहीं बना सकते। इसके लिए राष्ट्र के नागरिकों में स्व अनुशासन का होना परमावश्यक है। स्वयं का स्वयं पर नियंत्रण, वास्तव में हमारे अनुशासित सामाजिक व राष्ट्रजीवन से ही देश की सभी समस्याओं का निराकरण किया जा सकता है। देश के प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा समुचित अनुशासन का ध्यान न रखना ही देश की सभी समस्याओं का मूल है। दुःख तब होता है जब देश के अधिकतर नागरिक उपदेश कुशल बहुतेरे वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए उपदेशक की भूमिका में रहते हैं। देश के यही स्वयं के लिए स्वयं ही अपनी सुविधानुसार नियम तोड़ते हैं। शीर्ष पदों पर होने के बावजूद भी अराजक व्यवहार करते हैं। सामाजिक तथा राष्ट्र जीवन में अव्यवस्था तथा अस्वच्छता फैलाते हैं। स्वयं भष्ट्राचार के गर्त में गिरकर दूसरे से स्वच्छ, नैतिक आचरण की अपेक्षा रखते हैं। सार्वजनिक जीवन में रेलवे, सड़क, यातायात उल्लंघन का मामला हो या ऑफिस मीटिंग में देरी से पहुंचने का कारण हो या सार्वजनिक स्थानों पर नियमों को ताक पर रखकर अपना कार्य शीघ्रता से करने की मानसिकता हो या फिर स्वच्छता का मुद्दा हम स्वयं स्व-अनुशासित न रहकर दूसरे को अनुशासन का पाठ पढ़ाते नहीं थकते हैं। जब स्वयं पर बात आती है तो हम बहाने बनाने लगते हैं। यह हमारे राष्ट्र के नागरिकों की आदत बनती जा रही है। जो कि इस राष्ट्र के गणतंत्र के लिए घातक है। हम अक्सर रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे लोगों को देखते हे जो अनुशासन पर लम्बे चौड़े भाषण देते नहीं थकते। परन्तु अपनी कही बातों के दशांश पर भी अमल नहीं करते। यही दोहरी मानसिकता तथा दोहरा चरित्र इस राष्ट्र के गणतंत्र की प्रगति में सबसे बड़ा बाधक है। यदि हम अपने गणतंत्र को सुदृढ़ करना चाहते हैं तो इन दुष्प्रवृतियों के निवारण हेतु आत्मानुशासन को अपना सकते हैं। वास्तव में आत्मानुशासन से ही हमारी दुष्प्रवृत्तियों का निवारण हो सकता है। यदि हम अपने राष्ट्र के गणतंत्र को सुदृढ़ करना चाहते हैं तो हमें जीवन में स्व-अनुशासन के महत्व को समझना होगा। 

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