भूलाबिसरा गढवाली काव्य ‘‘रैबार’’ - TOURIST SANDESH

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मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

भूलाबिसरा गढवाली काव्य ‘‘रैबार’’

    भूलाबिसरा गढवाली काव्य ‘‘रैबार’’
अनसूया प्रसाद काला 
 संरक्षक कालेश्वर महादेव मन्दिर-मलनियां-बडोलगांव पौडी गढवाल
            सदानन्द जखमोला संतत् द्वारा लिखी‘‘रैबार’’ एक उत्कृष्ट गढवाली संदेशकाव्य है। इसकी कल्पना कवि ने कालिदास के मेघदूतम् का अनुसरण कर किया है। जहां मेघदूतम् संस्कृत के सुन्दर गेयछन्द मन्दाक्रान्ता में कालिदास द्वारा लिखा गया है। वहीं रैबार भी  सदानन्द जखमोला ने इसी छन्द में बडी़ खूबसूरती से लिखा और सिद्ध कर दिया कि गढवाली भाषा साहित्य सृजन में किसी अन्य भाषा की मोहताज नहीं है।सदानन्द जखमोला का जन्म उत्तराखण्ड  के जनपद  पौड़ी गढ़वाल के चण्डागाँव में 20 जुलाई 1900 में हुआ था। कुछ वर्षों तक जिला परिषद के विद्यालयों में अध्यापन करने के बाद वे सेना में भर्ती हो  गए और सुबेदार के पद से सेवानिवृति हुए। सेवानिवृति पर उन्होंने भाबर के मोटाढांग में भूमि खरीदी और यहीं बस गए। संतत् श्री जखमोला को गढवाली भाषा से बड़ा प्रेम था। उन्होंने लावणी गूजरी, गढगुणत्याळीं और रैबार जैसे उत्कृष्ट गढवाली साहित्य का सृजन किया। लावणीगूजरी एक गूजरी की कथा वर्णन है और गढगुणत्याळी  सिंखरणीछन्द में गढ़भूमि का काव्य गुणगान है। ये साहित्य अब उपलब्ध नहीं है। परन्तु गढगुणत्याळी काव्य की प्रारम्भ ‘‘नमोदेवा गढ़देवा सकलगुणसेवा गढभुमी’’ पंग्ति से होता है। संतत् श्रीजखमोला  की गढ़वाली भाषा पर सुदृढ़ पकड़ थी। उन्होंने कालिदास की रचनाओं का गहन अध्ययन किया था। उनका विचार था कि कालिदास का जन्म टिहरी जनपद में कालीमठ के पास के गांव कविट्टा में हुआ था और वे उज्जयनी के राजा विक्रमादित्य के राज कवि थे। कलिदास द्वारा रचित अभिज्ञानशाकुन्तलम् का एक श्लोक इस प्रकार है-                                
          इदमुपहितसूक्ष्मग्रन्थिना  स्कन्धदेशे।स्तनपरिणाहाच्छादिवा वल्कलेन।         
          वपुरभिनवमस्याः पुष्यति स्वां न शोभा। कुसुममिवपिनेद्धं पाण्डुपत्रोदरेण।।
    शकुन्तला द्वारा अपने वल्कल को इस प्रकार पहना है कि उसकी एक सूक्ष्म गांठ कन्धे के पास बांध दिया है। जिससे दोनों वक्षस्थल ढक गए है। इससे  सुन्दरता ढक गई है। जैसे पीले पत्तों के बीच फूल पूरी तरह अपनी सुन्दरता न दिखा कर थोड़ा दिखाता है। वास्तव में उपरोक्त श्लोक में ‘‘इदमुपहित सूक्ष्मग्रन्थिना स्कन्धदेशे’’ जो लिखा है वह गढ़वाली महिलाओं की साड़ी पहिनने का ऐसा तरीका है जिसमें पल्लू एक लपेटे के बाद पीठ पीछे से एक किनारा बायें कन्धे और सामने का साड़़ी का ऊपरी किनारा वक्षस्थल को ढकती हुई कंधे के पास गांठ बांध दी जाती है। जिसे गढवाली में गत्ती लगाना कहते है। इससे जहां वक्षस्थल ढका रहता है वहीं दोनां हाथ काम करने के लिए पूर्ण रूप से स्वतन्त्र रहते है। यही वर्णन शकुन्तला के परिधान का कालिदास ने अभिज्ञाशाकुन्तलम् में किया है। इससे यह सम्भावना बढ जाती  है कि कालिदास का जन्म गढवाल में हुआ था अथवा वे गढवाल में आकर बसे थे ?
गढवाल के इन मूर्धन्य लेखक सदानन्द जखमोला द्वारा रचित इस अमर गढवाली संदेश काव्य ‘‘रैबार’’ के बारे में बताने से पहले कवि का मूल प्रेरणास्रोत कालिदास द्वारा लिखा गया मेघदूतम् की हल्की सी जानकारी देना अनिवार्य सा हो गया है।  इससे ‘‘रैबार’’ की प्रासंगिकता बढ़ जाती है। अतः एक छोटी सी झलकः-
मेघदूतम् -  महाकवि कालिदास द्वारा रचित मेघदूतम् संस्कृत में लिखा विश्वप्रसिद्ध कल्पनाशील संदेश काव्य तो है ही साथ ही कवि कल्पना का एक उत्कृष्ट साहित्यिक नमूना भी है। मेघदूतं में एक यक्ष का अपनी यक्षणी के विरह में विलाप है। जिसे यक्षराज कुबेर उसके कर्तव्य में असावधनी के कारण यक्षराजधनी अल्कापुरी से एक वर्ष के लिए निर्वासित कर देता है। इस के कारण यक्ष को अपनी प्रियतमा को घर पर ही छोड़कर सुदूर दक्षिण मध्यभारत में कहीं रामगिरि नाम के आश्रम में जाना पड़ा। वहां अपनी प्रियतमा के विरह में उसका शरीर दुर्बल हो गया। वर्षाऋतु के आषाढ महिने  की संक्रान्ति को वह आकाश में बादलों  की घटा को देख कर सोचता है कि, निश्चय ही ये बादल उधर की ओर जा रहे है जहां मेरा घर है और मेरी प्रियतमा रहती है। उसने मेघ से प्रार्थना की- हे मेघ तुम उधर की ओर जा रहे हो जहां मेरी प्रियतमा मेरे वियोग में बहुत दुखी होगी। हे मेघपुन्ज! तुम मेरे घर अल्कापुरी में जाकर उसे मेरा संदेश सुनाने की कृपा करना। 
यक्ष मेघ को रामगिरि से अल्कापुरी तक का मार्ग बताता है कि वह  कैसे अल्कापुरी तक जाये ? जहां यक्ष ने मार्ग बताया वहीं मार्ग में पड़ने वाले प्रसिद्ध स्थानों के बारे में भी मेघ को अवगत कराया। जिन स्थानों से होकर कालिदास के मेघदूतम् में मेघ चले वे है- रामगिरि से मालक्षेत्र,आम्रकूटपर्वत,रेवानदी,दशार्णदेश,विदिशा नगरी, वेतवानदी, निविद्यानदी, अवन्तिदेश, विशालानगरी या उज्जयनी, गम्भीरानदी, चर्मणवतीनदी, दशपुर, ब्रह्मावर्त देश, कुरुक्षेत्र, सरस्वतीनदी, कनखल, गंगाजी, शिवपादुकास्थन, हंसद्वार, क्रांचपर्वत, कैलासपर्वत, मानसरोवर, कैलास में अल्कापुरी और उसी नगरी में यक्ष का घर। 
इन स्थानों का कवि ने सुन्दर और मनोहर वर्णन किया है। यह काव्य दो श्रेणियों में है, पूर्वमेघ और उत्तरमेघ और इनमें  क्रमशः सड़सठ और तिरसठ श्लोक हैं। 
रैबार :- मेघदूतम् का अनुसरण करते हुए सदानन्द जखमोला ने ‘ रैबार’ नाम से गढवाली संदेशकाव्य लिखा। मेघदूतम् की तरह ही यह काव्य भी ‘‘रैबार पूर्व’’ और ‘‘रैबार उत्तर’’ में है। जिनमें क्रमशः 63 और 60 छन्द हैं। इसमें मेघ का पथ रामगिरि से नर्मदा तक मेघदूतम् के ही समान है। परन्तु उससे आगे के मार्ग में परिवर्तन कर दिया गया है। रैबार में जिस मार्ग से मेघ को भेजा गया है वह इस प्रकार है-
रामगिरि से नर्मदा तक मेघदूतम् के समान ही है परन्तु आगे का जो पथ चितौड़, राजा भोज की राजधानी, उज्जयनी, इन्दौर, लक्ष्मीबाई की झांसी, वेतवानदी, यमुनानदी, प्रयाग,  संगम, गंगाजी और अक्षयबट और गंगा के तट से होते हुए हरिद्वार का दृश्य मात्र बताता है और हरिद्वार न जाने की सलाह देकर मालिनी और गंगा के संगम पर ही स्नान कर मालिनी के तट पर शकुन्तला व भरत की भूमि में पहुँचने को कहता है क्यों किः-                               
पंजाब्यूं का बिगरउ बड़ा लाळ चूंदी  बड़ों की।
बिल्मे जैली कखि न कखि छोड़ि हर्द्वारि पैडो।
हे मेघ! यदि तू हरिद्वार जाएगा तो वहां पर शृंगार से सजी पंजाबनियों को देख कर तुम वहीं रम जाओगे। इन को देख कर कई बड़े बड़े लोगों की भी लार टपकने लगती है।  इस लिए हरिद्वार मत जाना बल्कि मालिनी और गंगा के संगम पर रावली में स्नान करके उत्तर की ओर बढना। 
अब मेघ गढवाल में मलिनी के तट पर शकुन्तला और भरत के जन्म भूमि चौकीघाट में पहुँच जाता है। यहां से दृश्यावली, नदी,नालों,गूल,पर्वत चोटियां,वनपर्वत, मार्ग, रेल- मोटर, गाँव, नगर, कोठियां, महिला-पुरुष, सिद्धबली, गिवंईं का पुल चलचित्र की भांति आते है और विलीन होते रहते है।
कालिदास के प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञान शाकुन्मतलम्  के पात्र जहां शकुन्तला,भरत,कण्व और आश्रम वासी है वहीं वह पवित्र भूमि मालिनी नदी उपत्यका है परन्तु मेघदूतम् में कालीदास ने मेघ को मालिनी किनारे न भेज कर हरिद्वार से सीधे  क्रांचपर्वतादि होते हुए यक्ष नगरी में भेजा। सम्भव है कि कालिदास ने मेघदूतम् को अभिज्ञानशाकुन्तलम् से पूर्व लिखा हो। जखमोला को यह बात खली होगी और उन्होंने रैबार में मेघ के मार्ग में निम्न परिवर्तन किया
पैंडो लींदो तब उतर कू खेतु तींदो बणादो।
माता गीता नृपभरत की मालिणी तीर गांदो।
आमू का छन कुछ गगरणां जामुणू झुण्ड पक्यां।
                 खांदो पीदो तब पहूँचिलो कोटद्वार पड़ाऊ। 
हे मेघ! तुम उत्तरदिशा के खेतों में बरसते हुए जाना और मालिनी नदी के किनारे पहुँचना। जहां राजाभरत की माता शकुन्तला गीत गा रही होगी । रास्ते में तुझें अधपके आम और पके हुए जामुन की डालियां मिलेंगी। उनको खाते-पीते तुम कोटद्वार पड़ाउ में पहुंचना।
गढवाल का प्रवेश द्वार कोटद्वार की भूमि का किस प्रकार से मूल्यांकन किया गया है? एक नजर इस परः-
पुन्यों भोगी जब सुरग से अंश चौथो बचींयू।
तै नगरी मां जनम धरि का देव लींदा सु-भोग।
बौराणी तै नगरि सिधणी सिद्धबाबा पुजांदी।
गीवाईं का सजिलु पुल मा प्रेमपूजा चढांदी।
स्वर्ग में अपने पुण्यों का फल भोग कर जब चौथाई शेष रह जाता है तो देवता भी यहां पर जन्म ले कर सुभोग की कामना करते है। कोटद्वार की सिद्धिणियां सिद्धबाबा की पूजा और गिवईं के पुल पर प्रेमपूजा के फूल-फल चढ़ाती हैं।
बली भोली तइ नगरि की कूल सेली बिचाली।
बिन्दी चिन्न्दि अमरणि जसी कोठि राणी मुकुन्दी।
ध्ुवां धूंधि नित मुखड़ि कू रेल  लांदी संभाळी।
रूंदी-धूंदी पलटण भरी लाम लागी लिजांदी।
कूल के पास बैरिश्टर मुकुन्दी लाल की सुन्दर कोठी है। इसके पास ही रेल अपने मुख से ध्ुवां उगल कर जा रही है। यह रेल व्याकुल और रोते सैनिकों को अपने में बन्द कर रणभूमि में ले जा रही है। 
आज से 20-25 साल पहिले तक  आने जाने के साधन सीमित थे।  दूरदराज के शहरों और अन्य जाने के लिए कोटद्वार से मात्र रेल ही एक साधन थी। उसमें अधिकांश छुट्टी  काटकर ड्यूटी पर जाने वाले फौजी होते थे।
अब भाबर क्षेत्र में बसे कोटद्वार-भाबर भूमि की किन स्नेहिल शब्दों में वर्णन किया गया है पाठक खुद ही समीक्षा करें!
भाबरु की रमणि अंचळी सेलि बूंदों भिजाई।
भुक्की पींदो  कुतकिळ लगै चूलि अंग्वाळ भरी।
ऊंची सै मां सरग तल् मा सीध धूरो जथैई।
गूणी गूंथी शुभ  परब मा मौन पैतो बणाई।
हे मेघ! तुम हल्की फुहार से भाबर रूपसी के पल्लू को, आंचल  को भिगा कर उसके हृदय को सुखशान्ति देना, उस की भुक्की पीना(एक प्रकार का स्नेह चुम्बन) जिसमें प्यार करने वाला अपनी पांचों अंगुलियों से उसके मुख,गाल को छू कर फिर स्वयं अपनी अंगुली चूमता है, गुदगुदी लगाना और जप्फी भर कर फिर तुम ऊंची उड़ान भर कर आसमान के नीचे से सीधे  धूरा की ओर जाना।
सुक्रो लांघी मुंडळ बिटिना मत्थि पैलो उतिर्छा।
              प्यारी प्यारी बुसड़ि सजदी पार छन्युं का छाला।
सुक्रो नदी पारकर मडुल से तुम उतिर्छा जाना, जहां गांव के दूसरी ओर गौशाला हैं और वहां पर पशुओं के लिए घास/भूसा के भिठौड़े सजे हैं।
कूला-कूला भजन करदो  जाइ कूला सिराऊँ।
चीसो पाणी तकम मिलदा गाणि कर्दा तिसाऊ।
ढुंगो भारि उजिलु सजिलो बीच रौली भग्यान।
बटो जांदो उखिम बटिन सीध लागी उकाळी।  
यहां से कूलके किनारे भजन करता हुआ मेघ पहुंचता  है चीसोपानी के स्रोत में। गौतगळी की  चढाई जो उतिर्छा से चरेख पर्वत के लिए है उसका कैसा वर्णन किया है कवि ने जरा देखेंः-
फीली तेरी फरकलि भुला!  गौंतगळी बटीन ।
बुढ्या सी तू फुंकरि करिदी चौरि लेई विसौण।
न्यूतो देली अंज्विळ भरी स्वणि डांडी चरेखी।
धोली तेरा चरण रजकू खाळमा देवताकी
गौतगळी हे भाई चढने में परेषानी होगी और तेरी सांस चढ जाएगी । इसलिए तू बैठते हुए आराम करते हुए चढाई चढना।  गौतगळी की चढाई पार कर अब मेघ को चरेख डांडा और चण्डाखाल का रास्ता बताता है। यहां के कवि स्वयं है। अपनी  जन्म भूमि को कवि ने क्या उपमा दी? इसे देखें!
तै चौरी से उजियनि जसी मौलि चण्डा कि भूमि।
बुरांसु बांजु रिगाळ सजी झूमि-झूमी कि बर्सी।
चण्डाखाली अमर पथ सी देवि की थान प्यारो।
नाऊ सीमी चरकऋषि की पाणि  पींदा बटोई।
चण्डा की भूमि उज्जयनी जैसी है। बांज,बुरांस के सघन सुन्दर वन हैं। हे मेघ! तुम इस भूमि मे झूम-झूमकर बरसना। यहीं पर चण्डाखाल में देवी का थान है। जहां से रास्ता जाता है।  चरकऋषि की इस भूमि में यहां पर एक ओर जलकुण्ड है जहां पर राहगीर पानी पी कर अपनी प्यास बुझाते है। चण्डाखाल की देवी के मन्दिर का जनश्रुति अनुसार इतिहास मेरी पुस्तक ‘मालिनी उपत्यका, कण्वाश्रम और भूलीबिसरी यादें’ में दिया है।
अब चण्डाखाल से मेघ की बिदाई में उसके मार्गदर्शन इस प्रकार हैः-
चण्डा खालि बटिन अगने द्वारि सी द्वारिखाली।
भैरों जी छन् तक गढि बसें नाद फेरो संफेरो।
चण्डाखाल से मेघ को द्वारीखाल का रास्ता बताकर चेताया भी गया किः-
ढांगू पैडो कतइ नि लीणों चूळसैण जथैई।
हे मेघ तुम ढांगू का रास्ता मत पकड़ना और चूळसैण की तरफ जाना। चूलसैंण से नयारनदी को पार कर अद्वाणी शिखर, पौड़ी मार्ग ,गंग्वाड़स्यूं, पैडूळ, बराड़स्यूं, पांचोखाल, कंडोल्या,नागदेव, श्रीनगर, राजराजेश्वरी मन्दिर,सुमाड़ी का खोळा, देवप्रयाग रघुनाथ मन्दिर,सच्चिदानन्द का आश्रम, रुद्र प्रयाग, अलकनन्दा-मन्दाकिनी संगम, पुनाड़, नागपुर, तुंगनाथ, केदारनाथ और फिर अल्कापुरी पहुंचता है जखमोला  का  रैबारी मेघ। यहां यह बता देना उपयुक्त होगा कि पूरे काव्य को उद्घृत करना सम्भव नहीं है। इस की सुन्दरता की कुछ झलकियां देने का मेरा उद्देश्य गढवाल के साहित्यप्रेमियों को यह याद दिलाना है कि गढवाली भाषा में लिखा साहित्य को भी साहित्यिक प्रांगण में लायें और इस की उत्कृष्टता बतायें। 
जहां मेघदूतम् का नायक-नायिका यक्ष-यक्षिणी हैं वहीं रैबार में नायक तो यक्ष ही है परन्तु नायिका माणा गांव की मरछ्यांणी की कल्पना की है कवि ने।
भ्यूंचूलो सी तिगुड़ि ढसको प्यारि पौंदी धमेली।
भैलो खिल्दा द्वी नितंबु मां चुन्टि फुन्दा भग्यान।
मर्छाणी को अतुल गति से  छांछ छुल्दो कलोल।
पुन्यो से ही दरस परस पर्व कालृष्सुकालो।
मर्छाणी द्वारा छांछ ;दही विलोने के इस वर्णन में तिगुड़ी, ढस्को, धमेली, भैलो, चुन्टी;चोटी का फुन्दा, तथा भिचुलां की उपमा देकर मर्छाणी का अतुल बल याने स्वस्थ शरीर का वर्णन किया गया है।
कालिदास के मेघदूतम् में जहां यक्ष के अपराध का कोई स्पष्ट वर्णन नहीं है वहीं गढ़वाली कवि जखमोला  के रैबार में -
यक्षो कोई अति कळगुसी, ज्वान भारी खुदेढ़।
मैना की सी परब बणती रैण मंज्यूळ जैकी।
लज्जा जैकि तकि उकसणी कोप रज्जा करौ की। 
भौती सैण्यां रत खुलणि की रैदि सज्जा पड़ी यू।
एक यक्ष था। वह युवक और बहुत ही भावुक था। वह अपनी प्रिया के बियोग में एक घड़ी भी नहीं रह सकता था। वह नवविवाहित यक्ष अपने स्वामी की सेवा में दिन में तो कैसे भी समय बिता लेता था परन्तु दिन समाप्ति पर जब वह सायं घर अपनी रैण मज्युळी; घर के ऊपर के सोने के कमरे मे पहुँचता तो उसे ऐसी प्रसन्नता होती जैसे महिना के अखिरी दिन के त्यौहार पर होती है। एक दिन वह बिस्तर पर देर तक सोते रहने के कारण  यक्षराज की सेवा में विलम्ब से पहुंचा। इससे यक्षराज को क्रोध आ गया और बोला तू बहुत ही सैण्यी (पत्नीवाला) हो गया है जो रात खुलने पर भी सैया नहीं छोड़ता है। यक्षराज ने उसे अल्कापुरी से एक साल के लिए निष्कासित कर दिया।
 काव्य को पढने से ऐसा लगता है मानो सदानन्द जखमोला का एकाधिकार हो गढवाली भाषा साहित्य पर। मन्दाक्रान्ता छन्द में लिखा यह संदेशकाव्य रैबार गढवाली काव्यरचना  का उत्कृष्ट नमूना है। छंन्द में गा कर ही इसे पढा जा सकता है।
परन्तु दुख होता है यह देख कर कि किसी भी संस्था ने गढवाली भाषामें लिखे साहित्य को जीवित रखने के लिए कभी प्रयास नहीं किया और न इनका पुनः प्रकाशन ही हुआ। जिसके कारण वे अब अनुपलब्ध हो गए हैं। गढवाली भाषा अपने आप में सर्वगुण सम्पन्न है। इसके एक शब्द में पूरा वाक्य है। उदाहरण के लिए ये शब्द है ‘‘कुतर्यांण, जल्याण । यदि इसे हिन्दी में समझाया जाए तो कहना होगा ‘‘कपड़ा जलने की गंन्ध    कुछ जलने की गंन्ध आ रही है। परन्तु एक  छोटे से शब्द ने पूरा वाक्य बता दिया है। इसी प्रकार के अनेक शब्द है जो लम्बे वाक्यों को एक ही शब्द में पूरा कर देते हैं। 
 जखमोला जी के द्वारा लिखे गढगुणत्याळी और लावणीगुजरी अब उपलब्ध नहीं है। बस उनकी इतनी ही चर्चा शेष है कि जखमोला जी ने उन्हें लिखा था। इसी प्रकार डंडरियाल जी के ‘नागरजा’ और अन्य साहित्य, भगवती प्रसाद जोशी के ‘एक ढांगू की आत्म कथा’, ‘सीता बणवास’,श्रीपाराशर गौड़ की ‘उकाळ’, तथा इसके साथ ही अन्य कई साहित्यकारों के लेख है जिन्हें भुला दिया गया है। सन् 1984 में कानपुर में स्थापित गढवाली साहित्य परिषद, प्रवासी गढवालियों के लिए उनकी संस्कृतिक की पहचान और गढवाली भाषा और अपनी माटी से सम्बन्ध बनाए रखने के लिए गढवाली बोली के उत्कृष्ट साहित्यकारों  को ‘‘पं0 आदित्यराम नवनी साहित्य पुरष्कार’’ से पुरष्कृत करती आई है।  इस संस्थान का गढवाली साहित्य के प्रकाशन  में बहुत बड़ा योगदान रहा है।  परिषद ने श्रीपूरण पन्त पथिक की ‘मेरो ब्वाडा’, श्रीकन्हैयालाल डंडरियाल की नागरजा, श्रीमती बीना बेजवाल की ‘कमेंड़ा आखर, श्रीमहेश तिवारी की ‘वेदीमां का बचन’ और श्री रघुबीर सिंह रावत का ‘ए गुठ्यार’ प्रकाशित किए थे। इस के अलावा गढवाली लेखकों के साहित्य को प्रकाशित करने में वित्तीय सहयोग भी यह संस्था देती है। 
गढवाल से लोग  पलायन कर गए और महानगरों में या जहां उन्हें सुविधा मिली बस गए और अपनी भाषा-बोली को भूल गए। मैं दिल्ली में अपने एक दो प्रियजनों के घर गया तो बातचित में उनके बच्चों को पूछा कि तुमको गढवाली आती है ? उत्तर मां बाप ने दिया! बोलना तो नहीं आता परन्तु समझ जाते है।  कितनी विडम्बना है ! जिस भूमि में पलेबढे है उसको तुच्छ समझना और कहना‘तुझे पाड़ी-पाडी मत बोलो मै देरादून वाला हूं’।
गढवाल आदिकाल से देवभूमि है और हमें गर्व होना चाहिए कि हम गढवाली है, देवताओं के सानिध्य में रहने वाले देवोपासक। 
परन्तु मुझे यह कहने में जरा भी हिचक नहीं कि इस देवभूमि को भी भौतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए इसके नैसर्गिक और प्राकृतिक गुणों से छेड़-छाड़ किया गया है। वनस्पति लुप्त हो गई है। जहां साधु आश्रम और तपस्थली होती थी वहां बड़े-बड़े महल औैर होटल बन गए। बद्री-केदार की पुण्यभूमि कंकरीट के जंगल में बदल गए और इसका परिणाम मई  17-18/2013 को आए प्रलयंकारी  सैलाब हुआ । जिसमें हजारों की संख्यामें यात्री काल के गाल समा गए।  हम सबको इसके पुनर्निमाण में, जिससे जो बनता है वह करना चाहिए।  मुझे एक प्रसंग याद है। भागवत् कथा हो रही थी। ब्यासजी भगवान राम की सेना द्वारा समुद्र पर पुल बांधने की कथा सुना रहे थे। वै बोले ! उसमें योगदान करने के लिए एक गिलहरी ने पानी में अपने को भिगोया, फिर मिट्टी में लोट कर अपने  शरीर पर मिट्टी लपेट कर पुल बनने के स्थानपर आकर मिट्टी झाड़ देती। भगवान राम ने देखा और उसे पास बुलाकर पूछा । तू ऐसा क्यों कर रही हो? गिलहरी बोली- प्रभो मै इतनी बलशाली नहीं हूं कि पुल के निर्माण में पत्थरों को उठा सकूं। इसलिए जितना योगदान इस पुण्यकार्य में मुझसे हो सकता है मै वह कर रही हूँ। अतः इस देव भूमि पर आए सांस्कितिक आपदा में  इस के अस्तित्व  को बचाने हेतु जिससे जितना भी योगदान हो सके, इस पुण्य कार्य में  तथा लोकसंस्कृति के पुनःनिर्माण में अपनी भागीदारी अवश्य करें। 
                    



                                
                                                  
  

  

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