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शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

 हिमालयी संस्कृति के संरक्षक बने हमारे शहर
  -सुभाष चन्द्र नौटियाल
छह सप्ताह तक चली चुनावी प्रक्रिया के सम्पन्न होने के साथ ही अब 84 नगर निकायों की विविधत् गठन हो चुका है।  84 नगर निकायों में 34 भाजपा, 25 कांग्रेस, 24 निर्दलीय तथा एक निकाय में बसपा का नगराध्यक्ष निर्वाचित हुआ है। त्रिस्तरीय निकाय यानि नगर निगम, नगरपालिका तथा नगर पंचायतों का अपनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इन निकायों के माध्यम से विकास की जिन योजनाओं को संचालित किया जाता है वास्तव में क्रियान्वित होने वाली उन योजनाओं से राज्य का विकास प्रतिबिम्बित होता है। निकायों के इस महत्व को देखते हुए ही इन्हें छोटी सरकार का दर्जा हासिल है। सत्ता का विकेन्द्रीकरण तथा क्षेत्रा के विकास में इन निकायों का अपना विशेष महत्व है। भले ही यह भी सत्य है कि हमारे निकाय संविधान के 74वें संशोधन के अनुसार अभी तक सशक्त नहीं हो पाये हैं तथा वित्तीय रूप से इन निकायों की स्थिति बहुत नाजुक है। नगर निकायों के चुने हुए प्रतिनिधियों को निकाय की आय बढ़ाने के साथ ही प्रयास करना होगा कि जिन योजनाओं को स्वायत्तशासी निकायों द्वारा नगर विकास के लिए क्रियान्वयन किया जा रहा है क्या वह योजनाएं नगर क्षेत्र के अनुरूप हैं? निकायों में ऐसी योजनाओं का संचालन किया जाना चाहिए जो कि इस राज्य की संस्कृति के अनुकूल हां। ज्ञात हो कि उत्तराखण्ड का जनमानस आदि काल से ही प्रकृति का संरक्षक रहा है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण यह है यह कि यहां का 71 पफीसद भूभाग वनीय है। जैव-विविधता के लिए  विश्व प्रसिद्ध इस क्षेत्र की अपनी विशिष्ट पहचान रही है। स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण तथा साफ-स्वच्छ शहर के लिए इन स्वायत्तशासी निकायों द्वारा विशेष प्रयास किये जाने भी आवश्यक हैं। यदि हम अपनी जैव विविधता को बचाने में सफल होते हैं तो हमारे शहर स्वतः ही ऑक्सीजन हब के रूप में विकसित हो सकते हैं। इस समय जबकि दुनिया के शहर प्रदूषित होकर गैस चैम्बर बनते जा रहे हैं तो हम हिमालयी संस्कृति के संरक्षक बनकर इस हिमालयी क्षेत्र को फिर से देवभूमि में तब्दील कर सकते हैं। हिमालयी संस्कृति मूल रूप से प्रकृति सम्मत रही है। आज जबकि मानव मन में भौतिक सुखों की चाह में विकास के नाम पर विनाशी सोच हावी होती जा रही है तो ऐसे समय में जबकि विश्व मानव प्रकृति के प्रति उदासीन होता जा रहा है तो उसे जाग्रत करने के लिए हमारे निकाय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं विश्व में प्राकृतिक संसाधनों का निर्ममता पूर्व दोहन करने की जो होड़ लगी हुई है हम प्रकृति संरक्षण बनकर विश्व के मानव का आइना दिखा सकते हैं। ऐसे समय में जबकि प्राकृतिक जल स्रोत, नदी, तालाब, वायु, भूजल आदि पर्यावरण अवयव भयावह स्तर तक प्रदूषित हो चुके हैं तो यदि ऐसे विकट समय में उत्तराखण्ड के शहर हिमालयी संस्कृति के ध्वजवाहक बनकर प्रकृति संरक्षक बनते हैं तो हमारा देश पुनः विश्व गुरू कहलायेगा। उत्तराखण्ड की मूल संस्कृति जिसमें पर्यावरण संरक्षण समाया हुआ है। इस संस्कृति से आत्मसात् कर हम अपने शहरों को ईको-फ्रेंडली  शहर की तर्ज पर विकसित कर सकते हैं। इस हिमालयी राज्य में ऐसे शहरों को विकसित किया जा सकता है जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में ऑक्सीजन हब के रूप में जाना जाए। यहां आने वाला हर पर्यटक तन तथा मन की शांति के साथ ही परम् आत्मिक आनन्द की अनुभूमि करते हुए सचमुच स्वर्ग का आभास कर सके। यदि राज्य सरकार इन स्वायत्तशासी संस्थाओं के साथ मिलकर इस दिशा में गंभीर प्रयास करे तो वह दिन दूर नहीं जब हम पुनः विश्व गुरू कहलायेंगे। 

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