ऋगु वेद वेद वाणी काव्यानुवादक- डॉ नन्द किशोर ढ़ौंडियाल अरूण - TOURIST SANDESH

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बुधवार, 28 नवंबर 2018

ऋगु वेद वेद वाणी काव्यानुवादक- डॉ नन्द किशोर ढ़ौंडियाल अरूण

ऋगु वेद 
वेद वाणी 
काव्यानुवादक- डॉ नन्द किशोर ढ़ौंडियाल  अरूण 
 प्रथम -अष्टक, प्रथम अध्याय, प्रथम अनुवाक  
सूक्त संख्या-21
(ऋषि मेधातिथि काण्व, देवता-इन्द्र, अग्निश्च)

इन्द्र और  पावक दोनों का आहवान करता हूॅ।
कर स्तुति, जीवों को में मधुपान हेतु बुलवाता ।। 1 ।।

इन्द्र और पावक की स्तुति कर लो मानव पुत्रों!
इन्हें अलंकृत कर पूजा के गान समर्पित कर दो ।। 2।।

इन्द्र अग्नि अरू मित्र, प्रशंसा हित आमंत्रित कर लो।
सोमपान हित इन तीनों को, यज्ञ निकट बुलवाओ।। 3 ।।

उग्रतेज सुरराज और पावक का पुण्य यजन में।
सोमयज्ञ में आवाह्न कर, दोनों यहां पधारे।। 4 ।।

हे महान पावक, सुरेश तुम हो समाज के रक्षक।
दुष्टवशी ! नर भक्ष असुर को सन्ततिहीन बना दो।। 5 ।।

इन्द्र और पावक सुसत्य चैतन्य रूप इस मख के।
हेतु जगो देवों तुम हमको अपना आश्रय दे दो।।6।।
सूक्त संख्या 22

(ऋषि मेघातिथि, काण्व, देवता अश्विनी प्रभूति) 
हे पावक ! चैतन्य प्रात जो उन अश्विनी पुत्रों को।
यज्ञ भूमि आने निमित्त तुम अति ही शीघ्र जगाओ।। 1 ।।

ये दोनों अति सुन्दर रथ के, रथी और हैं नभ को।
छूने वाले, इन दोनों का हम आह्वान करते ।। 2।।

अश्विनी पुत्रों ! तुम दोनो का मधुर सत्यप्रिय चाबुक।
है उसको ले  इस अति पवित्र सुन्दर सुयज्ञ को सींचो।। 3।।

अश्विनी पुत्रो! तुम दोनों जिस सुन्दर पथ से जाते।
उससे दूर नहीं सु-सोम के यज्ञमान का घर है।।  4।।

मैं उस स्वर्ण हस्त सूरज का आवाह्न करता हूॅ।
उचित प्रेरणा देंगे वे यजमान नरों को जल्दी।। 5।।

सदा खींचने वाला जल को, सूर्य संरक्षण के हित।
आमंत्रित कर हम सुयज्ञ की इच्छाएं करते हैं।। 6।।

धन वैभव नित बांटे जो सुर, वही सूर्य मानव को।
देख रहा है उसी सूर्य का हम आवाह्न करते ।।  7।।

हे मित्रो ! सब ओर बैठकर धनदाता सूरज की।
स्तुति कर लो वे अत्यंत सर्वत्र सुशोभित होते ।। 8।।

हे पावक! अभिलाषा वाली देव पत्नियाँ सुन्दर ।
यज्ञ निकट लाओ ! त्वष्टा को सोमपान करवाओ।। 9।।

युवा रूप पावक रक्षा हित, आप हमारी नित ही ।
धिषणा, भारति और वरूति इविन को यहां बुलाओ ।। 10।।

वीर पत्नियाँ अति द्रुत गामिनि, तीनों देवी सुन्दर ।
अपर शक्ति सामर्थ्य रूप से आश्रय हमको दे दे।। 11 ।।

निज मंगल, हित वरूण अग्नि दोनों की पत्नी सुन्दर।
इन्द्राणी संग स्वयं बुलाता, सोमपान के हित में ।। 12 ।।

महाकाश ओ पुष्प धरा, इस सुन्दर मख को नित ही।
सींच कामना कर हमको पोषण सामर्थ्य जुटाएं।। 13 ।।

नभ धरती के मध्य नित्य  गन्धर्वो के स्थल पर ।
ज्ञानी जन कर ध्यानधृत सम मीठा जल पीते हैं।। 14 ।।

हे धरती तू सुखद दायिनी, बाधा विहीन बन करके। 
शुभ सुगान्ध दा हमको नित आधार प्रदान करो  तुम।। 15 ।।


सप्तखण्ड वाली जिस भू पर विष्णु चरण पडे़ थे। 
उसी धरा पर देव हमारी रक्षा नित्य करेंगे।। 16 ।।

तीन पाँव से नाप लिया जिस धरती को माधव ने।   ँ
उसके धूल लगे पैरों में सारी सृष्टि समायी।। 17।।

देख विष्णु का तेज पराक्रम, नियम से भी स्थिर हैं।
जिसके बल  में, वही विष्णु शचिपति के शुभ साथी हैं।।18।।

श्रीपति के सर्वोच्च रूप पद की स्तुतिकर्त्ता सब।
चेतन अरू ज्ञानीजन मन के निकट सदा लखते हैं।।।19।।

सूक्त- 23
(ऋषि- मेघातिथि काण्वः देवता, वायु इत्यादय)
(1)
मारूत आओ। तीव्र दुग्ध से मिला छना मधुरस है ।
रखा और अतिशीघ्र, उसे पी जाओ तुम दु्रतगति से ।।
(2)
नभस्पर्शी इन्द्र और इन वायुदेव को हम सब।
सोमपान के निमित्त बुलाते हैं इस पुण्य यजन में ।।
(3)
मन दु्रतगामी, सहस्रचक्ष, कर्मशील इन्द्र मारूत को,
निज रक्षा हित ज्ञानी जन सब हैं ( यहँ नित्य) बुलाते ।।
(4)
मित्र, वरुण का सोमपान हित हैं आवाहन करते
हैं अति पावन और बहुत बलशाली सुन्दर दोनों ।।
(5)
उन्हें वरुण ओ मित्र देव का आवाहन करते हैं।
सत्यभाव से, यज्ञ कर्म को प्रकाशित करते जो
(6)
मेरे रक्षक वरुण बने ‘ओ’ मित्र बने मम रक्षक।
ये दोनों मुझको धन बल से नित धनवान बनाये ।।
(7)
मरुतों के सह इन्द्रदेव का सब आवाह्न करते।
सोमपान हित यहां पहुंचकर नित्य तृप्त हो जाये।
(8)
पुषा दाता और मुख्य हैं यह सब दाताओं में।
सभी मरुत गण हम लोगों का आवाह्न सुन लेवे ।।
(9)
दानी मरुतों। बली, सहायक सरपति सह खल दल को ।
नष्ट करो यह दुष्ट कहीं नहिं हम पर शासन कर लें ।।
(10)
हम सब मरूत नाम वाले, देवों को यहां बुलाये ।
सोमपान हित, उग्र और नभ की सन्तति हैं सारे ।।
(11)
मरूतों का गर्जन-तर्जन है, विजयनाद सा सुखकर।
इससे सब मनुजों का जैसे मिल मंगल होता है।।
(12)
विद्युत को प्रकाश बांटने वाले रवि के मुख से,
उत्पन्न होने वाले मरुतों बनो हमारे रक्षक ।।
(13)
दीप्ति युक्त पुषा जैसे कि खोये पशु को ढूंढे।
वैसे ही तुम कुशायुक्त मखधारी मधु को लाओ ।।
(14)
सर्वदिशा प्रकाशित पूषा ने गुहा के अन्दर।
छिपे हुए कुशयुक्ति सोम राजा को प्राप्त किया है।।
(15)
यह पूषा सुन्दर षठ ऋतुओं साथ सोम को पाये।
जैसे कृषक को मिलते हैं बार-बार जौ के कण ।।
(16)
यज्ञोच्छित यह मातृ भूत जल है सत बन्धु हमारा।
और दूध को पुष्ट करे यह, यज्ञ मार्ग पर चलता।।
(17)
स्थित है जो जल रवि सह वह शीतल जल की धारा।
(सही कामना करते़) नित सीचे यह यज्ञ हमारा।।
(18)
जिन जल रस को गाय हमारी पीती वह हम चाहे।
जो जल बहता है इस धरत पर, उसे छवि देनी है।।
(19)
जल में है अमृत जल, औषधि जल, जल की प्रशंसा।
करो नया उत्साह प्राप्त नित यही भाव है मेरा।।
(20)
सोम कहे-जल ही औषधि है, तत्व अनोखा सुन्दर।
उसने, सुखदाता-पावक, जल का गुण वर्णन करता ।।
(21)
हो जल तुम चिरकाल सूर्यदर्शन के निमित्त रखे हो।
हो निरोग, तनरक्षक, औषध को इस देह धरी तुम ।।
(22)
जलो, सभी पापों को मेरे तन से तुम्हीं बहाओ।
मेरे द्रोह, असत्य आचरण, अपयश को धिक्कारो।।
(23)
आज मुझे जल प्राप्त हुए, जल ने रस युक्त बनाया।
हे अग्ने ! जल सह आकर के मुझे तेजस्वी कर दो।।
(24)
मुझे तेजस्वी व तुम नित सन्तान आयु से पूरा,
करो, देव ! ऋषि, इन्द्र सभी मेरी स्तुति को समझा ।।

सूक्त 24 
(अनुवाक-छठवां)
(ऋषि, शुन, शेष, आ जी गति, कृतियों, वैश्वामित्रो
देवरातः देवता प्रजाति प्रभृतिः)
(1)
किस सुरवर का नाम रटँ मैं, कौन मुझे दे देगा ।
महति अदिति को, ताकि पिता माता के दर्शन कर लूं।।   
(2)
सर्वप्रथम अमरत्व प्राप्त, देवों में अग्नि हूँ मैं।
वहीं अदिति को देवे, मात पिता को देख सकूँगा।।
(3)
हे नित रक्षणशील सतत, वरणीय धनों के स्वामी।
सवितो देव ! तुमी में हम सब, वैभव साधन करते ।।
(4)
हे रवि ! सत्य अनित्य द्वेष से रहित पूज्यतम हो तुम।
सेवित, सब धन धान्य, अपरमित धारण करने वाले।।
(5)
वैभवशाली सूर्य सुरक्षित हम सब सेवक जन हैं।
वैभवशाली साधन वर्द्धक, रक्षा करे हमारी ।।
(6)
वरुण! तुम्हारे राज्य-क्रोध, बल तक पक्षी उड़ते भी।
नहीं पहुंचते, नहीं रोकता गतिवत तीव्र पवन भी ।।
(7)
पराक्रमी, नभ के ऊपर निज तेज समाने वाले।
निम्नमुखी, वह वरुण-तेज, हम सब में वृद्धि बनेगा।

(8)
वरुण सूर्य हित, गमन मार्ग, नभ मध्य पांव रखने को ।
करें व्यवस्था, वरूण हमारी उर बाधा हटवाओ।।
(9) 
वरुण असंख्य उपाय पास है, बुद्धि शिवम द्रुतगामी।
करो पाप दल नष्ट  हमारे, पाप सभी छुडवाये।।
(10़)
तारे रूपी सप्त ऋषि, उन्नत थल बैठे सबको।
देखे, प्रातः लीन चन्द्र, निशि दमके वरूण अटल भी ।।
(11़)
वरूण मंत्र युत वाणी से स्तुति करता याचक मैं।
हविदाता, रिस त्याग, निमित्त नव मांगता हूं मैं।।
(12)
दिवस रावि चिन्तन करता मैं, शुनाशेष, बंदी को। 
किया मुक्त सुर देव वरूण ने, हमको मुक्त कर वे।।
(13)
लकड़ी के खम्बों पर बंदी शुनः शेष आवाहन।
किया वरूण का चतुर विज्ञ मेरे बंधन काटे सब।।
(14)
वरूण हमारे स्तुति वचनों क्रोध शमन कर लो अब।
प्रखर बुद्ध, रहो संग तुम, पाप नष्ट कर डालों।।
(15)
वरूण हमारे बंधान उपर नीचे बंधे हुए जो। 
उसी दिशा में काट चले तेरे नियमों पर नित ही।।

सूक्त 25 
(ऋषि, शुनशेष, आ जी गति इत्यादयः देवता वरुण)
(1)
वरूण तुम्हारे यज्ञ कर्म से नर घमंड करते हैं।
वैसे ही हम तब नियमों को छोड़ गर्व कर बैठे हैं।


(2)
वरूण निरादर कर्त्ता का है, दण्ड उसी की हिंसा।
हमको दो मत दण्ड नहीं अतिक्रोध करो मत हम पर।।
(3)
वरुण विनय द्वारा हम तेरी कृपा चाह रहें हैं।
जैसे घायल घोड़ी का स्वामी नित पट्टी बांधे।।
(4)
नीड दिशा की ओर दौड़ती खग सम बुद्धि हमारी।
क्रोधहीन धनप्राप्ति निमित्त नित-नित है रोड़ लगाती।।
(5)
आ खण्ड विभव सम्पन्न वरुण जो दूर  दृष्टि वाले हैं। 
उनकी कृपा दृष्टि प्राप्ति हित, निज उत्सव म ेले आये।।
(6)
हवि इच्छुक हैं मित्र  वरूण जो यज्ञमान निष्ठक की। 
अति साधारण से साधारण हवि का त्याग न करते।।
(7)
अरूण आप उडते खुगदलके गगन मार्ग के शीत।
है सागर की शुभ नौकी के रथ पथ भाग्य विधाता।।
(8)
धृत नियम ये वरुण प्रजा के नित्य बारह मासों को।
अधिवास संग जानें तेरह सेब उपयोगी जीवन के।। 
(9)
ये मूर्धा स्थित विस्तृत अति उच्च पवन के पथ को।
 भली भॉति से जाने (जैसे कि जीवन के रथ को)
(10)
नियमों में अति दृढ सु-सुन्दर, बुद्धिमान साजल को।
प्रजाजन में शासन करने के निमित्त रहते हैं।।
(11)
जो कुछ घटनाएं हुई अतः जो कुछ अब होने वाली है।
उस सबको इस पल से, मेघावत वरुण नित देखें।।
(12)
श्रेष्ठ बुद्धि वाले, मेधावी वरुण हमेशा हमको,
सुन्दर पथ दें और हमेशा शीघ्र आयुदाता हां।।
(13)
स्वर्ण कवच से देव वरुण ने निज उर भाग ढका है।
उनके चारों ओर उपस्थित समाचार वाहक है। 
(14)
शिशु धोखा दे न ही जिन्हें विद्रोही, द्रोह सफल क्यों, 
वरुण देवता का ऐसे क्यों कोई शत्रु बनेगा।
(15)
मानव के हित वरूण देवता ने अन्नों को पूरा।
वही उदर में अन्न ग्रहण करने का शक्ति प्रदाता ।।
(16)
मनोवृत्तियां सब निवृत्त हो वरुण कामना करती।
पहुंचे ऐसी जैसे गायें, चारागह को जाती।।
(17)
मेरे द्वारा सम्पादित इस मधु छवि से पावक सम।
प्रीति पूर्ण खाओ, फिर दोनों बातें करें परस्पर ।
(18)
सर्व दर्शनीय वरूण देवता को उनके रथ के सह।
भूमि उतरते मैंने देखा स्तुति सब स्वीकारी।।
(19)
पुनो वरुण मेरा आवाह्न, मुझ पर कृपा कर दो।
कृपा दृष्टि रखने वाले प्रभु मैंने तुम्हें पुकारा ।ं
(20)
हे मेघा सम्पन्न वरुण तुम, हो नभ भू के स्वामी।
उत्तर दो प्रभु तुम हमको, हमने हैं तुम्हें बुलाया।
(21)
वरुण हमारे बंधे पाश हैं ऊपर नीचे मध्यम।
उनको उन्हीं दिशा में खींचो, काटो, जीवन दाता ।।

सूक्त-26
(ऋषि- शुनः, शेष आजीगर्ति, देवता-अग्नि)
(1)
पूजनीय अग्ने ! अपने बल तेज रूप कपड़ों को।
धारण करके हम सबका यश दिगन्त में फैलाएं ।।
(2)
हे पावक तुम सतत युवा उत्तम बल तेज सुसम्पन।
प्रतिष्ठित हो जाओ, इस यजमान भजन के द्वारा ।।
(3)
हे वरेण्य पावक! भाई-भाई को, पिता सुअन की।
सखा-सखा को वस्तु प्रदाता, वही बनो दाता तुम ।।
(4)
अरिहंता हे वरुण! मित्र अरू अर्यमा नर के सम।
कुश आसन पर नित्य विराजो, है स्वागत सुर तेरा ।।
(5)
सर्व पुरातन होता, तुम इस यज्ञ सखा भावों से।
होकर के प्रसन्न सुनो स्तुति घर ध्यान हमारी ।।
(6)
हे पावक ! नित प्रति कई सुरवन्दों की पूजा कर ।
हम तुमको ही छवि देते हैं छवि स्वीकारो मन से।। 
(7)
प्रजापालक होता अग्नि, वरेण्य हमें हो प्यारी।
हम शोभाशाली अग्नीपुत्र होकर प्रिय बनेंगे।।
(8)
शोभनीय पावक सह जैसे, सुरगण निमित्त हमारे।
वैभव धारण करते वैसे पूजनीय पावक के ।।
(9)
हे अमर्त्य पावक ! अक्षर तुम, हम ओ सदा तुम्हारी ।
मर्त्य नरों की प्रशंसा युत मिलती वाणी स्नेहिल ।।
(10)
बली अग्नि! तुम अन्य अग्नि के साथ सदा ही मिलकर 
हो जाओ प्रसन्न हमारी, मृदुवाणी को सुनकर ।।

सूक्त-27
(ऋषि शुनः शेष आजीगर्ति, देवता-अग्नि, विश्वे देवा।)
(1)
बालां वाले घोड़े सम हो, तुम हे अग्ने सुन्दर।
यज्ञों के सम्राट अग्नि के पूजन हित प्रस्तुत हूॅ।।
(2)
शक्ति पुत्र शक्ति हो सर्वगमन शोभित सुख के ज्ञाता।
इच्छाफल देने वाले तुम, बनो हमारे अग्ने ।।
(3)
सर्वगमन गतिशील अग्नि तुम, हमको अतिव निकट से।
और दूर पापां वाली, इच्छा से सदा बचाओ ।।
(4)
हे पावक् हविदान हमारे, और नये विनयों का।
देवों के सम्मुख उत्तम ढंग से, नित्य सुवर्णन कर दो ।।
(5)
हे पावक हमको अति उत्तम, लोक प्राप्त करवाओ।
मध्य लोक अन्नों के स्वामी, ओ धनवान बनाओ।।
(6)
कई शक्ति वाले पावक। तुम हो धनबल के दाता।
सागर जल की मर्यादा सम, नित्य प्रवाहित होते है।।
(7)
पावक युद्धों से रक्षा की, रणहित किया प्रेरित,
जिसे, वही वैभवशाली नर नित्य स्वतंत्र रहा है। 
(8)
विजयशील! उन पूर्वानर को वश में नहिं कर सकता।
क्योंकि उसी का बल वर्धक सारा जग हो जाता ।
(9)
यह अग्नी मानव का स्वामी, हमको अश्वों द्वारा।
पार करें मित रण से, और ज्ञान ध्यान से धन दे।।
(10)
सर्व विनय ज्ञाता अग्ने तुम हमको मानव पूजित
पूज्य रुद्र के निमित सदा स्तुति की नव प्रेरणा दो।
(11)
ये सीमा से रहित श्रम ध्वज वाले अग्नि प्रकाशित ।
हमको दे सद्बुद्धि और शुभ बल प्रदान करे नित ।।
(12)
प्रजा स्वामी देव सम्बन्धी, ज्ञान प्रदायक अग्नि
प्रकाशित, वैभवशसाली के स्तोत्रों को स्वीकारा ।।
(13)
लघु दीर्घ नर युवक वृद्ध, सबको हम नमन करेंगे,
शक्तिमान सुर के पूजक हो, आदर हो पूज्या को।

सूक्त संख्या-28
(1)
हे सुरेश पत्थर का, मूसल जहां उठाया जाता।
कुटनार्थ, वह बने सोमरस का नित पान करो तुम।
(2)
हे सुरेश दो जंघाओं सम सोम कूटने वाले
सिल बटे से बने सोम इसका नित पान करो तुम।।
(3)
हे सुरेश! नारी जहँ  मुसल से नित सोम बनाती। 
उसी जगह जाकर के तुम मधु सोम सरस पी डालो।। 
 (4)
रस्सी से ज्यों सोम बंधा, उस भांति मथानी बांधित।
मन्थन करने के स्थान जा, सोम सरस पी डालो।
(5)
हे ओखल तुम घर-घर जाकर कार्य यन्त्र बनते हो।
फिर मेरे घर में दुन्दभि सम सुन्दर शब्द करो तुम ।। 
(6)
वनस्पते । नित वायु चले तेरे समीप नव गति से ।
हे अखल इस इन्द्र पीरहित सोम सिद्ध कर डालो ।।
(7)
बलदाता अति पूज्य उखलमूसल अन्नों से सेवित।
उच्च स्वरों से गुंजित, ज्योंकि अश्व बोलते हैं सब।।
(8)
ऊखल मूसल वनस्पते। तुम सोमसिद्ध के कारण
बन, मधु सोम सुरेश निमित, निष्पीड़न नितकर डालो।।
(9)
ऊखल मूसल द्वारा काटा गया सोम अति मीठा।
रखा पूत कुश पर जुठे को, चर्म पात्र में डालो ।।

सूक्त संख्या- 29
(1)
सत्य सोमपा इन्द्र ! बहुत हैं हम निराश जीवन से,
फिर भी तुम सहस्त्र धेनु अश्वों को दे दो हमको ।।
(2)
शक्तिमान नासिका सुसुन्दर, दयावान, सुर स्वामी,
दया मिली, हमको सहस्र गो अवश्य दलों को दे दो।
(3)
हे सुरेश सब विपत्ति दरिद्रता को अचेत कर डालो।
सायें पे, हमको असंख्य गौ अश्व दलों को दे दो।
(4)
इन्द्र हमारे शत्रु सो रहें, मित्र जागते हो सब,
ऐसा हो हमें सहस्र गौ अश्व दलों को दे दो। 
(5)
इन्द्र पापयुत स्तुति कर्ता खर सम अरि हन डालो।
सभी हमारे हमें असंख्य गौ अश्व दलों को दे दो।
(6)
कुटिलगता यह पवन रहे अति दूर सभी जंगल से
तुम हमको पुरराज सुरभि धन के दाता बन जाओ।
(7)
करे अशुभ चिन्तन जो बैरी उसको तुम हन डालो।
हे सुरेश हिंसक को मारो गौ अश्वों को दे दो।

सूक्त- 30
(ऋषि शुक शेष आजीगर्तिः देवता इन्द्र उषा)
(1)
हे मानव बल प्राप्त करो तुम, मन में इस इच्छा से,
इसी निमित्त मधवा को हम गढ़ ज्यों नित खींच रहे हैं ।।

(2)
अथोगता जल के समान, घट सहस्त्र दुग्ध मिलवाने,
शताधिक्य घट सोम, धार को शचिपति प्राप्त करे नित ।
(3)
जलहित विस्तृत हुए सिंधु सम् उदर बड़ा सुखर का।
फैला है रस पान सोम का करने निमित्त सदा ही।।
(4)
है कपोत पाता ज्यों निज पिय का स्नेह ऐसे ही,
प्राप्त करो है रखा सोम तवनिमित्त मधुर वाणी सुन ।।
(5)
जो करता स्तुति तेरी, धनपति इस स्तुति से।
आप विभव प्रदान करो सुर, सत्य मधुर वाणि भी ।


(6)
महाबली सुरराज उठो रण रक्षा करो हमारी।
मिल जुलकर के हम दोनों, नव मंत्रणा कर लें ।
(7)
अरे मित्र ! हम सब कर्मों ओ युद्धों का संचालन ।
करने से पहले शचिपति का आवाह्न करते हैं।
(8)
यदि पुकार सुन लें सुरेश, हम सबकी स्वर्ग धरा से
तो व े आयेंगे असंख्य, रक्षक साधन को लेकर ।।
(9)
मैं अपने अग्रणी, शक्ति के रूप, इन्द्र शचि पति को,
पिताश्री संग बुला रहा हूँ  अपने पूर्व पुरूष सम ।।
(10)
हे वरेण्य हैं तुम्हें बुलाते, विनयशील बहु विनयी।
मित्र शरणदाता हो, तुम हम आवाह्न करते हैं। 
(11)
सोम पायि सुरराजा ! सोम पीकर बलवान हुए जो।
उन मित्रों के बनो मित्र हम यही कामना करते।
(12)
सोमपायि सुरराज। हमारी यह इच्छा पूरो तुम।
हम इष्टों की सफल प्राप्ति में, करें तुम्हारी इच्छा।
(13)
शचिपति के खुश होने पर ही सभी हमारी गायें
अधिक दूध दें, जिससे हों हम अधिक पुष्ट बलशाली ।
(14)
हे रुद्र तुम्हारी विनती करके चक्र धरी सम तुम ही
भाग्य घुमाकर धन देते हो, (सिद्ध प्रदायक सुन्दर)
(15़)
इन्द्र साथ को की सद इच्छा और साधनों बल पर।
तुम पहियों की धुरी पलट सम, निर्धनता हर देते हो।
(16)
इन्द्र सदा ही अरि के धन को, फुर्तीले घोड़ों से
जीते, हमको स्नेह प्रदायक स्वर्णिम रथ दे डाला ।।
(17)
भीषण बलवाले रवि पुत्रों ! अश्व गती से दोनों ।
सुरभि और स्वणादि धनों के साथ यहां पर आओ ।
(18)
अश्विनी पुत्रों ! तुम दोनों के लिए जुता रथ नभ के।
पथ में चलता है उसको विनिष्ट करे नहिं कोई ।।
(19)
अश्विनी पुत्रों ! तुम अपने रथ के सुन्दर पहियों को ।
पर्वत अरू नभ की छाती पर, चारों ओर घुमात ।।
(20)
पाप विनाशक उषे ! कौन है वह भरण धर्मानर।
जो तेरे सुख को, प्राप्त करता है दिव्य भुवन में ।
(21)
अश्वगामिनी उषे, कांतियुत, तुमी क्रोधहीना का
करते हो चिन्तन समीप से या अति दूर सदा ही।
(22)
नभ पुत्री! तुम उन्हीं शक्तियों के सह यहां पधारो।
जिनके द्वारा शुद्ध विभव की करो थापना नित ही।।

सूक्त- 31 (सातवाँ अनुवाक)
(ऋषि-हिरण्य स्तूपः आंगीरस, देवता अग्नि)
(1)
हे अग्ने तुम ऋषि अंगिरा से पहले के होकर,
उनके और हमारे मंगलकामी मित्र बनो। अब
मेधावी ज्ञानी कर्मवाले और दमकते ग्रन्थों
से सभी मरूतगण सदा तुम्हारे नियमों से प्रकट हैं।









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