संवेदनहीनता की पराकाष्ठा
उत्तराखण्ड को देवभूमि कहा जाता है तथा यहां की संस्कृति को देव संस्कृति के रूप में जाना जाता है परन्तु उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून स्थित राजकीय महिला चिकित्साल्य में जच्चा-बच्चा की हुई मौत सिर्फ एक घटना मात्र नहीं हैं, बल्कि यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। यह अत्यंत दुःखत घटना सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम वास्तव में देव संस्कृति को धारण करते हैं? या देवभूमि में राक्षसी संस्कृति का बोलबाला हो चुका है। जो कि दानवी रूप में उत्तराखण्ड की देव संस्कृति को निगल रहा है। राजकीय महिला चिकित्सालय देहरादून में गर्भवती महिला के लिए एक अदद बेड़ मुहैया न हो पाना यह बताने के लिए काफी है कि, वास्तव में सरकारी तंत्र कितना संवेदनशील है। यह घटना राज्य के स्वास्थ्य विभाग और उनके कारिदें आमजन के प्रति कितने संवेदनशील हैं। यह प्रदर्शित करने के लिए काफी है। सुदूर पर्वतीय क्षेत्र से राज्य की राजधानी देहरादून में बेहत्तर चिकित्सा की आस में यहां पर्वतवासी आते हैं परन्तु शायद वे यह भूल जाते हैं कि इस राज्य की राजधानी के अस्पतालों में नकारा संवेदनहीन कारिदें बसते हैं। दून महिला अस्पताल में आमजन के साथ घटित यह घटना यह साबित करने के लिए काफी है कि दून में पहाड़वासियों के साथ कैसा सुलूक किया जाता है। उत्तराखण्ड बनने से पूर्व शायद किसी भी पहाड़वासी ने इस प्रकार की घटना की कल्पना सपनों में भी नहीं की होगी। गर्भवती इलाज के नाम पर पांच दिनों से अस्पताल के बरामदे में फर्श पर लेटकर व्यवस्था की कहानी बयां कर रही थी। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा वाली घटी इस घटना ने इसी हालत में उसकी और नवजात शिशु की सांसे थम गई, लेकिन संवेदनहीन व्यवस्था उसे एक अदद बेड की व्यवस्था न करा सका। इससे ज्यादा संवेदनहीनता और गैर जिम्मेदाराना रवैया और क्या हो सकता है कि गर्भवती की तबीयत बिगड़ने पर परिजन अस्पताल स्टाफ से उसकी देखभाल की अनुनय -विनय करता रहा परंतु किसी भी ऑफिस स्टाफ ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। अस्पताल का कोई भी कर्मचारी गर्भवती की मदद के लिए आगे नहीं आया। नतीजा यह हुआ कि विवाहित को फर्श पर ही प्रसव हो गया तथा कुछ देर बाद जच्चा-बच्चा दोनों ने दम तोड़ दिया। दरअसल यह घटना मात्र जच्चा-बच्चा की मौत का नहीं है, बल्कि उस बेरहम और संवेदनहीन व्यवस्था को प्रदर्शित करता है जो कि इस राज्य में आकार ले रहा है। यह घटना पहाड़ की महिला के साथ घटित एक हादसा मात्र नहीं है बल्कि राज्य की व्यवस्थाओं पर सीधी चोट है। भले ही उसके परिवार को हुए नुकसान की भरपायी कभी नहीं हो सकती है परन्तु यह घटना समाज में बढ़ती संवेदनहीनता की द्योतक है। ह्दय विहीन घटना की पुनारावृत्ति न हो इसके लिए व्यवस्थाओं में सुधार की आवश्यकता है। इसके लिए समाज को संवेदनशील होने की आवश्यकता है। वैसे संवेदनहीनता की यह पहली घटना नहीं है जब सरकारी अस्पतालों में आये दिन मरीजों के साथ इस तरह की बदइंतजामी से दो-चार न होना पड़ता हो। राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में हालात बहुत चिंताजनक है परंतु घटनाओं से सबक नहीं लिया जा रहा है। हर बार कोई न कोई बहाना बनाकर सरकारी तंत्र की नाकामियों को छिपाने के लिए प्रपंच की व्यूह रचना रची जाती है। आखिर सवाल यह है कि कब तक व्यवस्थाओं की मार पहाड़वासी झेलते रहेंगे? कब तक सरकारी चौखट पर गर्भवती महिलाऐं दम तोड़ती रहेंगी? सरकारी महकमा आखिर कब तक स्वांग रचता रहेगा? सरकारी चौखट पर आखिर कब तक संवेदनहीनता के पराकाष्ठा का मंचन होता रहेगा? यदि वास्तव में व्यवस्थाओं में सुधार लाना है तो सरकार को गम्भीरता से मनन करते हुए जन के प्रति संवेदनशील होना होगा। व्यवस्थाओं में जवाबदेही महत्वपूर्ण होती है इस दुःखत घटना की भी जबाव देही तय होनी चाहिए। ताकि ऐसी घटनाऐं फिर कभी भी घटित न हों। भारत सरकार द्वारा आमजन के स्वास्थ्य के लिए जो आयुष्मान भारत योजना का क्रियान्वयन किया जा रहा है। वह तभी फलीभूत हो सकता है जब सिस्टम आमजन के प्रति संवेदनशील होगा।
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