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मंगलवार, 25 सितंबर 2018

व्यंग्य
मैं नहीं राफेल खायौ
                                         -सुभाष नौटियाल
हे!  भारत के जन-मन, 
मैं नहीं राफेल खायौ!
मैं तो बस अम्बानी संग,
मैत्री ही तो निभायौ।
चार पहर विदेश दर-दर भटकयौ,
चार पहर देश मा बितायौ।
मैं फिर कब राफेल खायौ,
जिन घोटालों का ताज बनायौ,
तिन ही मौहे चोर बतायौ।
हे! भारत के जन-मन,
मैं नहीं राफेल खायौ,
मासी  राफेल छुयौ नहीं,
फिर कैसे राफेल खायौ?
जिन्ह के अन्तर,
बोफोर्स समायौ,
तिन ही मौहे,
राफेल के दीदार करायौ।
उनकी बातें वे ही जानें,
मुझे काहे को बदनाम करायौ,
विपक्ष  सब बैर पड़े हैं,
बरबस मुख लपटायौं।
 हे! भारत के जन-मन,
मैं नहीं राफेल खायौ।

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