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गुरुवार, 13 सितंबर 2018

पक्षियों की भी होती है अपनी सांस्कृतिक विरासत
-सुभाष चन्द्र नौटियाल
परम्पराएें जब अगली पीढ़ियों में हस्तांतरित होती हैं तो वह संस्कारों में ढ़ल कर संस्कृति का निर्माण करती है। भले ही मानव पीढ़ियों में परम्पराएें जब अगली पीढ़ियों में हंस्तातरित होती है तो बहुत कुछ पुराना छुट चुका होता है तथा बहुत कुछ नया जुड़ता हैं। मानव पीढ़ियों में रीति-रिवाज, परम्पराऐं बदलते समय के साथ प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। चाहे वह गीत की परम्परा हो या संगीत की या अन्य किसी रीति-रिवाज की नयी पीढ़ियों में बदलाव महसूस किया जा सकता है लेकिन वैज्ञानिक कहते है कि, पक्षियों में ऐसा नहीं होता है।  एक हजार साल से पक्षी वही गीत गा रहें हैं, जो उनके पूर्वज पक्षियों ने गाएं थे। वे अपनी परम्पराओं तथा सांस्कृतिक विरासत को सहजने के प्रति सजग और अडिग हैं। 
दादा-दादी, नाना-नानी या बड़े बुजुर्गों से हम सबने परम्पराओं का पाठ सीखा है। इसे संस्कार भी कह सकते है। यही संस्कार हमारे बड़े बुजुर्गों ने अपने बुजुर्गों से सीखा हैं। मानव समाज में यह व्यवस्था सदियों से चली आ रहीं हैं। इसी प्रकार की व्यवस्था पशु-पक्षियों में भी होती हैं। जैसे शेर अपने बच्चों को शिकार करना सिखाता हैं। शाकाहारी जानवर अपने बच्चों को शिकारी जानवरों से बचना सिखाते हैं। पक्षी अपने बच्चे को उड़ना और चहकना सिखाते हैं। गीत सिखाते हैं। पशु-पक्षियों में भी यह व्यवस्था सदियों से चली आ रही हैं। बदलते समय के साथ मानवीय सभ्यताओं में परम्पराऐं नये स्वरूप में प्रकट होती रहती हैं। समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार उसके बहुत कुछ जुड़ता है तथा बहुत कुछ छोड़ दिया जाता हैं। परन्तु लम्बे समय के वैज्ञानिक अध्ययन से निष्कर्ष निकला है कि गाने वाली चिड़ियों ने पिछले एक हजार साल से अपने सुर नहीं बदले हैं। यानि कि पीढ़ियों के बदल जाने के बावजूद भी विभिन्न प्रजाति की चिड़ियाऐं उसी स्वर तथा उसी शैली में गीत गाती हैं जिस शैली में उनके पूर्वज गाते थे। 
दुनिया के सभी प्रजातियों के पक्षियों के पास अपने अपने गीत है। मानव के पैमाने पर कुछ कोमल और कुछ कर्कश /कोमल और मधुर गीत आमतौर पर छोटी प्रजाति के पक्षियों के हिस्से में आए हैं। पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों के गीतों में प्रकृति के जैसी विविधता समायी हुई हैं। इन गीतों में बच्चों के जैसी मासूमियत भी समायी हुई हैं तो कभी-कभी मानवीय भावनाओं की जटिलता  भी महसूस की जा सकती हैं। विशेषज्ञों ने गायन की भाव-भगिमाओं नोट्स तथा आरोह-अवरोह का सूक्ष्म अध्ययन कर मानव की गायन कला से उनकी गायन कला की कुछ समानताएं रेखांकित की हैं। गाते तो लगभग  सभी पक्षी हैं, परन्तु इनमें कुछ ही पक्षी ऐसे हैं जिनके हदयस्पर्शी गीत मानव मन की भावनाओं को छूने, सहलाने रचनात्मक कार्यों को प्रेरित करने की क्षमता रखते हैं। दुनिया भर के शोधकर्ताओं ने तमाम पक्षियों के गीतो का अध्ययन करने के बाद कुछ सुमधुर गायक पक्षियों को खोज निकाला है। सबकी आवाज  व अंदाज अलग-अलग, गीत अलग-अलग, स्वर-लहरियां अलग-अलग तथा मानव पर पड़ने वाला प्रभाव भी अलग-अलग वैसे तो ऐसे गायक पक्षियों की संख्या एक सौ से अधिक मानी जाती हैं परन्तु इनमें दस पक्षी ऐसे है, जिन्हें प्रकृति में सबसे बेहतरीन गायकों का दर्जा हासिल हैं। 
ये पक्षी है बुलबुल (कॉमन नाइटिंगेल), कैनरी कोयल, अमेरिकी रॉबिन, सॉगं थ्रश, चैनल-बिल कुक्कू, गौरैया, ब्लैक बिल मैग्पी तथा अमेरिकन स्वंप। अमेरिकन स्वंप को विशेषज्ञ सांस्कृतिक पक्षी भी कहते हैं। अन्य पक्षी अपने गीतों में समय-समय पर बादलाव भी करते हैं और गीतों में समय-समय पर बदलाव भी कहते हैं और दूसरे पक्षियों की नकल भी करते हैं। अमेरिकन स्वंप गौरैया (स्पैरो) की वह प्रजाति है जो सुनती तो सबकी है, लेकिन गाती वही है जो उसे अपनी विरासत से हासिल हैं। पक्षी वैज्ञानिकों का मानना है कि अमेरिकन स्वंप में मस्तिष्क का आकार बहुत छोटा होता है, इसके बावजूद उन्हें वह धुन याद रहती हैं। शोधकर्ताओं ने शोध से निष्कर्ष निकाला है कि ऐसा बहुत कम देखा जाता है कि, वह उन धुनों को भूली हो एक हजार वर्षों से वह वही गीत गा रही हैं जो कि उन्हें  पूर्वजो से विरासत में मिला हैं। उनका चहकना बिल्कुल भी नहीं बदला। 
कुछ वर्ष पूर्व लंदन की क्वीन मेरी यूनिवर्सिटी और इम्पीरियल कॉलेज तथा नार्थ कैरोलिना की ड्यूक यूनिवर्सिटी के पक्षी वैज्ञानिकों में इन पक्षियों के व्यवहारों पर लम्बे समय तक अध्ययन करने के बाद पाया कि बहुत कोशिशों के बाद भी ये पक्षी दूसरों के गीत गाने या पारम्परिक रूप से हासिल अपने गीतों में बदलाव करने को तैयार नही हुए।
मानव की तरह की पक्षियों की भी अपनी सांस्कृतिक परम्पराऐं हैं। संस्कृतिक विरासत हैं। जिन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी हंस्तारित करते हैं। गायक पक्षियों के अध्ययन से शोधकर्त्ताओं ने निष्कर्ष निकाला हैं कि, हम मनुष्यों की तरह पक्षी अपनी संस्कृति और संस्कृतिक परम्पराओं का त्याग कर नई चीजांं के पीछे नहीं भागते हैं। बल्कि अपनी पीढ़ी में हंस्तातरित करते हैं। 
शोधकर्त्ताओं ने उत्तर पूर्वी अमेरिका के कच्छ भूमि में पायी जाने वाली गोरैया की प्रजातियों का अध्ययन किया। इस प्रजाति की गौरेया चुनिंदा गानों का चयन करती हैं। इस तरह सीखने की उनकी रणनीति को कॉन्फर्मिस्ट ‘बायस‘ कहा जाता है। जो हम मनुष्य भी अपनाते है। अध्ययन से ज्ञात हुआ कि इन पक्षियों में मनुष्यों की तरह अपने गीतों की श्रेणियां बनाने और उपयुक्त अवसर पर उन्हें गाने का सलीका है। इल्हे देखकर अध्येताओं का यह एहसास हुआ कि, हमारी संस्कृतिक परम्पराएं कैसे अचेतन रूप से हमारे जीवन के जटिल व्यवहारों को नियंत्रित करती हैं। 
अपने संस्कृतिक विरासत से ही गायक पक्षियों ने सदा मानव मन को झकझोरा हैं। इनके भोलेपन होने के कारण मानव सभ्यता के आरम्भ से ही पक्षी सदा हमारे दिलों के पास रहें हैं। पहाड़ की लोक संस्कृति में घुघुती रची बसी है। यहाँ के लोक गीतों में घुघुती को विशिष्ठ स्थान प्रान्त है। चाहे बसंत ऋतु के आगमन की घोषणा हो या खुदेड़ गीत घुघुती यहां के लोक जीवन में रची बसी है।
 अंनत काल से हमारी सुबह इन पक्षियों के संगीतमय कलख से शुरू और दिन इनके थके हुए संगीत के साथ ढलते आये हैं। इन के पास होने भर से सिर्फ आस-पास के वातावरण में ही नहीं बल्कि हमारे तन-मन में मानवीय संवेदनाओं का संगीत बज उठता हैं। आवाज लगाकर ये पक्षी अपने साथियों को अनिष्टसे बचाने की कोशिश करती है। इनकी चहचहाहट अपनी संतानों के लिए उनका स्नेह है, प्यार का बंधन है। उनकी तेज-तेज आवाज उनकी हिदायतें तथा उनकी संगीत लोरियां हैं जिसके पीछे अपने विगत परिवार और अपने बच्चों के लिए उनकी असीम चिन्ताएं छिपी होती हैं। हम मानवों का कर्त्तव्य है कि, हम उनकी इन चिन्ताओं को दूर करते हुए अंनत काल तक पक्षियों के सुमधुर संगीत का आनन्द लेने की व्यवस्था करें ताकि पक्षियों की संस्कृतिक विरासत समृद्व होकर अनंत जीवन को प्राप्त हों। 

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