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सोमवार, 10 सितंबर 2018


हिंदी हैं हम

(14 सितम्बर हिंदी दिवस पर विशेष)
-सुभाष चन्द्र नौटियाल
आज हिंदी भाषा वैश्विक आकार लेती जा रही है। ऐसे में यदि भारत सरकार भी पुरजोर कोशिश करे तो इसे संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित किया जा सकता है परंतु इसके लिए सरकारी तंत्र को कृत संकल्प होना पड़ेगा। आज जब वैश्विक रूप में हिंदी को स्वीकार किया जा रहा है, तो ऐसे में हिंदी भाषा-भाषीयों की जिम्मेदारी अधिक बढ़ जाती है कि वे भाषायी शुद्धता के साथ-साथ दूसरी भाषा के शब्दों को भी अंगीकार करते हुए हिंदी भाषा में शामिल करें। ताकि भाषा वृद्धि के साथ-साथ अन्य भाषाओं के साथ भाषायी आत्मिता में वृद्धि हो सके। बाजारवाद के बढ़ते प्रचलन के साथ देशी-विदेशी कम्पनिया भी अब हिंदी के महत्व को समझने लगी हैं। दिन-प्रतिदिन बढ़ते हिंदी के दायरे और इससे जुड़ कर भारतीय भाषाओं का परिवार भी समृद्ध होता जा रहा है। हिंदी भाषा के महत्व को स्वीकार करते हुए क्षेत्रीय भाषा के हिंदी अनुवाद में तेजी से वृद्धि हो रही है जो की आने वाले समय के लिए शुभ संकेत है। भारतीय परिवार की भाषाओं में आपसी समन्वय जितना अधिक होगा उतनी की क्षेत्रीय भाषाओं के साथ-साथ हिंदी भी संरक्षित एवं संवर्द्धित होती रहेगी। राष्ट्र की एकता एंव अखण्डता के लिए भाषायी समन्वय आवश्यक है। हिंदी के बढ़ते प्रभाव के कारण भारतीय सभ्यता-संस्कृति का प्रचार-प्रसार पूरी दुनिया में हो रहा है। िंहंदी भाषा अब व्यापक स्तर पर रोजगार सृजन करने की भाषा बनती जा रही है। हिंदी का बाजार तेजी से उभर रहा है और व्यापकता की ओर बढ़ रहा है। हम हिंदी भाषीयों से कई अधिक अब हिंदी के वर्चस्व को तमाम देशी-विदेशी कम्पनियां समझ रही हैं। विडम्बना यह है कि, हिंदी क्षेत्र में रहने के बावजूद भी हिंदी भाषा-भाषी लोग स्वयं अपनी भाषा को क्षति पहुंचाने में लगे हुए हैं। वैश्विक आकार के बावजूद भी आश्चर्य ही है कि हिंदी के भाषा-भाषी लोग अपने बच्चों को हिंदी संस्कार देने में आज भी शर्म महसूस करते हैं। इसी कारण हिंदी पट्टी में अंग्रेजी स्कूलों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है इतना ही नहीं, हिंदी के नाम पर करोड़ो अरबों कमाने वाले बॉलीवुड के अधिकतर सेलीब्रिटी आम बोल चाल में हिंदी के बजाए अंग्रेजी को महत्व देते हैं। कहीं हिंदीभाषी लोग जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है स्वयं को रईस एवं बु़द्धजीवी होने का ढ़ोंग करने के लिए दैनिक जीवन में अधिक से अधिक अंग्रेजी का प्रयोग करने में अपनी शान समझते हैं। ऐसे लोग आज भी हिंदी के प्रति मतिभ्रम की अवस्था में जी रहे हैं। हिंदी भाषा-भाषी होने के बाद भी वह स्वयं की ही दोयम दर्जे का समझने लगते है। परंतु अनेकों बार देखा गया है कि कामकाज के सिलसिले में भारत आये अनेकों विदेशी भारतीय संस्कृति से प्रभावित हो कर यहीं बस गये। ऐसे तमाम उदाहरण यत्र-तत्र इस देश में देखने को मिल जायेंगे। हिंदी क्षेत्र के अधिकतर लोग आम तौर पर मानकर चलते है कि हिंदी उनकी मातृ भाषा है इसलिए उन्हें हिंदी अधिक पढ़ने व समझने की आवश्यकता नहीं है। इसी के कारण वे अति आत्मविश्वास के शिकार हो जाते हैं। हिंदी भाषा का शुद्ध स्वरूप लिखने में उनका नियंत्रण नहीं रहता है, तथा अधिकांश देखा गया है कि पढ़े लिखे लोग भी अशुद्ध हिंदी लिखते हैं। जो की हिंदी भाषा-भाषीयों के लिए भी चिंतनीय विषय है। वैसे भी हिंदी पट्टी के अधिकतर स्कूल कॉलेजों में हिंदी भाषा की अनदेखी की जाती है इसीलिए हिंदी भाषा-भाषायी युवा न तो हिंदी भाषा को ठीक प्रकार से समझ पाते हैं, न लिख पाते हैं और न बोल पाते हैं। अतः इस ओर विशेष ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। लेखकों, साहित्यकारों, सचेत पत्रकारों, शिक्षकों आदि को छोड़ दिया जाये तो बहुत कम लोग ऐसे हैं जो शु़द्ध हिंदी लिख सकते हैं। हिंदी भाषा के वैश्विक रूप को बनाये रखने के लिए हिंदी भाषा विशेषज्ञों की जिम्मेदारी हैं कि वे हिंदी भाषा की सरलता एवं सहजता पर जोर दें। ताकि आम जन में हिंदी के प्रति अनुराग पैदा हो। भाषा जितनी सरल एवं सहज होगी उतना ही उसका वैश्विक आकार बढ़ता चला जायेगा। भाषायी कट्ठरता नहीं होनी चाहिए। बल्कि हिंदी भाषा-भाषीयां को दूसरी भाषाओं के साहित्य का भी अध्ययन करना चाहिए, ताकि उनकी अच्छाईयों को हिंदी भाषा में समाहित किया जा सके। समय की नजाकत को भांपते हुए यही समय की मांग है। यदि हम समय के अनुसार हिंदी भाषा पर जोर दें तो हमें ‘हिंदी हैं हम’ होने पर गर्व का एहसास होगा।


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