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बुधवार, 5 सितंबर 2018

पॉलीथिन प्रतिबंध पर सरकार का मजाक
-सुभाष चन्द्र नौटियाल

अपने ही बनाये नियमों की किस प्रकार खिल्ली उड़ाई जाती है उत्तराखण्ड सरकार इसकी बानगी भर है। जुमलों को उछाल कर किस प्रकार आमजन के साथ मजाक किया जाता है। पॉलीथिन पर प्रतिबंध भी इसी प्रकार का एक मजाक बन कर रह गया है। पॉलीथिन प्रतिबंध की मुहिम प्रवान नहीं चढ़ पा रही है। इस में राज्य सरकार पर बाह्य दवाब है या आन्तरिक असहमति कुछ कहा नहीं जा सकता है। परंतु पॉलीथिन प्रतिबंध पर बड़े-बडे़ दावे करने वाली सरकार अब स्वयं ही सुस्ताने लगी है। पर्यावरण को बचाने के लिए पॉलीथिन प्रतिबंध की यह मुहिम शुरू होने से पहले ही दम तोड़ती नजर आ रही है। दअसल उत्तराखण्ड सरकार ने 1 अगस्त 2018 से राज्य में पॉलीथिन पर पूर्ण प्रतिबंध की घोषणा की थी पंरतु यह घोषणा अब हवा-हवाई नजर आने लगी है। शासन प्रशासन ही पॉलीथिन प्रतिबंध की इस मुहिम की हवा निकालते नजर आ रहें हैं। शासन प्रशासन की सुस्ती के कारण ही सम्पूर्ण राज्य में ना सिर्फ पॉलीथिन धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है, बल्कि पॉलीथिन का कचरा भी देवभूमि में यत्र-तत्र-सर्वत्र फैल रहा है। देवभूमि में पर्यावरण का मिजाज बिगाड़ने वाला यह पॉलीथिन किस कदर घातक साबित हो रहा है वैज्ञानिक इसकी चेतावनी बार-बार दे चुके हैं, परंतु सरकार जुमलों को साज- बाज दिखा कर अपने कर्त्तव्य को इतश्री मान रही है। एक ओर हिमालय बचाओ के लिए लम्बे-चौड़े वादे करने वाली सरकार पॉलीथिन प्रतिबंध पर जुमले तक सीमित हो गयी है तो दूसरी ओर हिमलय के लिए सबसे घातक पॉलीथिन पर प्रतिबंध करने का नाटक भी कर रही है।
उत्तराखण्ड में हर रोज औसतन 272 टन प्लास्टिक कचरा उत्पादित होता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सर्वे के अनुसार प्रदेश के निकायों में वर्तमान में करीब 1601 टन कचरा (ठोस अपशिष्ट) प्रतिदिन पैदा हो रहा है। अनुमान के अनुसार यदि यही सूरतेहाल रहा तो वर्ष 2041 तक यह आंकड़ा 457.63 टन तक पहुंच जायेगा। अकेले राज्य की राजधानी देहरादून में सर्वाधिक 55.77 टन प्लास्टिक कचरा प्रतिदिन पैदा हो रहा है। आश्चर्य यह है कि शहरी विकास विभाग ने पॉलीथिन पर रोक लगाने के लिए अभी तक कोई औपचारिक आदेश तक नहीं किया है। शहरी विकास विभाग देहरादून का मनना है कि राज्य में वर्ष 2016 से ही पॉलीथिन पर रोक है। फिर अलग से निर्देश जारी करने की आवश्यकता नहीं है। यदि शहरी विकास विभाग की बात को सत्य मान लिया जाये  तो सवाल यह उठाता है कि जब राज्य में 2016 से पॉलीथिन पर प्रतिबंध है तो फिर वह राज्य में धड़ल्ले से क्यों बिक रहा है? यह इस राज्य की विडम्बना ही है कि राज्य सरकार अपने ही वादों पर स्वयं का मजाक बनाती है।

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