बढ़ता शब्द प्रदूषण
सुभाष चन्द्र नौटियाल
कहते हैं सृष्टि निर्माण के समय जड़वत श्री ब्रह्माजी ने सृष्टि को गतिमान करने के लिए कमण्डलु से जल छिड़का वाणी की देवी सरस्वती प्रकट हुई। देवी सरस्वती ने ना सिर्फ सृष्टि को गतिमान किया बल्कि शब्दों की उत्पत्ति कर सृष्टि को वाणी प्रदान की तब से प्रकृति में शब्द संचालक की भूमिका निभाते रहे हैं। शब्द ही कान्तिमय होकर सृष्टि का निर्माण करते हैं परंतु जब-जब कान्तिहीन होकर आक्रमकता को धारण करते हैं तो सृष्टि का विनाश होता है। शब्द ब्रह्म है। शब्द ब्रह्मास्त्र भी है, शब्द सृजन है, शब्द विघटन है, शब्द शक्ति है, शब्द भक्ति है, शब्द तृप्ति है। शब्द मौन है। शब्द वाचाल है, शब्द जीते हैं, शब्द मरते हैं, शब्द जुड़ते हैं, शब्द सन्धि करते हैं। शब्द टूटते हैं बिखरते हैं। शब्द प्रेम है, शब्द लड़ते भी हें, शब्दों से प्यार की रसधारा बहती है, शब्द नफरत की बयार भी फैलाते हैं। शब्द भ्रम है, शब्द शर्म है, शब्द श्रृंगार है, शब्द करूणा है, शब्द योग है, शब्द वियोग है, शब्द अखिल ब्रह्माण्ड में समाये हुए है इसलिए घुलनशील है। शब्द समस्त ब्रह्माण्ड में बिखरे हुए हैं इसलिए अघुलनशील भी है।
शब्द चेतन है, शब्द अचेतन है, शब्द अवचेतन भी है। शब्द सृष्टि का आरंभ है, शब्द सृष्टि का अंत भी है यानि कि सृष्टि में शुरू से लेकर अंत तक शब्द ही समाये हुए हैं यानि कि यूं कहे कि शब्दों में सृष्टि समायी हुई है। शब्द है तो सृष्टि है, शब्द नहीं तो सृष्टि कहां? शब्द सभ्य संस्कृति का निर्माण करती हैं। चराचर जगत् में शब्द भावों में अन्तर्निहित होकर अर्थ के गर्भ में समाहित होते हैं। शब्द जब-जब सृजनात्मक शक्ति को जागृत करते हैं तो सृष्टि का निर्माण होता है। शब्द परमशांति को धारण कर सजृनशील होते हैं। वास्तव में शब्द शक्ति संगठित होकर ऊर्जामयी बनती है तथा यही ऊर्जा एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होकर निरन्तर प्रवाह होती है। उसी को ऊर्जा का परिसंचरण कहा जाता है। शब्द जब-जब नकारात्मक भावों को प्रकट करता है तो यही शब्द हानि के रूप में प्रकट होकर समाज को विघटित कर देते हैं। शब्द नकारात्मक भावों में मृत्युदाता बन जाता है। इसी को संहारक शक्ति कहते हैं तथा यही सृष्टि के विनाश का कारण बनती है।
योग ऋषि पंतजलि ने शब्दानुसार की विवेचना में कहा है कि एक ही शब्द अपने प्रयोग में अनुसार भिन्न-भिन्न अर्थ प्रकट करता है। यानि कि शब्द मरहम भी है और शब्द मारक भी है।
भारतीय दर्शन में सभ्य शब्द का मूल मधुर वाणी है यानि कि जो मधुर बोले वही सभ्यता की श्रेणी में है। वेदों में मधुर बोलने के लिए स्तुतियां की गयी है। सभी संस्कृतियों में शब्दों के महत्व को स्वीकार किया गया है। ईशामसीह ने कहा था कि ‘लेटर किल्थ’ यानि शब्द मारते भी हैं। कबीर ने वाणी की मधुरता को बनाये रखने पर जोर दिया। भारतीय सभ्यता सदा ही अपनी मधुर वाणी के लिए जानी जाती है। परन्तु जब से मानव मन-मस्तिष्क पर भौतिक वादी सोच हावी हुई है तभी से मानव में तीव्रतम संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ी है। भौतिक वस्तुओं की इसी संग्रह की बढ़ी हुई प्रवृत्ति के कारण मानव शब्दों में आक्रामक रूख अख्तियार किया है। यही शब्द आक्रात्मकता मानव को विनाश की ओर धकेल रही है।
भारतीय संदर्भ में इसमें तेजी नब्बे के दशक के बाद आयी जब भारतीय फिजाओं में उदारवाद तथा बाजारवाद जैसे शब्द गूंजने लगे। अपने उत्पाद को बाजार में खपाने के लिए शब्दों का चमत्कारिक ढंग से प्रयोग किया गया जिसके कारण आम जन में अधिकतम उपयोग की प्रवृत्ति बढ़ी, भौतिक वस्तुओं के प्रति बढ़ते अनुराग ने आक्रामक शब्द बोलने की एक नई प्रतिस्पर्धा ने जन्म लिया। एक-दूसरे को नीचा दिखाने तथा अधिकतम भौतिक सुख-सुविधाओं को अपने पक्ष में करने के लिए नये-नये शब्द जाल बुनकर शानदार ढंग से प्रस्तुत किया गया। शब्द बाणों से एक दूसरे को घायल करने तथा बाजार में चित्त करने के लिए नये-नये प्रयोग किए गये। वर्तमान प्रतिर्स्पधा के दौर में शब्द आग के गोलों की तरह बनकर विस्फोटक साबित हो रहे हैं। आग के गोलों की तरह बरसती शब्दावली तीव्र, तीक्ष्ण हिंसक अपशब्दों के आक्रमण से भाषा का रूप और अंतर्मन घायल है। कई बार सार्वजनिक मंचों पर आपसी संवाद की शब्दावली विचित्र रूप धर कर अजीब स्थिति पैदा कर रहा है। लोकतंत्र के चारों स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका न्यायपालिका तथा प्रेस अनेकों बार हिंसक शब्दों के मोह में फंस कर आत्मा को प्रताड़ित कर रहे हैं।
सच तो यह है कि शब्दों में हेरा-फेरी तथा अक्रामक बनाने में राजनीति के धुरंधरों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। आजादी के बाद आयोजित प्रथम चुनाव से लेकर अब तक हमारे राजनेता विकास और सामाजिक मजबूती की बातें तो करते रहे हैं परन्तु उन्हें जमीन पर उतारने के बजाय अपने अगले चुनाव को जीतने की तिगड़म में लग जाते हैं। इसमें कुछ तो बायकादा अपने या पार्टी का खजाना भरने में लग जाते हैं। यही नहीं राजनैतिक दलों के अंदर एक खास वर्ग शब्द भ्रांतिया उत्पन्न कर अलग-अलग किस्म की दीवानगी पैदा करने की कोशिश करता है। इसके लिए जाति, धर्म, इतिहास, भूगोल, सामाजिक रीतियां, व्यवस्थाएं तथा देश का ताने-बाने को मन-माफिक व्यवस्थाएं कुछ इस तरह से प्रस्तुत की जा रही हैं कि लोगों का ध्यान असली मुद्दों से हट कर भटकाव की स्थिति पैदा की जाए। चुनाव-दर-चुनाव इसमें निरन्तर बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है। मैं यहां किसी पार्टी, राजनेता या व्यक्ति विशेष की बात नहीं कर रहा हूँ परन्तु इसका दुष्परिणाम आज हमारे सामने है। आज भारतीय लोकतंत्रा में लोक असल मुद्दों के बजाय नेताओं और उनकी नेतागिरी के तौर-तरीकों पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। नेतृत्व के लिए लालायित आज का राजनेता नेतृत्व हासिल करने के लिए शब्द बाण से कौतुहल पैदा कर विचित्र स्थिति पैदा कर रहा है। यह कड़वा सच है कि हमारे सत्तानायकों ने रह-रहकर सांविधानिक मूल्यों का मजाक उड़ाया है। नियमों-कानूनों परम्पराओं तथा वर्जनाओं को निजी स्वार्थ के चलते कुछ इस तरह से तोड़ा मरोड़ा गया कि सियासी गलियों में यह बात प्रचलित हो चली कि देश का प्रधानमंत्री देश का राजा होता है तथा वह कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है। वह संविधान से भी ऊपर है। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब देश में जबरन कुछ व्यवस्थाओं को थोप दिया गया। जिससे कई बार ऐसा लगता है कि, देश में आज भी राजशाही का सिक्का चलता है। भाषा सामाजिक सम्पदा है। मानव जाति के श्रेष्ठ होने का प्रमाण भी भाषा ही है परन्तु जब शब्द रक्ततप्त होकर आक्रामकता की चाशनी में डूब कर प्रस्फुटित होने लगते हैं तो मानव मन की सामाजिकता तार-तार होकर ढहने लगती है। राजनीति के शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों की वाणी धारा प्रवाह होकर समय-समय पर आग उगलती रहती है। चुनावों के समय यही शब्द आग में घी से लिपटकर भयंकर अग्निकांड में तब्दील हो जाते हैं। वाणी में सहजता, सौम्यता, सरलता जैसे शब्द निरन्तर संकुचित होकर मर रहे हैं। वाणी में कुटिलता का समावेश हो चुका है। उदण्डता, घमण्डता, तथा अपनी छोटी से छोटी उपलब्धिओं को शब्दों के माध्यम से बढ़ा-चढ़ा कर प्रचार-प्रसार करना, मैं और मेरा जैसे शब्दों का अधिकतम उपयोग प्रचण्ड वेग से मानवता को लील रहे हैं। केवल देश में नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में शब्द प्रदूषण नित नये रूप धर कर प्रकट हो रहा है। जिसके कारण सम्पूर्ण प्राणी जगत के अस्तित्व का खतरा उत्पन्न हो चुका है। शब्दों में कुटिलता भर कर कभी पुचकार रहे हैं ,तो कभी ललकार रहें हैं। कभी भय उत्पन्न कर रहे तो कभी स्वयं में उलझ रहे हैं। तीक्ष्ण, उत्तेजक तथा अपशब्द कभी भी भाषायी विकल्प नहीं हो सकते हैं। अपशब्दों का जहर भारतीय भाषाओं को दूषित कर शब्द प्रदूषण में निरन्तर बढोत्तरी कर रहा है। शब्दों के बढ़ते प्रदूषण के कारण भारतीय भाषाओं का ज्ञान तथा आंनदवर्धक विरासत नष्ट हो रही है। तीक्ष्ण, कुकुट, उत्तेजक एवं अपशब्दों का अन्तिम विकल्प अन्ततः केवल हिंसा ही है। लोगों की अकड़ी हुई गर्दन तथा तनी हुई मुठ्ठी शब्दाघात के कारण हिंसात्मक प्रवृति की ओर अग्रसर है। घरों, सड़को, बाजारों तथा सार्वजनिक स्थानों में अनेकों बार केवल आक्रामक शब्दों के कारण ही हिंसात्मक घटनायें घट रही हैं। विडम्बना देखिए सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित लोग सोच समझकर ही अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं ताकि समाज उद्वेलित हो, उन्हीं प्रतिष्ठित लोगों के कारण समाज आज तनाव ग्रस्त है। तनावग्रस्त व्यक्ति, समाज या राष्ट्र कभी भी उन्नति नहीं करते बल्कि अवनति की ओर अग्रसर होते हुए अन्ततः विघटित हो जाते हैं। भारत सहित विश्व के अनेक देश इस समय इस स्थिति से गुजर रहे हैं जहां शब्द प्रदूषण अपने चरम पर है।
ऋग्वेद में वाणी के चार भेद बताये गये हैं- परा, पश्यंती, मध्यमा एवं बैखरी वाणी पहला रूप परा मन में स्थित रहता है। जब बोलने का विचार मन में उठ रहा होता है तो वाणी का दूसरा रूप पश्चंती कहलाता है। तीसरी स्थिति मध्यमा में विचार का शब्द संधान होता है। इस स्थिति में शब्द योजना बनती है। शब्द विवेकीकरण होता है तथा पिफर प्रकटीकरण किया जाता हे। जब वाणी का प्रकटीकरण किया जाता है तो वह वाणी का चौथा रूप बैखरी वाणी कहलाता है। सामान्य मानव केवल वाणी के बैखरी रूप को ही जानता है।
शब्द ही शक्तिदायक होते हैं। कोई मानव शक्तिशाली होगा या शक्तिहीन इसका निर्धारण शब्द ही करते हैं। शब्दों से शक्ति संचरण होता है, इसलिए शब्दों की शुद्धता पर ध्यान देना आवश्यक है। यदि शब्द प्रदूषित होते हैं तो विघटनकारी साबित होते हैं। भाषा जीवन का प्रवाह है। सुंदर मनोहारी शब्द जीवन को सुंदर बनाते हें। अप्रिय शब्द जीवन में विष घोलकर प्रलयकारी होते हैं। सम्पूर्ण विश्व इस समय जल प्रदूषण , वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण की मार झेल रहा है। शब्द प्रदूषण ने सामाजिक छंदबतता को तोड़ कर भाषाई आक्रामकता को जन्म दिया है। शब्दों की यही आक्रामकता विश्व विनाश का कारण बन सकती है। शब्दों की आक्रामकता के कारण मानवीय संवेदनाएं निरन्तर सिकुड़ कर मात्रा खानापूर्ति का साधन बनते जा रहे हैं। अतः समय आ गया है कि बढ़ते शब्द प्रदूषण पर हर स्तर पर गंभीर चिंतन हो।
भाषाई शुद्धता को बनाये रखने के लिए हिंसक, आक्रामकता तीक्ष्ण तथा कटु अपशब्दों को शब्दावली से निकाल बाहर किया जाए। सार्वजनिक पदों पर बैठे उच्च पदस्थ व्यक्तियों के लिए भाषाई प्राविधान निर्धारित करने की आवश्यकता है। राजनेताओं द्वारा बोली जाने वाली भाषा के आधार पर उनका मूल्यांकन किया जाए तथा निरन्तर कटु एवं जन को उद्वेलित करने वाली भाषा के प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबंध की आवश्यकता है। जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रयोग होने वाली भाषा के लिए मानक निर्धारित किये जाए। बढ़ते शब्द प्रदूषण से यदि धरती को बचाना है तो भौतिक वस्तुओं के संग्रह की लालसा का परित्याग करना होगा तभी धरती सुरक्षित रह सकती है।

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