नगर निकायों की अवधारणा
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र के रूप में जाना जाता है यहां की स्थानीय जरूरतों को दृष्टिगत रखते हुए सत्ता के विकेन्द्रकरण की आवश्यकता लम्बे समय से महसूस की जा रही थी। इसी का अनुलन करते हुए भारत सरकार ने 1992 में संविधान में 73वां और 74वां संविधान संशोधन कर महत्वपूर्ण तथा निर्णायक कदम उठाया जहां 73वां संविधान संशोधन ग्राम पंचायतों को सशक्त करता है वहीं 74वां संशोधन नगर निगमों को अधिकार संपन्न बनाता है। संविधान का 74वां संशोधन नगर निकायों को नई दिशा देते हुए एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक निर्णय है। वास्तव में विविधताओं से भरे इस देश के गौरव को बढ़ाते हुए नई शक्ति प्रदान करते है। इन्ही विविधताओं को संरक्षित एवं सम्वर्द्धित करने के लिए भारत सरकार ने सत्ता का विकेन्द्रीकरण करते हुए नगर निकायों तथा ग्राम पंचायतों को अधिकार सम्पन्न करने के लिए 73वां व 74वां संविधान का संशोधन किया। संविधान का 73वां व 74वां संशोधन इसी दिशा में उठाया गया महत्पूर्ण कदम था। नगर निकायों तथा ग्राम पंचायतों को अधिकार संपन्न बनाने के लिए यह दोनों संशोधन लोकतंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। 74वें संशोधन ने शहरी स्थानीय लोक शासन के माध्यम से आम लोगों की सहभागिता स्थानीय स्वशासन में सुनिश्चित की है। हर प्रकार के महत्वपूर्ण निर्णयों में स्थानीय लोगों को सम्मिलित करने से निर्णय प्रक्रिया प्रभावी, पादर्शी व समुदाय के प्रति संवेदनशील हो जाती है। बहुत समय पहले नीति निर्माताओं, वरिष्ठ अधिकारियों तथा कार्यक्रम को संचालित करने वाले अधिकारियों तथा कार्यकर्त्ताओं द्वारा जनता के लिए जो योजनाएं बनाई जाती थी जनभागीदारी के अभाव के कारण वह अपूर्ण रहती थी। क्योंकि वह स्थानीय जनता की जरूरतों को पूरी नहीं कर पाती थी, साथ ही विकास की गतिविधियों को चलाने में लोगों की सहभागिता को प्रोत्साहित नहीं करती थी। इसीलिए यह महसूस किया गया कि लोगों की कार्ययोजनाएं जनभागीदारी से सुनिश्चित की जाये। ताकि विकास में सभी जन सहभागिता निभा सकें। शहर की आवश्यकताओं को समझने के लिए तथा जनभागीदारी को बढ़ाने के लिए 74वें संविधान संशोधन की अवधारणा प्रस्तुत की गयी।
74वें संविधान संशोधन की आवश्यकता
पूर्व की नगरीय स्थानीय स्वशासन व्यवस्था लोकतन्त्र की मंशा के अनुरूप नहीं थी। सबसे पहली कमी इसमें यह थी कि इसका वित्तीय आधार कमजोर था। वित्तीय संसाधनों की कमी होने के कारण नगर निकायों के कार्य संचालन पर राज्य सरकार का ज्यादा से ज्यादा नियंत्रण था। जिसके कारण धीरे-धीरे नगर निकायों के द्वारा किये जाने वाले अपेक्षित कार्यों/या उन्हें सौंपे गये कार्यां में कमी होने लगी। नगर निकायों के प्रतिनिधियों की बरखास्ती या नगर निकायों का कार्यकाल समाप्त होने पर भी समय पर चुनाव नहीं हो रहे थे। इन निकायों में कमजोर व उपेक्षित वर्गों (महिला, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति)का प्रतिनिधित्व ना के बराबर था। अतः इन कमियों को देखते हुए संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम में स्थानीय नगर निकायों की संरचना, गठन, शक्तियों, और कार्यों में अनेक परिवर्तन का प्राविधान किया गया ।
74वें संविधान संशोधन के पीछे सोच
संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम द्वारा नगर-प्रशासन को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है।
इस संशोधन के अन्तर्गत नगर निगम, नगर पालिका, नगर परिषद एवं नगर पंचायतों के अधिकारों में एक रूपता प्रदान की गई है।
नगर विकास व नागरिक कार्यकलापों में आम जनता की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया तक नगर व शहरों में रहने वाली आम जनता की पहुंच बढ़ाई गई है।
समाज कमजोर वर्गों जैसे महिलाओं, अनुसूचित जाति, जनजाति व पिछड़े वर्गों का प्रतिशतता के आधार पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर उन्हें भी विकास की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास किया गया है।
74वें संशोधन के माध्यम से नगरों व कस्बों में स्थानीय स्वशासन को मजबूत बनाने के प्रयास किये गये हैं।
इस संविधान की मुख्य भावना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की सुरक्षा, निर्णय में अधिक पारदर्शिता व लोगों की आवाज पहुंचाना सुनिश्चित करना है।
74वें संविधान संशोधन के उद्देश्य
देश में नगर संस्थाओं जैसे नगर निगम, नगर पालिका, नगर परिषद तथा नगर पंचायतों के अधिकारों में एकरूपता रहे।
नागरिक कार्यकलापों में जन प्रतिनिधियों का पूर्ण योगदान तथा राजनैतिक प्रक्रिया में निर्णय लेने का अधिकार रहे।
नियमित समयान्तराल में प्रादेशिक निर्वाचन आयोग के अधीन चुनाव हो सके व कोई भी निर्वाचित नगर प्रशासन छः माह से अधिक समयावधि तक भंग न रहे, जिससे कि विकास में जनप्रतिनिधियों का नीति निर्माण, नियोजन तथा क्रियान्वयन में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
समाज की कमजोर जनता का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिये (संविधान संशोधन अधिनियम में प्राविधानित/निर्दिष्ट) प्रतिशतता के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति व महिलाओं को तथा राज्य (प्रादेशिक) विधान मण्डल के प्राविधानों के अन्तर्गत पिछड़े वर्गों को नगर प्रशासन में आरक्षण मिलें।
प्रत्येक प्रदेश में स्थानीय नगर निकायों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिये एक राज्य (प्रादेशिक) वित्त आयोग का गठन हो जो राज्य सरकार व स्थानीय नगर निकायों के बीच वित्त हस्तान्तरण के सिद्वान्तों को परिभाषित करें। जिससे कि स्थानीय निकायों का वित्तीय आधार मजबूत बने।
सभी स्तरों पर पूर्ण पारदर्शिता रहे।
नगर निकायों के गठन एवं संरचना
शहरी क्षेत्रों के आकार व जनसंख्या आधारित
अधिक आबादी वाले/महानगरीय क्षेत्रों में - नगर निगम का गठन होगा (एक लाख से ज्यादा जनसंख्या वाले नगर)
छोटे नगरीय क्षेत्रों में- नगरपालिका परिषद का गठन होगा (50 हजार से एक लाख तक जनसंख्या वाले नगर)
संक्रमणशील (ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों में परिवर्तित होने वाले क्षेत्र ) क्षेत्रों में- नगर पंचायत का गठन होगा (50 हजार तक जनसंख्या वाले नगर)
नगर निगम, नगर पालिका परिषद व नगर पंचायत स्तर पर जनता द्वारा एक अध्यक्ष निर्वाचित किया जायेगा
नगरीय क्षेत्र के प्रत्येक वार्ड से प्रत्यक्ष रूप से सदस्य निर्वाचित किये जायेंगे जिनकी संख्या वार्डों की संख्या के आधार पर राज्य सरकार द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार होगी।
पदेन सदस्य के रूप में नगर निकायों में लोकसभा एवं राज्य विधान सभा के ऐसे सदस्य शामिल किये जायेंगे, जो नगरीय निकाय क्षेत्र (पूर्णतः या भागतः) के निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
पदेन सदस्य के रूप में राज्य सभा व राज्य विधान परिषद के ऐसे सदस्य जो नगरीय निकाय क्षेत्र के अन्दर निर्वाचकों के रूप में पंजीकृत है।
नगरपालिका प्रशासन में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले निर्दिष्ट/नामित सदस्य स्थानीय निकायों में शामिल किये जायेंगे।
संविधान के अनुच्छेद 243-एस. के प्रस्तर (5) के अधीन स्थापित समितियों के अध्यक्ष यदि कोई हो।
बुनियादी शहरी कार्य
74वें संविधान अधिनियम के 12वीं अनुसूची के अंतर्गत 18 कार्य/ दायित्व शहरी स्थानीय निकायों को दिये गये हैं, राज्य सरकार उन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु राज्य वित्त आयोग के माध्यम से धनराशि उपलब्ध कराती है तथा केन्द्र वित्त आयोग द्वारा विकास कार्यों के लिए धन उपलब्ध कराया जाता है। केन्द्र वित्त आयोग द्वारा उपलब्ध कराई गयी धनराशि का उपयोग वेतन, मजदूरी आदि में नहीं किया जा सकता। बल्कि पथ प्रकाश, साफ-सफाई, स्वच्छता आदि कार्यों में यह धनराशि खर्च की जाती है। बुनियादी शहरी कार्य निम्नवत् हैं -
1. शहरी नियोजन सहित शहर की योजना
2. भूमि उपयोग तथा भवनों के निर्माण का विनियमन
3. आर्थिक तथा सामाजिक विकास के लिये योजना
4. शहर में सड़के, सम्पर्क मार्ग , पुल आदि
5. घरेलू, औद्योगिक और वाणिज्यक योजनाओं के लिए जलापूर्ति
6. सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता, संरक्षण और ठोस अपशिष्ठ प्रबन्धन
7. अग्निशमन सेवाएं
8. पर्यावरणीय शहरी वानिकी संरक्षण और पारिस्थितिकी पहेलुओं के प्रचार
9. अपंग व मानसिक रूप से मंद होने सहित समाज के कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा करना
10. झोपड़ पट्टी सुधार एवं उन्नयन
11. शहरी गरीबी उन्नमूलन
12. शहरी सुविधाओं जैसे पार्क, उद्यान तथा खेल के मैदानों का प्राविधान
13. सांस्कृति, शैक्षिक और सौन्दर्य पहलूओं का प्रचार
14. दफन और शमशान भूमि तथा विद्युत शवदाह गृह
15. मवेशी, तालाब, जानवरों के प्रति क्रुरूरता की रोकथाम
16. जन्म-मृत्यु के पंजीकरण सहित महत्वपूर्ण आंकडे़
17. पथ रोशनी, पार्किंग स्थल, बस स्टॉफ और सार्वजनिक सुविधाओं सहित सार्वजनिक वाचनालय आदि
18. कतल घरों तथा टैनरिज का विनियमन
वित्तीय प्रबन्धन
नगर निकायों में वित्तीय प्रबन्धन 74वें संविधान संशोधन के अनुसार नगर निकायों के आय के निम्नलिखित स्रोत हैं-
1. राज्य वित्त आयोग के द्वारा निर्धारित धनराशि।
2. नगर निकायों द्वारा वसूले गये करों से प्राप्त धनराशि।
3. राष्ट्रीय वित्त आयोग के द्वारा निर्धारित धनराशि ।
राज्य सरकार द्वारा नगरीय निकायों में समय-समय पर अनुदान देने की प्रथा को समाप्त कर राज्य सरकार द्वारा प्राप्त कुल करों में नगरीय स्थानीय निकायों के अंश का निर्धारण किया गया।
स्थानीय निकायों को दी जाने वाली राशि के वितरण का आधार 80 प्रतिशत जनसंख्या एवं 20 प्रतिशत क्षेत्र के आधार पर निर्धारित किया गया है।
इसके अतिरिक्त प्रत्येक केन्द्रीय वित्त आयोग प्रतिवर्ष शहरी स्थानीय निकायों के लिए धन आवंटित करता है।
आयोग के निर्देशानुसार केन्द्रीय वित्त आयोग द्वारा दी गई राशि का उपयोग वेतन, मजदूरी में नहीं किया जाएगा बल्कि यह सामान्य सुविधाएं जैसे जल निकासी, कूड़ा निकासी, शौचालयों की सफाई, मार्ग प्रकाश इत्यादि में ही इसका उपयोग किया जाएगा।
जीरो बेस बजटिंग (शून्य आधार बजट)
बजट नगर निकायों की एक विधिक आवश्यकता है नगर निकायों में शून्य आधारित बजट (जेड.बी.बी.) बजट तैयार किया जाता है। बजट बनाने का यह एक तरीका है जिसमें सभी खर्चों का प्रत्येक नई अवधि के लिए उचित (Justification )ठहराया जाना चाहिए। शून्य आधारित बजट की प्रक्रिया शून्य आधार (zero
baseline ) से शुरू होती है। शून्य आधारित बजट किसी भी संगठन के भीतर प्रत्येक कार्य का विशलेषण उसकी आवश्यकताओं और लागतों के लिए किया जाता है। उसके इसके बाद बजट आगामी अवधि के लिए आवश्यकता अनुसार बनाया जाता है। भले ही प्रत्येक बजट पिछले एक से अधिक या कम हो शून्य आधारित बजट संगठन के विशिष्ट कार्यात्मक क्षेत्रों में उन्हें जोड़ कर बजट प्रक्रिया में शीर्ष स्तरीय रणनीतिक लक्ष्यों को लागू करने की अनुमति देता है। जहां लागतों को पहले समुहिकृत किया जा सकता है, तथा पिछले परिणामों तथा वर्तमान अपेक्षाओं के मुकाबले मापा जा सकता है।
नगरीय निकायों में लगाये जाने वाले कर
भवनों या भूमियों या दोनों के वार्षिक मूल्य पर कर।
नगर पालिका की सीमा के अन्तर्गत व्यापार पर कर जिन्हें नगर पालिका की सेवाओं से विशेष लाभ मिलता है।
व्यापार, पेशों तथा व्यवसायों पर कर जिसमें सभी रोजगार जिनके लिये वेतन या शुल्क मिलता है वह सम्मिलित हैं।
मनोरंजन कर।
नगरपालिका के अंदर भाड़े पर चलने वाली गाड़ियों या उसमें रखी गई गाड़ियों पर कर।
नगरपालिका के अन्दर रखे कुत्तों पर कर।
नगर पालिका के अन्दर रखे सवारी, चालन या बोझे के पशुओं पर कर।
व्यक्तियों पर सम्पत्तियों या परिस्थितियों के आधार पर कर।
भवनों या भूमि या दोनों के वार्षिक मूल्य पर जल कर।
भवन के वार्षिक मूल्य पर उर्तक मूल्य पर उत्प्रवाह कर।
सफाई कर।
शौचालयों, मूत्रालयों तथा गड्ढ़ों से उत्प्रवाह तथा प्रदूषित जल के एकत्रीकरण, हटाने तथा खात्मा करने के लिए कर।
नगर पालिका की सीमा के अन्तर्गत स्थित सम्पत्ति के हस्तांतरण पर कर।
संविधान के अन्तर्गत कोई अन्य कर जो राज्य विधायिका द्वारा राज्य में लागू किया जा सके।
प्रावधान
3 व 8 के कर एक साथ नहीं लगाए जा सकते हैं।
10 व 12 के कर एक साथ नहीं लगाए जा सकते हैं।
13 के अन्तर्गत नगर पालिका के अन्तर्गत अचल सम्पति के हस्तांतरण पर कर नहीं लगाया जा सकता है। (यदि वह सम्पति नजूल की हो)
5 का कर मोटर गाड़ी, पर नहीं लगाया जा सकता है।
मूल्यांकन , छूट व वसूली
भवन या भूमि दोनों पर कर लगाने के लिए नगर निकाय एक मूल्यांकन सूची तैयार कर एक सार्वजनिक स्थल पर प्रदर्शित कर सकते हैं ताकि जिन लोगों को आपत्ति हो वह एक महीने के अन्दर दाखिला कर सकें। जब आपत्तियों का निवारण हो जाता है तब मूल्याँकन सूची को प्रमाणित किया जाता है। प्रमाणित मूल्याँकन सूची नगर निकाय कार्यालय में जमा कर दी जाती है तथा उसे जनता द्वारा निरीक्षण के लिये खुला घोषित कर दिया जाता है। सामान्यतः नई मूल्याँकन सूची पाँच वर्ष में एक बार तैयार की जाती है। नगर निकाय किसी समय मूल्यांकन सूची को बदल सकते हैं या उसमें संशोधन कर सकते हैं। यदि कोई भवन या भूमि वर्ष में 90 या अधिक दिनों तक लगातार खाली रहती है तो नगर पालिका उस अवधि में कर छूट देती है। उस भवन या भूमि के पुनः कब्जे के लिए उस सम्पत्ति के मालिक को 15 दिनों के अंदर नगरपालिका को सूचना देनी होती है। अगर कोई ऐसा नहीं करता तो वह दंड का भागी होता है। दण्ड की राशि वास्तविक कर की दुगुनी राशि से दस गुना राशि से भी अधिक हो सकती है।
नगर पालिका करों से संबंधित अपीलें नगर पालिका कार्यालय में दायर की जा सकती है। साथ ही साथ इसकी एक प्रति जिलाधिकारी के यहाँ भी जाती है। सामान्यतः किसी भी अवधि के लिए देय कर या शुल्क का भुगतान उसकी अवधि के शुरू होने से पूर्व करना होता है। जब व्यक्ति कर का भुगतान समय पर नहीं करता तो उसके विरूद्व नगरपालिका द्वारा वारंट जारी हो जाता है। ऐसे व्यक्ति के अहाते से सम्पति को जब्त कर उसे नीलामी द्वारा बेचा जा सकता तथा बकायों की वसूली की जा सकती है। जब कोई व्यक्ति किसी कर का बकायेदार हो तो नगरपालिका कलेक्टर से प्रार्थना कर सकती है कि वह ऐसे धन को भू-राजस्व की भाँति वसूल करें, जिसमें कार्यवाही का खर्च शामिल नहीं होगा। कलेक्टर जब बकाया धन से संतुष्ट हो जाता है तो उसे वसूल करने की कार्यवाही करता है।
नगर निकायों का कार्यकाल
नगर निगम, नगर पालिका, एवं नगर पंचायतों का कार्यकाल पहली बैठक के दिन से पांच वर्ष तक रहेगा। अगर किसी कारणवश 74वें संविधान संशोधन के नियमों के अनुरूप नगर निकाय अपनी जिम्मेदारियों व उत्तरदायित्वों को पूरा नहीं करते या उनमें अनियमित्ता पायी जाती है तो पांच वर्ष पूर्व भी राज्य सरकार इन्हें भंग या बर्खास्त कर सकती है। बर्खास्त/भंग करने के 6 माह के अन्दर अनिवार्य रूप से चुनाव करवाकर नया बोर्ड गठित किया जाना आवश्यक है। नगर निकायों को भंग करने से पूर्व सुनवाई का एक न्यायोचित्त अवसर दिया जायेगा।
नगर निकायों की बैठकें व उनकी कार्यवाहियाँ
कार्यपालक पदाधिकारी द्वारा निश्चित दिन तथा नियत समय पर एक माह में कम से कम एक बैठक आयोजित की जाएगी। अध्यक्ष के निर्देश पर अन्य बैठकें भी कार्यपालक अधिकारी द्वारा बुलायी जा सकती हैं। यदि नगर निकाय के पास कार्यपालक पदाधिकारी नहीं है तो अध्यक्ष बैठक आयोजित करेगा। आवश्यकता पड़ने पर किसी भी दिन या समय पर नोटिस देने के बाद अघ्यक्ष द्वारा आपातकालीन बैठक बुलायी जा सकती है। आपातकालीन बैठकों के अतिरिक्त अन्य बैठकों हेतु नोटिस को कम से कम 3 दिन पूर्व सभी सदस्यों को भेजा जाना अनिवार्य होगा। नोटिस की अवधि 3 दिन से अधिक भी हो सकती है। आपातकालीन बैठकों के मामले में यह अवधि कम से कम 24 घंटे की होनी चाहिए। बैठक हेतु प्रत्येक सूचना में बैठक की तिथि, समय तथा स्थान का उल्लेख आवश्यक है। बैठक की गणपूर्ति कुल सदस्यों के एक तिहाई सदस्यों की उपस्थिति मानी जायेगी। गणपूर्ति के अभाव में बैठक स्थगित कर दी जायेगी तथा तय की गई तिथि को बैठक आयोजित की जाएगी। जिसकी सूचना आयोजन के कम से कम तीन दिन पूर्व दी जाएगी। बैठक की कार्यवाही को कार्यवाही पुस्तिका में अंकित किया जाएगा जिस पर अध्यक्ष का हस्ताक्षर होगा कार्यवाही की प्रतियों को राज्य सरकार या राज्य सरकार द्वारा निदेशित प्राधिकारी को तुरन्त भेज दी जाएगी। परिस्थितियों की अनुकूलता के आधार पर अधिशासी अधिकारी अथवा सचिव द्वारा बैठक से पूर्व सभी सदस्यों को बैठक से सम्बन्धित अभिलेख, पत्राचार जो उस बैठक में विचार किये जायेगें, दिखाये जायेंगे जब तक कि अध्यक्ष अथवा उपाध्यक्ष द्वारा अन्यथा निर्देशित किया गया हो।
किसी सदस्य द्वारा बैठक में कोई प्रस्ताव लाना
यदि कोई सदस्य, बैठक में कोई प्रस्ताव लाना चाहता है तो उसे कम से कम एक सप्ताह पूर्व अघ्यक्ष को अपने इस विचार से लिखित रूप में अवगत कराना होगा। कोई भी सदस्य सभा में व्यवस्था के प्रश्न को अध्यक्ष के समक्ष उठा सकता है लेकिन उस पर तब तक कोई चर्चा नहीं की जायेगी जब तक कि उपस्थित सदस्यों की राय जानने हेतु अध्यक्ष उपयुक्त न समझे। किसी भी प्रस्ताव अथवा प्रस्तावित संशोधन पर विचार-विमर्श से पूर्व अध्यक्ष सदस्यों से उस प्रस्ताव के समर्थन की मांग कर सकता है। प्रत्येक सदस्य/सभासद अपने स्थान से अघ्यक्ष को सम्बोधित करते हुए ही प्रश्न पूछ सकता है, एवं उस पर चर्चा कर सकता है। प्रस्तुतकर्ता के अतिरिक्त कोई भी सदस्य किसी प्रस्ताव या संशोधन पर अध्यक्ष की अनुमति के बिना दो बार नहीं बोलेगा। बैठक की कार्य सूची/कार्यवाही से सम्बन्धित सभी प्रश्न किसी/एक सदस्य द्वारा दूसरे सदस्य से अध्यक्ष के माध्यम से ही पूछे अथवा प्रस्तुत किये जाएगें। अध्यक्ष द्वारा बैठक की कार्यवाही/कार्यसंचालन निम्न क्रम से की जायेगी-
सर्वप्रथम गत बैठक का कार्यवृत्त पढ़ा जाऐगा।
यदि प्रथम बैठक है, तो गत माह का लेखा बोर्ड के विचारर्थ तथा आदेशार्थ प्रस्तुत होगा।
स्थानीय शासन तथा उनके अधिकारियों से प्राप्त पत्रों/सूचनाओं को पढ़ा जाऐगा।
समितियों तथा सदस्यों के प्रतिवेदन यथा आवश्यक आदेशार्थ तथा स्वीकृतार्थ विचार किये जाऐगें।
निर्धारित प्रक्रियानुसार सूचित किये गये प्रस्तावों पर चर्चा व मतदान कराया जायेगा।
अगली बैठक में लाये जाने वाले प्रस्तावों का नोटिस/सूचना दी जाऐगी।
समितियों, अधिकारियों आदि के आदेशों की अपीलों का निस्तारण किया जाएगा।
नगरीय निकायों में वार्ड कमेटियाँ
स्थानीय लोग स्थानीय विकास में भागीदारी निभा सकें इसलिए संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम के अन्तर्गत स्थानीय नगरीय सरकार के लिए शक्तियों एवं सत्ता का विकेन्द्रीकरण किया गया है।
संशोधन के माध्यम से विकेन्द्रीकरण के द्वारा ऐसे संस्थागत ढ़ांचे का निर्माण करने का प्रयास किया गया जिससे सभी स्तर के लोग स्थानीय विकास में भागेदारी निभा सकें। नगरीय निकायों के इस ढ़ाचे को हम स्थानीय स्वशासन की दो स्तरों पर की गई व्यवस्था के रूप में जानते हैं।
पहला स्तर नगर निकाय स्तर पर चयनित सरकार है जिसमें स्थानीय लोग प्रतिनिधि के रूप में चुनकर आते हैं जो स्थानीय समस्याओं की बेहतर समझ के साथ स्थानीय विकास के लिए प्रयास करते हैं।
दूसरे स्तर पर वार्ड कमेटियों के गठन का प्रावधान है जिससे कि वार्ड के स्तर पर भी लोग विकास के लिए नियोजन से लेकर निर्णय लेने की प्रक्रिया एवं विकास कार्यों के क्रियान्वयन में अपनी भागीदारी निभा सकें।
74वें संविधान की धारा 243(1) के अनुसार यह व्यवस्था केवल उन शहरों में लागू होती है जिनकी जनसंख्या तीन लाख या उससे अधिक हो। जिन शहरों की जनसंख्या तीन लाख है या उससे कम है, वहाँ पर राज्य सरकार अन्य समीतियों को गठित करने को स्वतंत्र है। वार्ड कमेटी पाँच या उनसे अधिक वार्डों से मिलकर बनती है, जिसमें एक अध्यक्ष तथा जितने भी वार्ड उस कमेटी में हैं के चयनित प्रतिनिधि/सदस्य उसके होते हैं।
नगरीय स्थानीय स्वशासन के तीन व्यक्ति जो इससे संबंधी मुद्दों/समस्याओं के बारे में विशेष ज्ञान रखते हों उसके वार्ड के नामित सदस्य होते है। उन्हीं में से किसी एक व्यक्ति का चुनाव एक वर्ष के लिए अध्यक्ष के पद के लिए होता है। जो यदि चाहे तो दुबार अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ सकता है।
वार्ड कमेटी का कार्यकाल उक्त नगर निकाय की अवधि के साथ समाप्त होता है।
संविधान के 74वें संशोधन के अनुसार वार्ड कमेटियों का व्यवहारिक रूप में वह स्वरूप नहीं बन पा रहा है जिसकी कल्पना की गई थी। एक सशक्त वार्ड कमेटी की भूमिकाओं में वार्ड/वार्डों की समस्याओं की पहचान कर उनकी प्राथमिकताएं तय करना, नगर निकायों के द्वारा कराये जा रहे कार्यों का निरीक्षण, नियोजन एवं विकासात्मक गतिविधियों का संचालन, वार्षिक आम सभा का आयोजन, म्यूनिसीपल वार्ड की जवाबदेही एवं इनके कार्यां में पारदर्शिता इत्यादि हो सकती है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें