विश्व साक्षरता दिवस
-शिवानी पाण्डे
8 सितम्बर 1966 को सर्वप्रथम संयुक्त राष्ट्र के शिक्षा एवं सांस्कृति विभाग यूनेस्को द्वारा विश्व साक्षरता दिवस की शुरूआत की गयी थी। इसका उद्देय दुनिया के सभी लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक करना है। यूनेस्को के अनुसार ‘‘साक्षरता सिर्फ शैक्षणिक प्राथमिकता नहीं यह भविष्य के लिए जबरदस्त निवेश है।’’ विश्व में जैसे-जैसे साक्षरता की दर बढ़ती गयी है वैसे-वैसे विश्व का मानव अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुआ है। यदि भारत के सम्बन्ध में बात की जाय तो साक्षरता दर बढ़ने के साथ-साथ यहां का व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति जागरूक तो हुआ है परंतु कर्तव्य बोधता से दूर हुआ है। ज्ञात हो की पूर्व काल में अपनी उच्चकोटी की साक्षरता के दम पर ही भारत विश्व गुरू कहलाया था। तक्षशिला, नालंदा एवं वैदिक काल में कण्वाश्रम जैसे विश्व विद्यालय भारत में स्थापित थे। जिनकी धमक पूरे विश्व में महसूस की जाती थी। जैसे-जैसे भारत में साक्षरता दर गिरती गयी हम गुलामी की तरफ बढ़ते गये किसी भी शिक्षा का उद्देय मात्र साक्षर करना नहीं होना चाहिए बल्कि व्यापकता के साथ गुणवत्ता से परिपूर्ण होनी चाहिए। गुणात्मक साक्षरता ही किसी भी देश की सरकार का मूल लक्ष्य होना चाहिए। संख्यात्मक साक्षरता बढ़ाने के बजाय गुणात्मक साक्षरता में जोर दिया जाना चाहिए। भारत की साक्षरता को यदि आंकड़ो के आईने में देखे तो प्रतीत होता है कि भारत में साक्षरता की दर बढ़ी है, परन्तु गुणात्मक साक्षरता में आज भी हम बहुत पीछे रह गये हैं। सन् 1950 में भारत में साक्षरता की दर मात्र 18 फीसदी थी जो 1991 में बढ़कर 52 फीसदी तथा 2001 में 65 फीसदी हो गयी थी। परन्तु 2011 में यह मात्र 75.06 फीसद ही हो पाई। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 82.16 पुरूष तथा 65.46 फीसद महिलाएं साक्षर हैं। भारत में साक्षरता की गुणात्मक वृद्धि करने के लिए सरकार को विशेष प्रयास करने चाहिए। 100 फीसदी साक्षता का लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकार को शिक्षा व्यवस्था में सुधार करते हुए प्रयोगात्मक साक्षरता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
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