दशहरा : अधर्म पर धर्म की विजय का पर्व - TOURIST SANDESH

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बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

दशहरा : अधर्म पर धर्म की विजय का पर्व

 दशहरा : अधर्म पर धर्म की विजय का पर्व 

विवेक बनियाल (स्वतंत्र पत्रकार)

     भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है। यहां की भूमि हर रोज नित नए त्योहारों से महकती है। जैसे मकर संक्रांति, होली, दीपावली, दशहरा, ईद, ओणम, गंगा स्नान.... इत्यादि। इनमें से दशहरा एक प्रमुख त्योहार है। दशहरा भारत के सबसे प्रमुख, पवित्र और उत्साहपूर्वक मनाए जाने वाले त्योहारों में से एक है। यह पर्व अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की शाश्वत विजय का प्रतीक है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, दशहरा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है, जो अंग्रेजी महीनों के अनुसार प्रायः सितंबर या अक्टूबर में आता है। इस पावन पर्व पर देश भर में हर्ष और उल्लास का माहौल रहता है। इस वर्ष दशहरा 20 अक्टूबर को पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाएगा।

       'दशहरा' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों 'दश' (दस) और 'हरा' (हार/पराजय) से मिलकर हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है दस सिर वाले रावण की हार। वहीं, इसे 'विजयादशमी' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'दसवें दिन मिलने वाली विजय'। यह त्योहार नौ दिनों के पावन 'नवरात्रि' उत्सव के ठीक अगले दिन यानी दसवें दिन मनाया जाता है, जो नारी शक्ति और पुरुषार्थ दोनों की विजय गाथा को दर्शाता है। 

दशहरे के पीछे दो मुख्य पौराणिक कथाएं सबसे ज्यादा प्रचलित हैं:

1.भगवान श्रीराम द्वारा रावण का वध: रामायण के अनुसार, लंका का राजा रावण माता सीता का हरण करके ले गया था। भगवान श्रीराम ने अपनी वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई की और नौ दिनों तक भीषण युद्ध चला। अंततः आश्विन शुक्ल दशमी के दिन श्रीराम ने अत्याचारी और अहंकारी रावण का वध कर माता सीता को मुक्त कराया। 

मां दुर्गा द्वारा महिषासुर मर्दिनी रूप: एक अन्य मान्यता के अनुसार, महिषासुर नामक महिष (भैंसे) रूपी असुर ने देवताओं पर अत्याचार कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। तब सभी देवताओं की शक्ति से मां दुर्गा प्रकट हुईं। उन्होंने नौ दिनों तक महिषासुर से युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध कर दिया। इसी कारण इस दिन को 'विजयादशमी' के रूप में पूजा जाता है।

. देश भर में उत्सव और मनाने के तरीके

 दशहरा पर्व की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसे भारत के अलग-अलग राज्यों में अनोखे और विविधतापूर्ण तरीकों से मनाया जाता है: 

उत्तर और मध्य भारत:

जगह-जगह रामलीला का मंचन होता है। दशमी की शाम को रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतलों में पटाखे भरकर उनका दहन किया जाता है।

पश्चिम बंगाल व पूर्वी भारत:

इसे दुर्गा पूजा के समापन (विजयादशमी) के रूप में मनाते हैं। इस दिन सिंदूर खेला की रस्म के बाद मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है।

मैसूर (कर्नाटक)

  यहाँ का दशहरा विश्व प्रसिद्ध है। मैसूर महल को लाखों बत्तियों से सजाया जाता है और हाथियों पर मां चामुंडेश्वरी की भव्य झांकी निकाली जाती है।

कुल्लू (हिमाचल प्रदेश)

  यहाँ कुल्लू के पहाड़ों में भगवान रघुनाथ (श्रीराम) की रथयात्रा निकाली जाती है, जिसमें कई स्थानीय देवी-देवता शामिल होते हैं।

छत्तीसगढ़)

  यहाँ का दशहरा सबसे लंबा (लगभग 75 दिनों तक) चलता है, जिसमें प्रकृति और दंतेश्वरी माता की विशेष पूजा की जाती है।

 धार्मिक और सामाजिक परंपराएं :

दशहरे के दिन धार्मिक रूप से कई महत्वपूर्ण अनुष्ठान किए जाते हैं

शस्त्र और वाहन पूजा: प्राचीन काल में राजा इस दिन अपनी विजय यात्रा पर निकलते थे। आज भी लोग इस दिन अपने हथियारों, औजारों, गाड़ियों और व्यापारिक मशीनों की पूजा (आयुध पूजा) करते हैं।

 नया कार्य आरंभ: इस तिथि को बेहद शुभ और 'अबूझ मुहूर्त' माना जाता है। लोग इस दिन नए व्यवसाय, गृह प्रवेश, या किसी भी नए कार्य की शुरुआत करते हैं। 

मेलों का आयोजन: इस दिन देश के कोने-कोने में बड़े-बड़े मेलों का आयोजन होता है, जहाँ बच्चे और परिवार नए कपड़े पहनकर मिठाइयों और झूलों का आनंद लेते हैं। 

 दशहरे का नैतिक व आध्यात्मिक संदेश :

    दशहरा केवल पुतले जलाने या मनोरंजन का त्योहार नहीं है, बल्कि इसका गहरा आध्यात्मिक संदेश है। रावण के दस सिर हमारे भीतर छिपी 10 मानवीय बुराइयों (पापों) का प्रतीक माने जाते हैं: 

काम (वासना), क्रोध (गुस्सा), लोभ (लालच), मोह (अत्यधिक लगाव), मद (अहंकार/घमंड), मत्सर (ईर्ष्या), स्वार्थ, आलस्य, हिंसा, चोरी।

    पुतला दहन का वास्तविक अर्थ यह है कि हम हर साल अपने भीतर के इन विकारों और नकारात्मकताओं को जलाएं और सत्य, न्याय व नैतिकता के मार्ग पर चलने का संकल्प लें। 

        दशहरा हमें याद दिलाता है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली या विशाल क्यों न हो, सत्य और धर्म के सामने उसे एक न एक दिन घुटने टेकने ही पड़ते हैं। यह त्योहार समाज में आपसी भाईचारे, सांस्कृतिक एकता और सकारात्मकता का संचार करता है। आज के आधुनिक युग में इस पर्व की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है ताकि हम अपने समाज को नैतिक मूल्यों से समृद्ध बनाए रख सकें।

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