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सोमवार, 4 मई 2026

पेज एंड स्टेज: लिटरेरी फेस्ट के दूसरे संस्करण का हुआ आयोजन

पेज एंड स्टेज: लिटरेरी फेस्ट के दूसरे संस्करण का हुआ आयोजन 


देहरादून। एलिसियन, दून विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग की साहित्यिक सोसायटी, ने जश्न इवेंट्स के सहयोग से “पेज एंड स्टेज: लिटरेरी फेस्ट” के दूसरे संस्करण का आयोजन शनिवार को सीनेट हॉल, एडमिन ब्लॉक में हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल, विभागाध्यक्ष एवं डीन प्रो. चेतना पोखरियाल, विशिष्ट अतिथियों तथा संकाय सदस्यों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। अपने उद्घाटन संबोधन में प्रो. डंगवाल ने अंग्रेज़ी विभाग और सम्मानित अतिथियों को हार्दिक शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने छात्रों को क्षेत्रीय साहित्य और भाषाई विरासत पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया तथा यह घोषणा की कि ‘अंडरस्टैंडिंग भारत एंड भाषा साहित्य’ विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम नवंबर के तीसरे सप्ताह में आयोजित होने की संभावना है, जिससे दून विश्वविद्यालय भाषा और सांस्कृतिक विमर्श का एक प्रमुख केंद्र बन सकेगा। कार्यक्रम की शुरुआत एक पुस्तक-चर्चा से हुई, जिसमें लेखक और 1997 बैच के सिविल सेवक मुकुल कुमार ने अपनी पुस्तक “Women in the Womb of Time: Unveiling Ancient Feminism” पर विचार साझा किए। श्री कुमार ने ऋग्वेद, उपनिषद और थेरिगाथा जैसे प्राचीन हिंदू और बौद्ध ग्रंथों का संदर्भ देते हुए स्त्री-सशक्तिकरण की प्रारंभिक आवाज़ों को सामने रखा।

इसके बाद ‘द वर्ल्ड ऑफ रीजनल लैंग्वेजेज़ – हिस्ट्री, आइडेंटिटी एंड कंटेम्पररी कॉन्टेक्स्ट्स’ विषय पर एक पैनल चर्चा आयोजित की गई, जिसका संचालन प्रसिद्ध गढ़वाली लेखक एवं सांस्कृतिक कार्यकर्ता मदन मोहन दुकलान ने किया। चर्चा का केंद्र उत्तराखंडी भाषाएँ रहीं। कवि एवं लोक-साहित्यकार देवेश जोशी ने भाषा के मानकीकरण के महत्व पर बल दिया, वहीं शोधकर्ता एवं लेखक आशीष सुंद्रियाल ने बताया कि कैसे स्थानीय संगीत और जागर उत्तराखंड की मौखिक परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। लेखिका एवं शिक्षिका बीना बेंजवाल ने लोक कथाओं और गीतों के संरक्षण में महिलाओं की भूमिका को रेखांकित किया, जबकि पत्रकार गिरीश सुंद्रियाल ने साहित्य को प्रतिरोध और पहचान के रूप में प्रस्तुत किया। पैनल ने सामूहिक रूप से गढ़वाली और कुमाऊँनी भाषाओं के मानकीकरण, शिक्षा में उनकी समावेशिता, और “ढाड” जैसी गढ़वाली पत्रिका को मुख्यधारा के साहित्यिक विमर्श में मान्यता देने की आवश्यकता पर जोर दिया।

तीसरे सत्र में लेखक, TEDx वक्ता और वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सरोज दुबे ने ‘नैरेटिव्स ऑफ हीलिंग एंड द लिटरेचर ऑफ ह्यूमन रेज़िलिएंस’ विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि “स्वीकार्यता सक्रिय होती है, निष्क्रिय नहीं,” और छात्रों को जीवन को भागने का माध्यम नहीं, बल्कि साहस और करुणा के साथ वास्तविकता को जीने का साधन मानने के लिए प्रेरित किया।

अंतिम सत्र में महिला सुरक्षा विशेषज्ञ, सेल्फ-डिफेंस ट्रेनर और लेखिका वीना गुप्ता तथा लेखिका एवं संपादक डॉ. कामिनी कुसुम ने ‘Women Writing Lives and Living Stories’ विषय पर चर्चा की। सत्र के अंत में उन्होंने श्रोताओं को अपनी पुस्तक “The Protector” पढ़ने की अनुशंसा की, जो भारत की पहली महिला बॉडीगार्ड वीना गुप्ता की एक सच्ची और प्रेरणादायक जीवनी है।

लिटरेरी फेस्ट का समापन साहित्यिक क्विज़, पुरस्कार वितरण और एक भावनात्मक जेमिंग सत्र के साथ हुआ। वर्ष के अंतिम शैक्षणिक उत्सव के रूप में “पेज एंड स्टेज” केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह प्राचीन और समकालीन, तथा क्षेत्रीय और वैश्विक के बीच संवाद का एक सजीव रूप था, जिसने साहित्य की उस महत्ता को पुनः स्थापित किया जो विचारों और लोगों को जोड़कर एक सशक्त समुदाय का निर्माण करती है।

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