उत्तराखण्ड के 24 साल : विकास एवं चुनौतियां
विषम भौगालिक परिस्थितियों वाला राज्य उत्तराखंड के लोगों ने राज्य प्राप्ति के लिए आन्दोलन इसलिए किया था क्योंकि उन्हें राज्य के अंदर अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक पहचान बनाए रखने की आवश्यकता महसूस हो रही थी। उत्तराखंड, जो पहले उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, क्षेत्रवासी स्वयं को उपेक्षित मानते थे तथा क्षेत्र विकास की दृष्टि से पिछड़ा माना जाता था। यहाँ के लोग लम्बे समय से अपने क्षेत्रीय मुद्दों, जैसे कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, परिवहन, सांस्कृतिक एवं सामाजिक पहचान, बोली-भाषा तथा प्राकृतिक संसाधनों के सही उपयोग के लिए संघर्ष कर रहे थे। इसके अलावा, पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक आपदाओं, भूस्खलनों और अन्य समस्याओं के कारण क्षेत्र को सरकार की उपेक्षा का सामना करना पड़ता था।
इन समस्याओं के समाधान के लिए उत्तराखंड राज्य के गठन की आवश्यकता बहुत पहले से महसूस की जा रही थी। स्वतंत्रता से पूर्व सन् 1938 में भी पर्वतीय राज्य गठन की मांग उठी थी। सन् 1952 में संसद में पी सी जोशी ने भी पर्वतीय राज्य गठन की मांग उठायी थी। इसके पश्चात् भी निरन्तर राज्य गठन की मांग उठती रही, 1994 में, राज्य की मांग के लिए व्यापक रूप से जन आंदोलन हुआ। जिसे “उत्तराखंड राज्य आन्दोलन“ के नाम से जाना जाता है। इस आन्दोलन में लोगों ने सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहचान को बचाने, तथा पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विशेष सुविधाओं की मांग के साथ ही अलग पर्वतीय प्रदेश बनाये जाने की पुरजोर मांग की। आन्दोलन की व्यापकता को देखते हुए उत्तराखंड राज्य का गठन 9 नवम्बर 2000 को हुआ था।1. भौगोलिक और सांस्कृतिक कारण : उत्तराखंड क्षेत्र में भौगोलिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण पर्वतीय क्षेत्र और यहां के लोगों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहचान भिन्न थी। इस क्षेत्र की अपनी ऐतिहासिक, बोली-भाषा, सांस्कृतिक और सामाजिक विशिष्टताएँ थीं, जिन्हें उत्तर प्रदेश से अलग पहचान देने की आवश्यकता महसूस हो रही थी।
2. आर्थिक और विकास संबंधी मुद्दे : उत्तर प्रदेश के राज्य के हिस्से के रूप में उत्तराखंड का क्षेत्रीय विकास के मामले में उपेक्षित था। यहाँ के लोग बुनियादी सुविधाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार और बुनियादी ढांचे की कमी का सामना कर रहे थे। राज्य गठन के बाद, इन समस्याओं को हल करने के लिए विशेष ध्यान दिया दिये जाने की आवश्यकता थी।
3. प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और स्थानीय हितों की सुरक्षा : उत्तराखंड में विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक संसाधन जैसे जल, वन, खनिज आदि हैं, जिनका सही तरीके से उपयोग और संरक्षण राज्य के गठन के बाद बेहतर तरीके से किया जा सकता था। इससे स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा भी हो सकती थी।
4. राजनीतिक कारण : उत्तराखंड के लोग अपने क्षेत्र की प्रशासनिक स्वायत्तता चाहते थे। उत्तर प्रदेश में रहने वाले पहाड़ी क्षेत्र के लोगों का मानना था कि उन्हें राज्य स्तर पर निर्णय लेने में कठिनाई हो रही थी, और उनके मुद्दों को उपेक्षित किया जा रहा था।
5. आंदोलन और जन जागरूकता : उत्तराखंड राज्य के गठन के लिए कई वर्षों तक व्यापक जन आंदोलन चला, जिसमें विभिन्न सामाजिक, छात्र और राजनीतिक संगठनों ने सक्रिय भागीदारी की। इस आंदोलन ने क्षेत्रीय असंतोष को प्रमुखता दी और राज्य गठन की मांग को मजबूत किया।
यह आन्दोलन अंततः 9 नवंबर 2000 को सफल हुआ जब उत्तराखंड को एक पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
पिछले 24 वर्षों में उत्तराखंड ने कई क्षेत्रों में विकास हासिल किया है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण कारणों से राज्य विकास की दौड़ में कुछ जगहों पर पिछड़ गया है।
1. प्राकृतिक आपदाएँ और पर्यावरणीय समस्याँ : उत्तराखंड में बर्फबारी, भूस्खलन और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने राज्य के विकास को प्रभावित किया है। 2013 की केदारनाथ आपदा जैसे बड़े प्राकृतिक संकटों ने प्रदेश की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुँचाया। इन आपदाओं ने न केवल लोगों की जान ली, बल्कि विकास परियोजनाओं की गति को भी धीमा कर दिया।
2. बेरोज़गारी और पलायन : राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है, जिससे ग्रामीण इलाकों में जनसंख्या घट रही है और वहाँ के संसाधन और श्रम शक्ति का अभाव हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप राज्य में बेरोज़गारी की समस्या बनी हुई है, और वहाँ के युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हैं।
3. स्मॉल इंडस्ट्रीज और बुनियादी ढांचे की कमी : राज्य में औद्योगिकीकरण की गति धीमी रही है। छोटे उद्योगों के विकास की दिशा में निवेश की कमी और बुनियादी ढांचे की कमज़ोरी जैसे रास्ते में आए अड़चनों ने राज्य की आर्थिक स्थिति को प्रभावित किया है। परिवहन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार तो हुआ है, लेकिन अभी भी बुनियादी सुविधाओं की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता है।
4. भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप नीतियों का निर्धारण न होना : उत्तराखंड एक विषम भौगोलिक वाला राज्य है। इसके सामने अनेक प्राकृतिक चुनौतियां समय-समय पर आती रहती हैं। जिसके कारण सतत् विकास की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होती है। अतः राज्य में विकास की नीतियों का निर्धारण इस प्रकार किया जाना चाहिए ताकि सतत् विकास की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न न हो।
5. राजनीतिक अस्थिरता : राज्य में राजनीतिक अर्न्तकलह ने विकास योजनाओं के कार्यान्वयन में रुकावट डाली है। अक्सर सरकारें अपने कार्यकाल के दौरान लंबी अवधि के विकास योजनाओं को पूरा नहीं कर पाती हैं, जिससे राज्य की विकास प्रक्रिया प्रभावित होती है।
6. प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण : पहाड़ी राज्य होने के कारण उत्तराखंड को अपनी प्राकृतिक संसाधनों (जैसे जल, वन और खनिज) का बेहतर प्रबंधन करने की चुनौती है। इन संसाधनों के अधिक शोषण और पर्यावरणीय संतुलन की कमी ने राज्य की विकास प्रक्रिया को प्रभावित किया है।
उत्तराखंड में कई क्षेत्रों में प्रगति हुई है, जैसे कि ऊर्जा उत्पादन (हाइड्रो पावर), इंफ्रास्ट्रक्चर, और कुछ शहरों में स्मार्ट सिटी परियोजनाएँ, फिर भी राज्य में अनेक समस्याओं के समाधान के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है।
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