उत्तराखण्ड में चकबन्दी के जगरी : गणेश सिंह गरीब
A Legend Leader of Chakbandi in Uttarakhand : Ganesh singh Greeb
लेखक
सुभाष चन्द्र नौटियाल
भूमि वन्दना
सनातन धर्म, वैदिक संस्कृति में कृतज्ञता प्रकट करने की महान परम्परा रही है। पृथ्वी ही हमें आधार प्रदान करती है, यही हमारी आश्रयदाता है। सभी जावधारियों के पालन-पोषण करने वाली यह भूमि अन्न, जल, वस्त्र, ज्ञान और सभी प्रकार की सुख, सुविधाओं के लिए हमें साधन प्रधान करती है। यह वन्दनीय मातृ भूमि ही हमारी सबसे बड़ी आराध्य है। इस मातृ भूमि के प्रति अगाध श्रद्धा रखना ही हम सबका सबसे बड़ा कर्त्तव्य है। इसीलिए परम् वन्दनीय इस मात् भूमि को वेदों में भी माता की संज्ञा दी गयी है -
प्रातः काल उठते ही भूमिस्पर्श करने का मंत्र
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे।।
प्रातः प्रकृति स्मरण मंत्र
पृथ्वी सगन्धा सरसास्तथापः स्पर्शी च वायुर्ज्वलितं च तेजः ।
नभः सशब्दं महता सहैव कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ।। वामनपुराण।।
पृथ्वीमाता द्यौर्मे पिता।।ऋग्वेद।।
सा नौ भूमि विर्सजतां माता पुत्राय मे पयः।।अथर्ववेद।।
माता भूमिः, पुत्रो अहं पृथिव्याः।।अथर्ववेद।।
नमो मात्रे पृथिव्ये, नमो मात्रे पृथिव्याः।।यजुर्वेद।।
पृथ्वी मातर्मा हिंसीर्मा अहं त्वाम्।
भूमिका
उत्तराखण्ड राज्य का संक्षिप्त परिचय
उत्तराखण्ड में चकबन्दी के जगरी : गणेश सिंह ’गरीब’
मध्य हिमालयी भू-भाग में स्थित उत्तराखण्ड राज्य के कंकर-कंकर में शंकर का वास माना जाता है। देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध इस क्षेत्र की जलवायु सभी जीवधारियों के लिए सुखी, निरोगी, दुःखरहित तथा कल्याण की कामना करने वाली है। विश्व की अध्यात्मिक राजधानी माने जानी वाली यह भूमि परम् पवित्र और कल्याणकारी है। अनादि काल से ही इस भूमि को समय-समय पर अपने तपो बल से अनके ऋषि-मुनियों ने सींचित कर विश्व के समस्त जीव समुदाय के लिए कल्याणकारी बीजों का रोपण किया है। ऋषियों के तपोबल से सींचित परम् पवित्र यह भूमि सदा ही रत्नप्रसूता रही है।
रत्नप्रसूता इस धरती में समय-समय पर अनेक महापुरूषों ने जन्म लेकर मानव समुदाय को जीने की नई राह बतायी है। आमजन के जीवन को सहज, सरल और आनन्ददायक बनाने के लिए इन महापुरूषों ने दिन-रात मेहनत कर नई राह का अन्वेषण किया है। उत्तराखण्ड में चकबन्दी के जगरी : गणेश सिंह ’गरीब’ भी उन महापुरूषों में से एक हैं जिहोंने सन् 1974 से निरन्तर पहाडों में चकबन्दी के लिए ना सिर्फ आवाज बुलन्द की बल्कि चकबन्दी का स्वयं भी एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। भले ही गणेश सिंह ’गरीब’ का प्रयास आज सरकार की कमजोर राजनैतिक इच्छा शक्ति के चलते अधूरा सा लग रहा हो परन्तु उत्तराखण्ड में चकबन्दी के इस जगरी ने ना सिर्फ स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत किया बल्कि समस्त जनता को जागृत करने के लिए आज भी निरन्तर प्रयासरत हैं। विषम भौगोलिक परिस्थितियां, पहाड़ीनुमा खेत, ढलान वाले बुग्याल, रपटीली राहें और गाड-गधेरों की विरासत वाले उत्तराखण्ड प्रदेश के पहाड़ी भूभाग में कई दशकों से खण्ड-खण्ड में विभाजित होकर काश्तकारों के खेत टुकड़े-टुकड़े होकर आज कई खण्ड़ो में विखर गये हैं। वर्तमान में कई खण्डों में बटें खेती के टुकडों में खेती, बागवानी, उद्यानगी, वानकी तथा कृषि से सम्बन्धित अन्य कार्य करना पशुपालन आदि भी न तो परम्परागत तरीके से सम्भव हो पा रहा है और न ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लाभ का सौदा बन पा रहा है। ऐसी स्थिति में खेती में आधुनिक तकनीकी का प्रयोग एक सपना जैसे लगता है। इसी विडम्बना के कारण पहाडों में निरन्तर खेत बंजर होते जा रहे हैं तथा अनचाहा पलायन का दंश भी इस पहाड़ी प्रदेश को झेलना पड़ रहा है। पर्वतीय जनो की इसी पीड़ा को महसूस करते हुए तथा उसके समाधान के लिए सन् 1974 में दिल्ली सेवानगर में रेडियो वर्कशॉप चलाने वाले एक युवक के मन में उत्तराखण्ड के पहाड़ों अवस्थित विखरे खेतों को तोक में बदलने की तीव्र इच्छा जाग्रत हुई। दरअसल पलायन और निरन्तर बंजर होते खेतों का दर्द महसूस करते हुए आपने यह बीड़ा उठाया जिसे आज भी आप आगे बढ़ा रहे हैं।
सन् 1974 से आपने देश की राजधानी नई दिल्ली से अपने प्रयास शुरू किये तथा चकबन्दी की बारिकियों को समझने के लिए उत्तर प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश के चकबन्दी कानूनों के साथ-साथ केन्द्र सरकार तथा विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर किये गये भूमि सुधारों का अध्ययन किया तथा पाया कि यदि पहाडों में पूर्ण चकबन्दी की जाती है तो पहाड़ों में फिर से आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक समृद्धि लौट सकती है। पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी को ही आपने अपने जीवन का लक्ष्य बना दिया। आपके प्रथम प्रयास के तहत् आप की पहल पर सन् 1975 मे पहली बार अखिल भारतीय गढ़वाली प्रगतिशील संगठन ने पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी किये जाने की मांग रखी। अपने मिशन को सफल बनाने के लिए तथा उत्तराखण्ड में आमजनमानस को चकबन्दी के प्रति जागरूक करने के लिए अपने अभियान छेड़ा और चकबन्दी जागृति के लिए आन्दोलन का स्वरूप दिया। आपके द्वारा शुरू किया गया चकबन्दी आन्दोलन आज पर्वतीय जनमानस के पटल पर अंकित हो चुका है।
जीवन का आरम्भिक काल
चकबन्दी के जगरी गणेश सिंह गरीब का जन्म 1 मार्च सन् 1937 को उत्तराखण्ड राज्य के पौड़ी गढ़वाल जिले के विकासखण्ड कल्जीखाल के अन्तर्गत असवालस्यूं पट्टी के ग्राम सूला में हुआ था। आपके पिताजी का नाम चन्दन सिंह नेगी तथा माता का नाम गंठी देवी था। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही सम्पन्न हुई। कक्षा 6 से आठवीं की परीक्षा जूनियर हाई स्कूल मुण्डेश्वर से पास करने के उपरान्त आप अपने बड़े भाई सुखदेव सिंह नेगी के साथ दिल्ली चले गये। उन दिनों सुंखदेव सिंह नेगी एक प्रेस में काम करते थे। बड़े भाई के साथ रहते हुए आपने सन् 1956 में गाजियाबाद से हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1958 में डी.ए.वी. इण्टर कॉलेज देहरादून से इण्टरमीडिएट की परीक्षा पास करने के उपरान्त आप पुनः रोजगार की तलाश में दिल्ली चले आये। यहां पर रह कर आपने एक साल का रेडियो मैकेनिक का कोर्स किया तथा उसके बाद एक निजी कम्पनी में नौकरी कर ली, कुछ समय नौकरी करने के उपरान्त आपने नई दिल्ली की लोदी कॉलोनी के न्यू खन्ना मार्केट में एक रेडियो मैन्युफैक्चरिंग एवं रिपेयरिंग की स्वयं की दुकान शुरू कर दी। सन् 1960 में आप का विवाह श्रीमती सरस्वती देवी से सम्पन्न हुआ। तब से लेकर आज तक आप की जीवनसंगनी आप के हर दुःख-सुख की सहभागनी है। जीवन के कठिनतम सफर में भी श्रीमती सरस्वती देवी ने आप का साया बनकर सदैव आप के साथ खड़ी रही हैं। चकबन्दी को यदि आप मिशन में तब्दील कर पाये हैं तो इसमें श्रीमती सरस्वती देवी बराबर की भागीदार रही हैं। सन् 1961 से 1981 तक आप इसी दुकान को सफलतापूर्वक संचालित करते रहे तथा इसके साथ-साथ समाज में सामाजिक भागीदारी में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे।
जीवन में टर्निग प्वाइन्ट
अपने जीवन में कर्त्तव्य के प्रति दृढ़ इच्छा शक्ति, निर्भयता, सदाचारिता, त्याग, सच्चाई, निष्ठा, लगन, समदर्शिता और निःस्वार्थ सेवा भाव ही सच्ची सामाजिकता, देश तथा समाज के प्रति सच्ची नागरिकता के लक्षण हैं। यह सभी गुण आप में मौजूद हैं। सन् 1974 में पहाडों में समृद्धि को लेकर जो मिशन आपने शुरू किया दिल्ली में रहते हुए आपने पहाड़ी समाज को जोड़ना शुरू किया तथा पलायन को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। इन चर्चाओं में आप प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। 1975 में सर्वप्रथम दिल्ली में अखिल भारतीय गढ़वाल प्रगतिशील संगठन के तत्वावधान में पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी को लेकर एक बैठक का आयोजन किया गया संगठन ने तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार से पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी करने की मांग की। चकबन्दी के जगरी गणेश सिंह गरीब ने चकबन्दी को पर्वतीय क्षेत्रों में विकास का मूल मंत्र मानते हुए चकबन्दी को ही जीवन का मिशन बनाया। सन् 1977 में अखिल भारतीय प्रगतिशील संगठन ने उत्तर प्रदेश सरकार से पर्वतीय क्षेत्रों में हिमाचल की तर्ज पर पुनः चकबन्दी की मांग की। संगठन ने चकबन्दी की सम्भावनाओं का पता लगाने के लिए पर्वतीय क्षेत्रों का भ्रमण भी किया तथा चकबन्दी के लिए माहौल तैयार करने के लिए कई गांवों में बैठकों का आयोजन भी किया परन्तु पर्वतीय क्षेत्रों में कोई प्रयोगिक मॉडल न हो पाने के कारण केवल संवाद के माध्यम से क्षेत्रीय किसानों को समझाने में संगठन को सफलता नहीं मिल पायी। क्षेत्र में एक ऐसा मॉडल तैयार करने की आवश्यकता महसूस हो रही थी जिससे की क्षेत्रीय किसानों को चकबन्दी के बारे में समझाया जा सके। ऐसे समय में चिन्तनशील चकबन्दी के जगरी गणेश सिंह गरीब आगे आये और उन्होंने क्षेत्र में चकबन्दी का मॉडल तैयार करने के लिए दिल्ली की सुख-सुविधाओं को त्याग कर वापस अपने गांव आना स्वीकार किया। यह आपके जीवन का टर्निंग प्वाइन्ट था।
आपका चिन्तन भी उच्चकोटी का है अक्टूबर 1978 में आपकी पुस्तक उज्जवल भविष्य और हमारा दायित्व का प्रकाशन हुआ। इस पुस्तक में भारत में गरीबी का स्पष्ट उल्लेख करते हुए गरीब वर्ग का उत्थान कैसे हो? शीर्षक नामक पाठ में आप लिखते हैं- ’’जहां बड़े-बड़े बुद्धिजीवी आज चांद-सितारों पर पहुंचकर उसे आबाद करने और बड़े-बड़े मचों पर लम्बे-चौड़े भाषण देने को लालायित हैं वहां जमीन की उन गलियों में रहने वाले जीर्ण इन्सान के विषय में हमें चिन्तन करने की आवश्यकता भी महसूस नहीं होती, जिनके बल पर हमें बड़े-बड़े पद और विलासिता की प्राप्ति होती है। आज हमें चांद-सितारों की नहीं, बल्कि उन तंग गलियों और ग्रामों में बिलखते इन्सान का सर्वेक्षण करना होगा जिन्हें पेट की ज्वाला को शान्त करने के लिए रोटी, तन ढकने को कपड़ा और सिर छिपाने को मकान की आवश्यकता है।’’
इसी पाठ में आप देश की गरीबी मिटाने का आवाहन करते हुए आगे लिखते हैं- ’’आइए, अपनी और समाज की प्रतिष्ठा के लिए हम स ब संकल्प लें कि, बदलते हुए युवा के साथ समाज के गरीब वर्ग के उत्थान के लिए सच्ची कर्त्तव्य निष्ठा का परिचय देकर समाज की कल्याणकारी समस्याओं के लिए मिलकर कार्य करें’’
इसी पुस्तक में पलायन क्यों और कैसे रोका जाए शीर्षक में आप लिखते हैं - ’’अगर सरकार का वास्तविक ध्येय पिछड़े जनमानस का उत्थान है तो भूमि को ठीक वितरण व्यवस्था करके कृषि सुधार करने व नागरिक सुविधाएं जुटाने का पूर्ण दायित्व हर माध्यम से सरकार पर आता है। अनन्त काल से जिस गरीब वर्ग की उपेक्षा चन्द सम्पन्न परिवार करते रहे हैं आज उन्हें राहत पहुंचाना ही सच्चे अर्थों में प्रजातन्त्र कहा जायेगा।’’
साठ के दशक में आप के अन्दर स्वावलम्बन तथा स्वाभिमान का जो बीजारोपण हुआ था सत्तर के दशक में उसका का प्रस्फुटन होने लगा तथा विचारों प्रवाह निरन्तर होने से आपकी चिन्तनशीलता बढ़ने लगी। गरीबी को देश का अभिशाप मानते हुए आप लिखते हैं - ’’देश की वर्त्तमान स्थिति शासकों के लिए एक चुनौति बनी हुई है। कोरे भाषणों का सहारा त्याग कर कर्त्तव्यनिष्ठा से चिन्तन मनन करके समस्याओं को सुलझाना होगा। तभी देश को बर्बादी और तानाशाही के कगार में जाने से बचाया जा सकता है।’’
आप के मन सन् साठ के दशक से विचारों का जो सैलाब उमड़ रहा था सत्तर के दशक में वह मूहर्त रूप लेने लगा था। पर्वतीय क्षेत्रों की समृद्धि का विचार आपको उद्वेलित करने लगा। विभिन्न विचार गोष्ठियों तथा समाजिक समारोहों में आप दृढ़ता से पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी की बात उठाने लगे। आप के दृढ़ संकल्प को देखते हुए सन् 1975 में सर्वप्रथम दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय गढ़वाली प्रगतिशील संगठन की बैठक में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार से पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी की मांग की गयी। आप के सद् प्रयासों से 1977 में अखिल भारतीय गढ़वाली प्रगतिशील संगठन ने बैठक आयोजित कर पर्वतीय क्षेत्रों में पुनः उत्तर प्रदेश सरकार से चकबंदी करने की मांग की तथा पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी के लिए माहौल तैयार करने के उद्देश्य से कई गांवों का भ्रमण कर गांवों में बैठकों का आयोजन किया। परन्तु क्षेत्र में कोई चकबंदी का कोई भी मॉडल न होने के कारण चकबंदी मॉडल तैयार करने की आवश्यकता महसूस होने लगी। इसी आवश्यकता को महसूस करते हुए आप गहन मन्थन करने लगे। पर्वतीय क्षेत्रों की समृद्धि, स्वरोजगार तथा स्वावलंबी समाज की अवधारणा आप के मन-मस्तिष्क में पहले ही अंकित हो चुकी थी। चकबंदी को जीवन का उद्देश्य मानते हुए तथा स्वावलंबी समाज की स्थापना के लिए आप 26 जनवरी 1981 को जबकि पूरा राष्ट्र गणतंत्र दिवस मना रहा था तो आप दिल्ली की सुख-सुविधाओं को छोड़कर वापस गांव चले आये। गांव में बहुत प्रयासों तथा कटु अनुभवों के उपरांत आपने 18 नाली बंजर भूमि का चक ’चंदन वाटिका’ के नाम स्थापित किया। भले ही इस चक को तैयार करने के लिए आपको अपने कई उपजाऊ खेतों को छोड़ना पड़ा परन्तु आपने हिम्मत नहीं हारी और क्षेत्र में चकबंदी का मॉडल तैयार करने के लिए बेकार पड़ी बंजर भूमि को भी स्वीकार किया। सन् 1981 में आपने ’चन्दन वाटिका’ के नाम से क्षेत्र में चकबंदी का प्रथम मॉडल तैयार किया।
चकबंदी के लिए प्रयास
भारत की 77 प्रतिशत आबादी गांवो में निवास करती है। कृषि तथा कृषिजन्य रोजगार ही उनकी आजीविका के प्रमुख साधन हैं परन्तु मीलों, फर्लांगों तक बिखरे खेतों में खेती करना ना तो तकनीकी दृष्टि से सही है और ना ही आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद।
स्वाभिमान, स्वावलंबन के साथ जीवनयापन करने के लिए स्वरोजगार ही एक प्रभावशाली विकल्प है। यहीं से सम्पन्नता का मार्ग खुल सकता है। स्वयं के उद्यम में मन-मस्तिष्क के अनुरूप कार्य करने की स्वतंत्रता होती है लेकिन कृषि क्षेत्र में उच्च तकनीकी का प्रयोग करने के लिए तथा बेहतर उत्पादन लेने के लिए आवश्यक है कि, खेती का एक चक हो जिस पर मन मुताबिक कृषि कार्य किया जा सके। छोटी जोत होने तथा बिखरे हुए खेतों के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में तकनीकी का प्रयोग कर बेहतर उत्पादन लेना एक सपने जैसा है। पर्वतीय क्षेत्रों सरकारी संस्थान हों चाहे गैर सरकारी संस्थान कृषि पर किसानों को कितना ही ज्ञान न बांट लें बिना चकबंदी के कृषि क्षेत्र में सुधार नहीं किया जा सकता है। पर्वतीय क्षेत्रों में चहुंमुखी विकास के लिए भूमि सुधार तथा चकबंदी ही एकमात्र विकल्प है। अपने इसी मूल उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए आपने सैकड़ों गावों की पदयात्राएं की तथा विचार गोष्ठियों का आयोजन कर चकबंदी के लाभों के बारे में आमजन को समझाया। जनजागृति के लिए जन सम्पर्क किया तथा पोस्टर, बैनर बनवाये, चकबंदी जनजागरण के लिए पर्वतीय क्षेत्रों में घर-घर में पर्चे बंटवाये ताकि आमजन चकबंदी के प्रति जागरूक हो सके। चकबंदी अभियान को आन्दोलन का स्वरूप प्रदान करते हुए आपने विकास खण्ड स्तर, जिला स्तर, राज्य स्तर तथा प्रवासी समाज के बीच चकबंदी सम्मेलनों का आयोजन किया।
भ्रमण
चकबन्दी योजना के अनुप्रयोगों को समझने के लिए आपने पूर्व विकासखण्ड अधिकारी बुद्धिबल्लभ ड्योडी के साथ वर्ष 1992 में 12 दिवसीय हिमाचल प्रदेश का दौरा किया। हिमाचल प्रवास के दौरान आपने शिमला तथा मण्डी जिलों में चकबन्दी योजना का अध्ययन किया।
संगठन
पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी आन्दोलन को धार देने के लिए आप के सानिध्य में अनेक संगठनों का गठन किया गया। जिन में मुख्य संगठन निम्नलिखित हैं -
ऽ अखिल भारतीय प्रगतिशील गढ़वाली संगठन (दिल्ली, 1975)
ऽ पर्वतीय विकास संगठन (1984)
ऽ मजदूर कृषक संद्य (1986)
ऽ पर्वतीय विकास चकबन्दी समिति (1988)
ऽ चकबन्दी परामर्श समिति (2000)
ऽ मूल नागरिक किसान मंच (2001)
ऽ गरीब क्रान्ति अभियान (2009)
प्रकाशन
अब तक आप की तीन पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है -
1. पुस्तिका - उज्जवल भविष्य और हमारा दायित्व (1978)
2. स्मारिका - गागर में सागर (1987)
3. पुस्तक - पर्वतीय विकास और चकबन्दी (1990)
जनमत सर्वेक्षण
भूमि सुधार, चकबन्दी, कृषि तथा राज्य गठन जैसे विषयों पर आपने पांच बार (वर्ष 2000,2001,2002,2003 एवं 2007) में जनमत सर्वेक्षण भी करवाया।
चकबन्दी का प्रयोग
सन् 1981 में 18 नाली भूमि पर ’चन्दन वाटिका’ के नाम से आपने स्वयं का चक बनाकर राज्य में सर्वप्रथम चकबन्दी का सफल प्रयोग किया। आप के प्रयासों से 1985 में ग्राम- हुलाकीखाल, विकासखण्ड-खिर्सू, जिला- पौड़ी गढ़वाल में कीर्तिबाग के नाम से चक की स्थापना की गयी। सन् 1988 में आपके प्रयासों से ग्राम-तछवाड़, विकासखण्ड- एकेश्वर, जिला- पौड़ी गढ़वाल में प्रेम विहार चक की स्थापना की गयी।
चकबन्दी के लिए किये गये अन्य प्रयास
उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी करने के लिए आपने प्रधानमंत्री, तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमत्रियों, केन्द्रीय मन्त्रियों, सांसद, विधायकों, योजना आयोग के उच्चाधिकारियों, स्थानीय जन-प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकताओं, बुद्धिजीवियों, मीडिया के सम्मानित पत्रकारों आदि से निरन्तर सम्पर्क किया तथा समय-समय पर पत्राचार के माध्यम से पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी कराये जाने का अनुरोध किया।
चकबन्दी आन्दोलन का प्रभाव
ऽ पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी के प्रति आपकी मुखरता को देखते हुए तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने 27 सितम्बर 1989 को पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी करने का निर्णय लिया।
ऽ सन् 1990 मे चकबन्दी आयुक्त द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों में सर्वक्षण दल भेजा।
ऽ सन् 1991 में पौड़ी और अल्मोड़ा में चकबन्दी कार्यालयों की स्थापना की गयी।
ऽ आप के द्वारा प्रेषित पत्रों का संज्ञान लेते हुए 24 मार्च 1993 में तत्कालीन लोकसभा सदस्य मेजर जनरल (अवकाश प्राप्त) भुवन चन्द्र खण्डूरी ने लोकसभा में प्रश्न काल के दौरान पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी का मामाला उठाया। ठीक इसी प्रकार 1997 में तत्कालीन राज्यसभा सदस्य मनोहर कान्त ध्यानी ने भी राज्यसभा में पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी का प्रश्न उठाया।
ऽ नवसृजित राज्य उत्तराखण्ड में वर्ष 2001 गठित अन्तरिम सरकार ने राज्य में चकबन्दी करने का संकल्प पारित किया। ठीक इसी प्रकार सन् 2002 में राज्य में निर्वाचित प्रथम सरकार ने भी राज्य में चकबन्दी करने का संकल्प लिया तथा तत्कालीन राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला ने 15 अगस्त 2002 के राज्यपाल के अभिभाषण में पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी करने का उल्लेख किया।
ऽ वर्ष 2003 में राज्य सरकार द्वारा डॉ हरक सिंह रावत की अध्यक्षता में चकबन्दी परामर्श समिति का गठन किया गया।
ऽ वर्ष 2004 में स्वैच्छिक चकबन्दी का राग अलापा गया तथा पूरन सिंह डंगवाल की अध्यक्षता में भूमि सुधार परिषद का गठन किया गया।
ऽ वर्ष 2009 में तत्कालीन कृषि मंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की अध्यक्षता में चकबन्दी परामर्श समिति का गठन किया गया।
ऽ वर्ष 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा द्वारा चकबन्दी किये जाने की प्रतिबद्धता को दोहराया।
ऽ वर्ष 2013 में पुनः डॉ हरक सिंह रावत की अध्यक्षता में राज्य में चकबन्दी कराये जाने के लिए मंत्री परिषद की तीन सदस्यीय चकबन्दी परामर्श समिति का गठन किया गया।
ऽ वर्ष 2014 में प्रदेश सरकार द्वारा चकबन्दी (पर्वतीय) निदेशालय का गठन हुआ।
ऽ जनवरी 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने केदार सिंह रावत की अध्यक्षता पर्वतीय चकबन्दी समिति को गठन किया। इसी वर्ष अक्टूबर माह में पर्वतीय चकबन्दी समिति ने चकबन्दी का प्रारूप तथा ड्राफ्ट तैयार कर सरकार को सौंपा।
ऽ जुलाई 2016 में जोत चकबन्दी एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम - 2016 को विधान सभा में पास किया गया।
ऽ नवम्बर 2017 में तत्कालीन सरकार द्वारा घोषणा की गयी कि, प्रदेश में चकबन्दी की शुरूआत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ तथा उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के गांव से की जायेगी।
ऽ मई 2020 में उत्तराखण्ड पर्वतीय जोत चकबन्दी और भूमि व्यवस्था नियमावली - 2020 को मन्त्रीमण्डल द्वारा मन्जूरी प्रदान की गयी।
मनोनयन
निम्नलिखित हैं -
ऽ राज्य सरकार की चकबन्दी परामर्श समिति में नामित सदस्य (2003)
ऽ राज्य सरकार द्वारा गठित भूमि सुधार परिषद का सदस्य (2004)
ऽ राज्य सरकार द्वारा गठित उच्च स्तरीय चकबन्दी समिति में नामित सदस्य(2009)
सम्मान
समय-समय पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा आप को सम्मानित किया गया।
भले ही राज्य सरकारों की राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी के कारण तमाम प्रयासों के बाद भी अभी तक पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी सम्भव नहीं हो पायी है परन्तु आपके द्वारा प्रदीप्त किया गया चकबन्दी का दीया आज भी समस्त पर्वतीय क्षेत्र को आलौकित कर रहा है। आशा की जानी चाहिए की प्रकाशित होने वाले चकबन्दी के इस दीये से आने वाले समय में सरकार की राजनीतिक इच्छा जाग्रत होगी तथा पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी के साथ-साथ समृद्धि लौट आयेगी। 84 वर्ष की आयु पूर्ण करने के उपरान्त आज भी आप पूर्णरूप से स्वस्थ हैं तथा पहाड़ों में समृद्धि के लिए चकबन्दी कराये जाने के लिए निरन्तर प्रयासरत हैं। आपकी सक्रियता तथा निस्वार्थ भाव से की गयी जनसेवा को देखते हुए उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में यह क्षेत्र पुनः आर्थिक समृद्धि की राह का चुनाव करेगा और उत्तराखण्ड फिर से ’एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का सिरमौर साबित होगा।
भारत में चकबन्दी की शुरूआत
भारत में चकबन्दी का कार्य सर्वप्रथम प्रायोगिक तौर पर 1920 में पंजाब से प्रारम्भ हुआ। सरकारी संरक्षण में सहकारी समितियों का निर्माण हुआ, ताकि ऐच्छिक आधार पर चकबन्दी का कार्य किया जा सके।
स्वैच्छिक चकबन्दी के लिए सन 1928 में ‘‘रॉयल कमीशन ऑन एग्रीकल्चर इन इंडिया’’ का गठन हुआ था, परन्तु इस कमेटी का जमीन की मिल्कियत में किसी भी प्रकार का परिवर्तन करने का अधिकार प्राप्त नहीं था। सन् 1936 में पंजाब में सर्वप्रथम चकबन्दी कानून पास किया गया। इस कानून में चकबन्दी अधिकारियों को चकबन्दी योजना बनाने और काश्तकारों के मतभेदों को सुलझाने तथा निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त था। इस कमेटी द्वारा संस्तुति दी गयी कि पंजाब सहित अन्य प्रान्तों में भी चकबन्दी की जाय। पंजाब तथा केन्द्रीय प्रान्तों में चकबन्दी में आंशिक सफलता मिली, परन्तु बंगाल, बिहार, तमिलनाडु आदि अन्य प्रान्तों में प्रगति लगभग नगण्य रही।
संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) में सन् 1939 में जोत चकबन्दी अधिनियम बनाकर 6004 गाँवों में चकबन्दी हुई। पंजाब में भी कई स्थानों में किसान भूमि की अदला-बदली या चकबन्दी द्वारा होने वाली क्षति का जोखिम उठाने के अनिच्छुक थे। चकबन्दी को स्वतंत्रता से पूर्व भारत में बहुत अधिक सफलता नहीं मिल पायी थी।
स्वतन्त्रता के बाद चकबन्दी में व्यावहारिक रूप से ऐच्छिक स्वीकृति के सिद्धान्त को समाप्त कर सरकार द्वारा आवश्यकतानुसार अनिवार्य चकबन्दी को मान्यता प्रदान की गयी। स्वतंत्रता से पूर्व के कटु अनुभवों को देखते हुए भूमि सम्बन्धी समस्याओं को निपटाने का निर्णय लिया गया। स्वतन्त्रता पूर्व भूमि सम्बन्धी अनेक समस्याओं का अम्बार लग चुका था। इसमें प्रमुख समस्यायें निम्नलिखित थी-
ब्रिटिश राज में किसानों के पास उन जमीनों का स्वामित्व नहीं था जिन पर वे खेती करते थे। जमीन का मालिकाना हक जमींदारों, जागीरदारों आदि के पास होता था। इसकी वजह से स्वतंत्र भारत में सरकार के समक्ष कई गम्भीर मुद्दे उत्पन्न हुए जो सरकार के लिए चुनौती बनकर खड़े हो गए। भूमि पर मध्यस्थों का प्रभाव तथा कुछ उन लोगों का स्वामित्व था, जिनको स्वयं कृषि कार्य करने में कोई रूचि नहीं थी। भूमि को पट्टे पर देना एक सामान्य चलन था। काश्तकारों का शोषण लगभग प्रत्येक जगह किया जाता था जिसमें काश्तकारी अनुबन्ध की जब्ती की घटनायें आमतौर पर सामान्य बात थी। भूमि रिकॉर्डों की दशा बहुत खराब थी जिसके कारण मुकदमेंबाजी में वृद्धि हो रही थी। वाणिज्यिक खेती के लिये भूमि का बहुत छोटे भागों में विभाजन करना कृषि की एक अन्य समस्या थी। जिसके कारण कृषि में उत्पादन बढ़ाना मुश्किल कार्य था। बहुत छोटे जोतांं में बंटी खेती तथा भूमि विवादों के कारण भूमि, पूंजी तथा श्रम का अकुशल उपयोग हो रहा था। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए जे0सी0 कुमारप्पन की अध्यक्षता में भूमि सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए एक समिति गठित की गयी। कुमारप्पन समिति द्वारा कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधार हेतु उपायों की सिफारिश की गयी।
स्वतंत्र भारत में भूमि सुधारों के चार प्रमुख घटक थे-
1- मध्यस्थों का उन्मूलन।
2- काश्तकारी में सुधार।
3- भूमि स्वामित्व की सीमा तय करना।
4- भूमि स्वामित्व की चकबन्दी
इन सुधारों की व्यापक स्तर पर स्वीकृति के लिए राजनैतिक इच्छा शक्ति की आवश्यकता थी इस कारण इन सिफारिशों को विभिन्न चरणों में स्वीकार किया गया।
मध्यस्थों का उन्मूलन
जमींदारी प्रथा का उन्मूलन- प्रथम महत्वपूर्ण कानून जमींदारी प्रथा का उन्मूलन था। जिसके द्वारा कृषकों और राज्य के मध्य मौजूद मध्यस्थों को हटा दिया गया। यह सुधार अन्य सुधारों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी था जो कि अधिकांश क्षेत्रों में जमींदारों के अधिकारों को समाप्त करने और उनकी आर्थिक एवं राजनैतिक शक्ति को कमजोर करने में सफल रहा। यह सुधार वास्तविक भू-स्वामियों अर्थात् काश्तकारों की स्थिति को मजबूत करने के लिये किया गया था।
मध्यस्थों के उन्मूलन के लाभ
मध्यस्थों के उन्मूलन से लगभग 2 करोड़ काश्तकारों को वह भूमि प्राप्त हो गयी जिस पर वे कृषि किया करते थे। मध्यस्थों के उन्मूलन के कारण एक शोषक वर्ग का अन्त हो गया तथा भूमिनहीन किसानों को भूमि वितरण के लिए अधिक से अधिक भूमि को सरकारी कब्जे में लिया गया। देश में बंजर भूमि और मध्यस्थों के निजी वनों का काफी क्षेत्र खेती योग्य था। मध्यस्थों के कानूनी उन्मूलन से काश्तकार सीधे सरकार के सम्पर्क में आ गये।
हालांकि जमींदारी प्रथा के उन्मूलन से जमींदारवाद, काश्तकारी या शेयर कॉपिंग प्रणाली (ेंतमबतवचचपदह ेलेजमउ) पूरी तरह से समाप्त नहीं हो पायी। कई क्षेत्रों में यह व्यवस्था जारी रही जिसकी वजह से बहुस्तरीय कृषि संरचना पर मौजूद जमींदार केवल शीर्ष स्तर से हट गये। इसके कारण बड़े पैमाने पर भूमि निष्कासन हुआ जिसके कारण कई सामाजिक-आर्थिक तथा प्रशासनिक समस्यायें उत्पन्न हुई।
जम्मू कश्मीर और पश्चिम बंगाल ने उन्मूलन को वैध करार दिया। जबकि अन्य राज्यों में मध्यस्थों को बिना किसी सीमा के व्यक्तिगत कृषि भूमि पर स्वामित्व बनाये रखने की अनुमति प्राप्त थी। कुछ राज्यों में यह कानून कृषि जोतों के स्थान पर सैराती महालों (ैंपतंजप डींंसद्ध जैसे काश्तकार हितों पर लागू हुआ। अतः जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के बाद भी कई बड़े मध्यस्थ मौजूद रहे।
काश्तकारी में सुधार
जमींदारी उन्मूलन अधिनियम पारित करने के पश्चात् असली बड़ी समस्या काश्तकारी विनियमन की थी। स्वतंत्रता पे पूर्व काश्कारो द्वारा भुगतान किया जाने वाला भूमिकर अत्यधिक(पूरे भारत में 35 प्रतिशत से लेकर 75 प्रतिशत तक सकल उपज के बीच) था। भूमिकर को विनियमित करने के लिए पेश किये गये काश्तकारी सुधार काश्तकारों को कार्यकाल की सुरक्षा स्वामित्व प्रदान करते हैं। कृषकों द्वारा देय किराया को विनियमित करने के लिये 1950 के दशक की शुरूआत में पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और आन्ध्रप्रदेश का 20 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक भूमिकर निर्धारित किया गया। काश्तकारों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए भूमिकर के विनियमन करने का प्रयास किया गया।
पश्चिम बंगाल तथा केरल जैसे राज्यों में कृषि संरचना का मौलिक पुर्नगठन किया गया, जिसने काश्तकारों को भूमि का अधिकार प्रदान किया।
अधिकांश राज्यों में इन कानूनों को अभी तक भी प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया है। योजना के दस्तावेजों पर बार-बार बल देने के बावजूद भी कुछ राज्य काश्तकारों को स्वामित्व के अधिकार प्रदान करने के लिए अभी तक कानून पारित नहीं कर पाये हैं। भारत के कुछ राज्यों ने तो काश्तकारी को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। जबकि कई राज्यों में आज भी मान्यता प्राप्त काश्तकारों और अंशधारकों को स्पष्ट रूप से अधिकार प्राप्त हैं। भले ही काश्तकारी क्षेत्र में सुधारों से काश्तकारों के शोषण में कमी आयी है। परन्तु आज भी बहुत कम वास्तवित काश्तकारों को स्वामित्व का अधिकार प्राप्त हो पाया है। कई क्षेत्रों में अभी भी इस दिशा में कार्य किया जाना शेष है।
भूमि स्वामित्व की सीमा-
भूमि सुधार कानूनों की तीसरी प्रमुख श्रेणी लैंड सीलिंग अधिनियम (स्ंदक बमपसपदह ।बजे) की थी। भूमि स्वामित्व पर सीमा को कानूनी रूप से भूमि के उस अधिकतम आकार के रूप में संदर्भित किया जाता है, जिससे अधिक भूमि पर कोई भी कृषक अथवा कृषक परिवार स्वामित्व नहीं रख सकता है। इस तरह की सीमा तय करने का उद्देश्य कुछ ही लोगों के हाथों में निहित भू-स्वामित्व में कमी करना था। वर्ष 1942 में कुमारप्पन समिति ने भूमि के अधिकतम आकार (जमींदारों के पास) को लेकर सिफारिश की। यह एक परिवार की आजीविका के लिए आवश्यक सीमा से तीन गुनी अधिक थी। वर्ष 1961-62 तक सभी राज्यों ने लैंड सीलिंग एक्ट (भूमि की अध्िकतम सीमा अधिनियम) पारित कर दिये थे परन्तु राज्यों में अधिकतम भूमि रखने की सीमा अलग-अलग थी। सभी राज्यों में एकरूपता लाने के लिए 1971 में एक नई भूमि सीमा नीति बनायी गयी। इसी क्रम में 1972 में विभिन्न क्षेत्रों में भूमि के प्रकार, उत्पादकता और ऐसे कई अन्य कारकों के आधार पर अलग-अलग सीमा के साथ तत्कालीन केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय दिशा निर्देश जारी किये गये। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार सबसे अच्छी भूमि की अधिकतम सीमा 8-10 एकड़ उसे कम उपजाऊ भूमि यानि द्वितीय श्रेणी की भूमि सीमा 18-27 एकड़ तथा शेष भूमि के लिए 27-54 एकड़ तक सीमा निर्धारित की गयी। पहाड़ी तथा रेगिस्तानी क्षेत्रों में भूमि सीमा के मानक अलग थे। इन सुधारों की मदद से राज्य को प्रत्येक परिवार के स्वामित्व वाली अधिशेष भूमि (तय सीमा से अधिक) की पहचान कर उसका अधिग्रहण करना था तथा उस भूमि को भूमिहीन परिवारों एवं अन्य अनुसूचित श्रेणियों (एससी व एसटी) के भूमिहीन परिवारों को पुनर्वितरित करना था।
अधिकांश राज्यों में अधिकतम भूमि सीमा अधिनियम (स्ंदक बमपसपदह ।बजे) शक्तिविहीन साबित हुआ। इस अधिनियम में कई ऐसी कमियां थी जिसके कारण भूस्वामी रणनीतिक रूप से उन कमियों का लाभ उठाकर अपनी भूमि को अधिग्रहण से बचा लेते थे। बहुत बड़ी भू-सम्पदाओं को छोड़कर अधिकांश भू स्वामियों ने तथाकथित बेनामी हस्तान्तरण द्वारा अपनी भूमि नौकरों, रिश्तेदारों, सहयोगियों आदि के नाम पर करा दी। इससे भू-स्वामी भूमि के विभाजन के बाद भी उस पर अपना नियंत्रण बनाकर रख सकते थे। लैंड सीलिंग एक्ट के प्राविधानों से बचने के लिये कुछ स्थानों पर कुछ अमीर किसानों ने अपनी पत्नियों को केवल कागजों में तलाक दे दिया जबकि वास्तव में वे उनके साथ ही रह रही थी। क्योंकि इस अधिनियम में तलाकशुदा औरतों को भूमि में हिस्सेदारी की अनुमति थी। जबकि शादीशुदा औरतों के लिए नहीं थी।
भूमि स्वामित्व की चकबन्दी-
चकबन्दी का अर्थ खंडित भूमियों को जोड़कर एक भूखण्ड के रूप में पुर्नगठन पुनर्वितरण करने से है। गैर कृषि क्षेत्रों में बढ़ती जनसंख्या और रोजगार के कम अवसरों ने भूमि पर दबाव बढ़ा दिया जिसके कारण भूमि के विखंडन की प्रवृत्ति में वृद्धि हुई। खण्डों में बंटे भू-खण्डों की सिंचाई और देख-रेख करना बहुत मुश्किल हो गया था। इन परेशानियों को देखते हुए भूमि की चकबन्दी शुरू की गयी। चकबन्दी अधिनियम के तहत गाँव के कृषकों की भूमि के छोटे भूखंडों को एक बड़े भूखंड (भूमि की खरीद या विनिमय द्वारा) में मिला दिया जाता था। चकबन्दी से भूमि जोत का कभी खन्म न होने वाला विखण्डन को रोका गया।
जिन स्थानों पर पूर्ण चकबन्दी हुई वह क्षेत्र आर्थिक रूप से समृद्ध हुए हैं। इनमें पूर्ण चकबन्दी वाले राज्य हरियाणा, पंजाब तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उदाहरण लिये जा सकते हैं। चकबन्दी होने से किसान अलग-अलग स्थानों के बजाय भूमि की एक ही जगह पर सिंचाई तथा कृषि करने लगे जिससे समय और श्रम की बचत हुई तथा उत्पादकता में वृद्धि हुई। चकबन्दी से कृषि की लागत और किसानों के बीच मुकदमेंबाजी में कमी आयी।
कमजोर राजनैतिक इच्छा शक्ति तथा प्रशासनिक समर्थन की कमी के कारण पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश को छोड़कर देश के अन्य भागों में चकबन्दी के संदर्भ में प्रगति बहुत संतोषजनक नहीं रही है। हालांकि बढ़ते जनसंख्या दबाव के चलते भूमि के विखंडन होने के कारण पुनः चकबन्दी किये जाने की आवश्यकता थी।
पुनः चकबन्दी की आवश्यकता-
वर्ष 1970-71 में औसत भू-स्विमत्व का आकार 2.28 हेक्टेयर था जो कि वर्ष 2015-16 में घटकर मात्र 1.08 हेक्टेयर रह गया।
भूदान और ग्रामदान आंदोलन
महात्मा गांधी के शिष्य विनोबा भावे ने तेलांगना के पोचमपल्ली में भूमिहीन अनुसूचित जाति की समस्याओं के निदान के लिए वर्ष 1951 में भूमि सुधार कार्यक्रम में अहिंसात्मक क्रान्ति लाने के उद्देश्य से भूदान आन्दोलन श्ुरू किया। भूदान आन्दोलन के तहत सम्पन्न वर्ग के भू-स्वामियों से अपनी भूमि का कुछ हिस्सा स्वेच्छा से भूमिहीनों को दान देने के लिए प्रेरित किया जाता था। विनोबा भावे के द्वारा की गयी अपील से देश के कुछ सम्पन्न भू-स्वामियों ने स्वेच्छा से अपनी भूमि का स्वैच्छिक दान किया। केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा भूदान आन्दोलन में विनोबा भावे को आवश्यक सहायता प्रदान की गयी। भूदान आंदोलन की तर्ज पर 1952 में ग्रामदान आंदोलन की शुरूआत की गयी । ग्रामदान आंदोलन का उद्देश्य प्रत्येक गाँव में भूमि स्वामियों और पट्टाधारकों को उनके भूमि अधिकारों को स्वेच्छा से त्यागने के लिए राजी करना था। समस्त भूमि के समतावादी पुनर्वितरण तथा संयुक्त खेती हेतु ग्राम संघ की सम्पत्ति बना दिया जाता था। गावं के 75 प्रतिशत निवासियों जिनके पास 51 प्रतिशत भूमि थी की ग्रामदान के लिये लिखित स्वीकृति मिलने के बाद ही उस गाँव को ग्रामदान के रूप में घोषित किया जाता था। ग्रामदान के तहत आने वाला देश का पहला गांव मैग्रोथ, हरिपुर (उत्तर प्रदेश) था।
भूदान आंदोलन का सकारात्मक असर
भूदान आंदोलन स्वतंत्रता के बाद का पहला ऐसा आन्दोलन था जिसने देश में सामाजिक परिवर्तन लाने का प्रयास किया इस आंदोलन ने देश में नैतिकता का वातावरण तैयार किया जिससे कई बड़े जमींदारों पर दबाव पड़ा। भूदान आन्दोलन ने किसानों और भूमिहीनों के बीच राजनैतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया तथा किसानों को संगठित करने हेतु राजनैतिक प्रचार के लिए जमीन तैयार की। भूदान आंदोलन ने देश को संगठित करने के साथ-साथ भूमि की महत्ता का परिचय भी करवाया।
कमियां
भूदान आन्दोलन में बड़े भू-स्वामियों द्वारा दान की गयी अधिकांश भूमि कम उपजाऊ या मुकदमेंबाजी वाली होती थी। इस आन्दोलन से प्राप्त बहुत कम भूमि का हिस्सा ही भूमिहीनों के बीच वितरण किया जा सका। यह आंदोलन उन क्षेत्रों में सफल नहीं हो सका। जहां भू-स्वामित्व में अधिक असमानता थी। ग्रामदान आंदोलन उन गाँवों (मुख्यतः आदिवासी क्षेत्रों) में शुरू किया गया था जहाँ वर्ग विभेदीकरण की स्थिति नहीं थी और भू-स्वामित्व को लेकर बहुत कम अन्तर था।
समाजिक आन्दोलनों के परिवेश में राष्ट्रीय स्तर पर भूदान आन्दोलन से गति आयी है। भूदान आन्दोलन ने भूमि सुधार में देश को नयी दिशा देने का अभूतपूर्व कार्य किया है।
स्वतंत्र भारत में चकबन्दी
चकबन्दी राज्यों के विषयगत आता है इसलिए विभिन्न राज्यों के चकबन्दी कानूनों में अंतर है। राज्यों के अपने-अपने चकबन्दी कानून हैं स्वतन्त्रता के पश्चात् सर्वप्रथम मुम्बई में 1947 में विधानसभा में भूमि सुधार और चकबन्दी कानून पास हुआ। इस कानून के द्वारा सरकार को यह अधिकार प्राप्त हो गया कि वह जहाँ उचित समझें, वहाँ अनिवार्य चकबन्दी लागू करें । स्वतंत्रता के तुरन्त बाद जिन राज्यों में अनिवार्य चकबन्दी का कानून लागू किया गया। उनमें पंजाब (1948), उत्तर प्रदेश (1954), सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश (1958), बिहार और हैदराबाद (1956) शामिल थे। राज्य सरकारों को केन्द्र सरकार द्वारा चकबन्दी मॉडल लागू करने के लिए प्रोत्साहन दिया गया। केन्द्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को चकबन्दी के लिए प्रोत्साहन हेतु प्रथम तीन पंचवर्षीय योजनाओं में चकबन्दी के विस्तार का आयोजन किया गया, तथा भारत सरकार ने 1 मई 1957 को घोषणा की कि, जिन राज्यों में चकबन्दी कार्यों को बढ़ावा दिया जायेगा केन्द्र सरकार उन राज्यों को आर्थिक सहायता उपलब्ध करायेगी। तत्कालीन केन्द्र सरकार की इस घोषणा के बाद सम्पूर्ण देश में चकबन्दी कार्यों में थोड़ा तेजी आयी और मार्च 1956 तक जहाँ भारत में कुल चकबन्दी क्षेत्र 110.09 लाख एकड़ था। वह मार्च 1960 में बढ़कर 230.19 लाख एकड़ पहुंच गया। इस दौरान अकेले पंजाब में 121.08 लाख एकड़ क्षेत्रफल में चकबन्दी कार्य सम्पन्न हुआ। जबकि अन्य राज्यों में पंजाब के मुकाबले चकबन्दी कार्य की गति या तो बहुत धीमी थी या लगभग नगण्य थी।
चकबन्दी क्या है ?
चकबन्दी वह विधि है जिसके द्वारा व्यक्तिगत खेती के टुकड़ों को विभक्त होने से रोककर उन्हें संचयित किया जाता है। चकबन्दी कार्य में किसी ग्राम की समस्त भूमि और कृषकों के बिखरे हुए भूखण्डों को संचयित कर एक पृथक क्षेत्र में पुनःनिर्याजित किया जाता हैं अधिक जनसंख्या तथा कम भूमि का क्षेत्रफल वाला देश भारत में जहां प्रत्येक व्यक्तिगत भूमि (खेती) वैसे ही न्यूनतम है। बिना चकबन्दी में कई बार खेत इतने छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जाते हैं कि कार्यक्षमता से कृषि सहित अन्य कार्य करना बहुत कठिन हो जाता है। ऐसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे हुए खेत न सिर्फ कार्य क्षमता को प्रभावित करते हैं बल्कि उत्पादकता की दृष्टि से अनुपयोगी साबित होते हैं।
चकबन्दी कार्य में चकों का विस्तार किया जाता है। जिससे कृषक के लिए कृषि विधियां आसान हो जाती है। चक का निर्धारण होने पर खेती की सिंचाई के लिए प्रत्येक चक को नाली और आवागमन की सुविधा के लिए चकमार्ग या चकरूट से जोड़ दिया जाता है। खेतों में चकबन्दी होने से पारिश्रमिक और समय की बचत के साथ-2 उत्पादन में वृद्धि होती है तथा चक की निगरानी करने में सरलता हो जाती है। चकबन्दी में किसान की बिखरी जोतों को एक स्थान में एकत्रित किया जाता है। इस विधि से उस भूमि की भी बचत सम्भव है जो कि बिखरी हुई जोतों में मेड़ों से घिर जाती है।
भूमि सुधार की उपयोगिता एवं चकबन्दी के लाभ
भूमि सुधार एक व्यापक विषय है तथा चकबन्दी भूमि सुधार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार सरकार की प्राथमिकता में रहा है। भूमि सुधार के द्वारा सरकार भूमि स्वामित्व के पुराने सामन्तवादी सामाजिक ढांचे को समाप्त कर, काश्तकारों का शोषण रोकने तथा सुरक्षा प्रदान करने, काश्तकारों और बढ़ाईदारों के लिए लगान को नियमित करना, किसान और राज्य के बीच सीधा सम्बन्ध स्थापित करना तथा पुनः वितरण के उपायों द्वारा भूमिहीनों को सामाजिक तथा आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना था।
कृषि उत्पादकता में वृद्धि करने, आर्थिक असमानता को दूर करने तथा कृषि क्षेत्र में आधुनिकतम, यंत्रों का उपयोग कर कृषि कार्यों में कम मेहनत तथा अधिक उत्पादन इसके मूल में थे।
भूमि सुधार का उद्देश्य जोतों की चकबन्दी, काश्तकारी विनियमन और काश्तकारों तथा बटाईदारों को स्वामित्व का अधिकार देकर तथा भूमि रिकार्डों को अद्यतन बनाने से छोटे तथा सीमान्त किसानों को उन्नत किस्म की तकनीकी का माहौल तैयार करना ही रहा है। भूमि सुधार के क्षेत्र में स्वतंत्रता के बाद निश्चित ही उल्लेखनीय कार्य हुआ है परन्तु अभी भूमि सुधार का कार्य पूर्ण किया जाना शेष है। इन सुधारों के पीछे निम्नलिखित दूरगामी उद्देश्य थे-
त्र् भूमि बिचौलिया काश्तकारी का उन्मूलन।
त्र् काश्तकारों तथा बटाईदारों को काश्तकारी की सुरक्षा तथा काश्तकारों को स्वामित्व के अधिकार दिलाने के मूल उद्देश्य से लगान का विनिमय।
त्र् कृषि भूमि जोतों पर अधिकतम सीमा लगाना तथा भूमिहीन कृषि मजदूरों और छोटी भूमि जोतों के धारकों को बेकार बंजर पड़ी भूमि का वितरण।
त्र् जोतों की चकबन्दी
त्र् भूमि रिकार्डों में सुधार कर उनका रख रखाव तथा उन्हें अद्यतन बनाना।
1950 के दशक में शुरू किये भूमि सुधार कानून लगभग सारे देश में विधायी उपाय लागू किये गये हैं। संविधान के अनुच्छेद 31-ख के अन्तर्गत संरक्षण प्रदान करते हुए संविधान की नवीं अनुसूची में भूमि सुधार से सम्बन्धित 224 कानूनों को भी शामिल किया गया।
1- छठवीं पंचवर्षीय योजना में यह परिकल्पना की गयी थी कि, काश्तकारों को स्विमत्व के अधिकार देने के लिए सारे राज्यों में 1981-82 से विधायी उपाय आरम्भ किये जायेंगे और अधिकतम सीमा से अतिरिक्त भूमि को प्राप्त करने तथा उसके वितरण का कार्यक्रम 1982-83 तक पूर्ण हो जायेगा।
1985 तक एक चरणबद्ध तरीके से भूमि रिकार्डों का संकलन उन्हें अद्यतन बनाने का काम पूरा हो जायेगा तथा सभी राज्यां में सिंचाई परियोजनाओं की कमान क्षेत्रों को दी गयी प्राथमिकता सहित इसे 10 वर्षों में पूरा करने के उद्देश्य से जोतों की चकबन्दी का काम शुरू किया जायेगा।
2- सातवीं पंचवर्षीय योजना में यह बल दिया गया है कि, भूमि सुधार उपायों को गरीबी निवारण नीति के मूलभूत अंग के रूप में समझा जाना चाहिए। तथा अन्य ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के साथ एक संयुक्त गतिविधि के रूप में लिया जाना चाहिए जैसे कि समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत परिसम्पत्तियां प्राप्त करने के लिए भूमि आधार प्रदान करना और जवाहर रोजगार योजना के अंतर्गत वितरित बेकार भूमि के लिए अथवा उस भूमि जिसके काश्तकार अथक बटाईदार स्वामी बन गये हैं ऐसे भूमि का विकास करना तथा भूमि सुधार उपायो को सख्ती से लागू करना।
3- जमींदारियां, जागीरें, इनाम आदि जैसी बिचौलिया काश्तकारियों जो देश के लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्र में व्याप्त थी, समाप्त कर दी गयी। इन उपायो के परिणाम स्वरूप 20 मिलियन से अधिक काश्तकारों को सीधे राज्य से सम्पर्क में लाया गया। जिसका अधिकांश भाग भूमिहीनों तथा सीमान्त भूमिधारकों को वितरित किया गया।
4- काश्तकारों को स्वामित्व के अधिकार दिलाने अथवा भूमि स्वामियों को उचित मुआवजे का भुगतान करने पर काश्तकारों को स्वामित्व के अधिकार प्राप्त करने की अनुमति देने के लिए देश के व्यापक क्षेत्रों में विधायी प्रावधान किये गये। 7.72 मिलियन काश्तकारों को लगभग 13.84 मिलियन एकड़ भूमि का स्विमत्व प्राप्त हुआ।
5- भूमि सुधार का एक मुख्य उद्देश्य अनुपस्थित भूमि स्वामित्व को समाप्त करना तथा भूमि जोतने वाले को मालिकाना हक प्रदान करना है।
6- 1972 में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन के बाद भूमि की अधिकतम सीमा सम्बन्धी राष्ट्रीय मार्गदर्शिका तैयार की गयी। मार्गदर्शिका के अनुसार एक परिवार के लिए लागू अधिकतम सीमा की दर एक वर्ष में कम से कम दो फसलें देने की क्षमता रखने वाली सर्वोत्तम किस्म की भूमि के लिए 10 से 18 एकड़ रखी गयी तथा शुष्क भूमि तथा कुछ एक प्रकार के बागानों के लिए 27 से 54 एकड तक ़ भूमि का प्राविधान किया गया।
7- मार्गदर्शिका में यह तय किया गया कि बेकार भूमि के लाभार्थी अधिकतर गरीब परिवार हैं तथा इस भूमि में से अधिकांश भूमि खराब होने की वजह से उसका विकास किये जाने की आवश्यकता है ताकि वह कृषि योग्य बन सके।
8- कृषि में कार्यकुशलता और किफायत के लिए विखण्डित जोतों की चकबन्दी को एक आवश्यक शर्त माना गया है। जोतों की चकबन्दी पंजाब और हरियाणा में सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए पूरी की गयी तथा इसके पश्चात उत्तर प्रदेश में हुई। अधिकतर राज्यों में चकबन्दी लागू करने के लिए विधायी प्रावधान कर अनिवार्य चकबन्दी लागू की गयी। गुजरात, हिमाचल और महाराष्ट्र में भी इसे व्यावहारिक तौर पर स्वैच्छिक बनाया गया। भूमि की उत्पादकता बढ़ाने पर बल देने से चकबन्दी को पहले से अधिक आवश्यक माना गया है।
9- केन्द्र सरकार की ओर से सभी राज्यों को यह सुझाव दिया गया है कि वे लोगों को कार्यक्रम के लाभों से अवगत करायें। शिकायतों को निष्पक्षता से तत्काल निपटाने के लिए चकबन्दी के कार्य हेतु वरिष्ठ अनुभवी अधिकारियों को तैनात किया जाना चाहिए।
10- भूमि सुधार कार्यक्रम में देशभर में भूमि रिकार्डों का कम्प्यूटरीकरण किया जा रहा है।
चकबन्दी के लाभ
1- सहज जोत-चकबन्दी प्रक्रिया के दौरान कृषकों की जगह-जगह बिखरी हुई जोत को एक स्थान पर सहज कर दिया जाता है। इससे चकों की संख्या में कमी आती है तथा कृषि कार्य सुगम हो जाता है।
2- उत्पादन में वृद्धि- कृषक जोतों के एक स्थान पर सहज हो जाने से कृषक अपने सीमित संसाधनों को प्रभावी ढंग से उपयोग कर पाने में समर्थ हो जाते हैं। जिससे कृषि कार्य में सुविधा के साथ-साथ कृषि उत्पादन में वृद्धि हो जाती है।
3- भू-वादों में कमी- कृषकों के खातों एवं खतौनी से सम्बन्धित विवादों का ग्राम में सार्वजनिक स्थान पर अदालतें लगाकर निस्तारण करने से भू-वादों में कमी आती है।
4- कृषि यांत्रिकीकरण में वृद्धि- चकबन्दी प्रक्रिया के दौरान सिंचाई के लिए प्रत्येक चक को नाली एवं आवागमन की सुविधा के लिए चकमार्ग या चकरूट से जोड़ा जाता है जिससे कृषकां को फसलोत्पादन में सुविधा प्राप्त होती है।
5- सार्वजनिक उपयोग के लिए भूमि की उपलब्धता-चकबन्दी प्रक्रिया के दौरान भूमिहीन, निर्बल व दलित वर्ग को आबादी के हिसाब से चक प्रदान किये जाने का प्राविधान हैं अतः चकबन्दी होने से न सिर्फ भूमिहीनों को भूमि प्राप्त होती है बल्कि अन्य सार्वजनिक प्रयोजन के लिए जैसे पंचायत घर, खेल का मैदान, कुंआ, तालाब, स्कूल, अस्पताल आदि के लिए भी यथा आवश्यक भूमि आरक्षित की जाती है। कुल मिलाकर सार्वजनिक भू उपयोग के लिए भूमि बैंक तैयार किया जाता हैं
6- पर्यावरण पर प्रभाव- चकबन्दी के दौरान वृक्षारोपण तथा वनों के लिए भी भूमि आरक्षित किये जाने का प्राविधान है। वन तथा वृक्षारोपण जहां एक ओर पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक हैं वहीं दूसरी ओर जल संरक्षण के वर्षा जल संचलन के लिए भी भूमि आरक्षित की जा सकती है।
चकबन्दी कार्यों में शिथिलता के कारण
भूमि सुधार तथा चकबन्दी से देश में आर्थिक समृद्धि का रास्ता खुला है परन्तु फिर भी देश के अनेक हिस्सों में अभी तक चकबन्दी का कार्य पूर्ण नहीं हो पाया है। इसका मुख्य कारण किसानों में भय तथा अज्ञानता का होने के साथ-साथ राज्य सरकारो की राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी भी है। जोतों की चकबन्दी के विरूद्ध तर्क दिये जाते हैं कि प्राकृतिक आपदाओं के कारण (बाढ़ आदि) विखण्डित टुकड़ों में भूमि रखने से लाभ मिलता है। यदि बाढ़ आदि के कारण भूमि कटाव होगा तो कुछ जमीन तो बच जायेगी। इसी प्रकार यह भय भी फैलाया जाता है कि चकबन्दी का लाभ सिर्फ बड़े किसानों को ही विशेष रूप से जब भूमि समरूप न हो तो छोटे किसानों को चकबन्दी का लाभ नहीं मिलता है।
भूमि में मुख्यतः सजातीय गुण न होने के कारण चकबन्दी का कार्य करना आसान काम नहीं है। चकबन्दी में शिथिलता का मुख्य कारण यह है कि, इसके लिए सदैव बड़ी संख्या में प्रशिक्षित तथा निष्ठावान अधिकारियों की आवश्यकता होती है परन्तु ऐसे अधिकारियों का सहज रूप में मिल पाना कठिन है। कम उपजाऊ का चक मिलने की आशंका भी काश्तकारों के मन में बनी रहती है। इसीलिए स्वैच्छिक चकबन्दी अधिक लोकप्रिय नहीं हो पायी है। चकबन्दी के बाद भी फिर से खेत विभाजित न हो जायें। यह आशंका भी काश्तकार के मन में सदैव बनी रहती है। इसलिए कुछ राज्यों में विशेषतः उत्तर प्रदेश में चकबन्दी किए हुए क्षेत्र का उपयोग विक्रय एवं हस्तान्तरण करने से रोकने के लिए विशेष नियम बनाये जाते हैं, परन्तु अन्य प्रान्तों में जैसे पंजाब में अभी भी यह नियम लागू नहीं है। कुछ राज्यों ने तो अभी तक इस पर विधिवत् विचार भी नहीं किया है।
कमजोर राजनैतिक इच्छा शक्ति ने चकबन्दी के कार्यों में बाधा उत्पन्न की है। बड़ी राजनैतिक पहुंच के कारण अनेक भूमि माफियाओं ने हजारों बीघा सरकारी भूमि, नगर तथा ग्राम पंचायती भूमि, नदियों गाड़-गधेरों के किनारों की भूमि संजायती भूमि, पट्टों की भूमि, तालाब, कुंओं तथा अन्य गोल खाते की भूमि पर कब्जा कर दिया है। राजनैतिक संरक्षण के कारण कई भूमि माफिया छोटे किसानों तथा छोटी जोत की भूमि पर भी कब्जा कर चुके हैं सार्वजनिक भूमि पर प्रभावशाली लोगों के अवैध कब्जे होने के कारण मुख्यतः चकबन्दी के कार्यों में सबसे बड़ी बाधा उत्पन्न हो रही है। सरकार की कमजोर इच्छा शक्ति, प्रशासन द्वारा चकबन्दी के कार्यों में रूचि न लेना तथा कब्जाधारी प्रभावशाली लोगांं का सरकार पर भारी दबाव होने के कारण उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्य में अभी तक चकबन्दी नहीं हो पायी है। जबकि सरकार द्वारा चकबन्दी के लिए योजनायें बनायी गयी हैं परन्तु अभी तक योजनाओं को धरातल पर उतारना शेष है।
भूमि वितरण
सृष्टि के प्रथम पल से ही पृथ्वी ही सभी प्राणी जगत की पालनहार रही है। अन्य पशुओं की तरह ही मानव भी सदियों तक पृथ्वी पर स्वच्छन्द विचरण करता रहा है। जब तक मानव की समझ अविकसित अवस्था में थी तो वह कन्दमूल फल खाता, शिकार कर उससे अपनी भूख मिटाता था। परन्तु धीरे-धीरे मानव की समझ का विकास होने लगा। उसके वास स्थल तक जीने के तौर-तरीकों में बदलाव आने लगा। घुमन्तु मानव धीरे-धीरे स्थायी आवास, खेतीबाड़ी, पशुपालन आदि से अपनी आजीविका के साधन जुटाने लगा।
कृषि, पशुपालन और निवास के लिये मानव की भूमि की आवश्यकता हुई। उस समय आबादी कम थी और मानव इधर-उधर अपनी आवश्यकता के अनुसार जमीन आबाद करता था।
कालान्तर में मानव समाज बना कर रहने लगा। समाज विकसित हुआ तो सामाजिक व्यवस्थायें भी जन्म लेने लगी। मानव समाज कबीलों के रूप में रहने लगा। कबीलों से राजतन्त्र विकसित हुए उनके संचालन के राजतन्त्र प्रणालियां विकसित हुई। राजतन्त्र से समाजतन्त्र, लोकतन्त्र जैसी शासन व्यवस्थायें विकसित हुई। इन सभी शासन प्रणालियों को समुचित ढंग से चलाने के लिए मालिकाना भूमि से कराधान लेने के नये-नये तौर-तरीके विकसित किये गये। भूमि से लगान वसूलने की प्रणाली ही सभी शासनतन्त्रों की मुख्य व्यवस्था में शामिल था। यह सब सदियों तक चलता रहा। भूमि का मालिकाना हक पीढ़ी-दर -पीढ़ी स्थानान्तरित होता रहा। कम जनसंख्या होने के कारण प्राचीन समय में भूमि की समस्या नहीं थी। भूमि कम होती थी तो जंगल काटकर खेत बना दिये जाते थे। झूम खेती का प्रचलन भी आम था। बढ़ती जनसंख्या और मानव की आवश्यकताओं ने 18वीं सदी के बाद किसकी, कहां पर कितनी भूमि, यह तय करने की आवश्यकता महसूस होने लगी। आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। इसी आवश्यकता ने भूमि बन्दोबस्त को जन्म दिया। भूमि के परिमाप के आधार पर ही लगान लगाना भूमि बन्दोबस्त का मुख्य उद्देश्य था। बाद में इस भूमि को पैत्रिक भूमि के रूप में पहचान मिली, फिर यही पैत्रिक भूमि पारिवारिक विभाजन होने से बंटने लगी।
बिखरे खेतों की समस्या उत्पन्न होने लगी। खेत जगह-जगह बंटने के कारण कृषि करना श्रमसाध्य और दुष्कर होने लगा।
बिखरी जोतों को सहजने के लिए एक ऐसी प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता महसूस होने लगी जिससे कम मेहनत कर अधिक उत्पादन लिया जा सके। उन्नीसवीं सदी में चकबन्दी की अवधारणा को बल मिला। भारत में चकबन्दी की शुरूआत बीसवीं सदी से सन 1920 में प्रायोगिक तौर पर शुरू हुई। 1928 में ‘रॉयल कमीशन ऑन एग्रीकल्चर इन इंडिया’ का गठन हुआ। सर्वप्रथम 1936 में पंजाब में चकबन्दी कानून पास हुआ। स्वतंत्रता के बाद भारत में चकबन्दी के लिए माहौल तैयार हुआ। साठ के दशक में चकबन्दी कार्यों में तीव्रता आयी तथा मैदानी क्षेत्रों में चकबन्दी एक सतत् प्रक्रिया बनी। परन्तु पहाड़ी प्रदेश उत्तराखण्ड में कभी भी चकबन्दी न होने से आसमान भूमि होने के कारण जगह-जगह पर बंट गये। आज भूमि के रिकार्ड तो हैं परन्तु समय पर भूमि सुधार व बन्दोबस्त न होने से आज भू-अभिलेख, नक्शे, खेतों के संटवारे-बंटवारे, क्रय-विक्रय, बयनामें, वसीयतनामेंं, दाखिल-खारिज, गोलखाते, जोत-बही व बन्दोबस्त में रिकार्ड भिन्नता जैसी अनेक समस्यायें अलग से पैदा हो चुकी हैं
चकबन्दी न होने के नुकसान
देश स्वतंत्रता की हीरक जयन्ती वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है परन्तु कभी आत्मनिर्भर इन पहाड़ों में आज खेती करना बड़ा ही खर्चीला, कष्टदायक और अलाभकर काम जैसा हो गया है। भले ही आज कुछ युवाओं द्वारा जोरदार प्रयास किये जा रहे हैं परन्तु चकबन्दी न होने के कारण इन उत्साही युवकों को निराशा ही हाथ लग रही है। बिना चकबन्दी के फसलों की सुरक्षा एवं सिंचाई की व्यवस्था करना, वैज्ञानिक और योजनाबद्ध ढंग से खेती करना, बागवानी, चारा उत्पादन, पशुपालन, वानकी आदि से सम्बन्धित कार्य करना सम्भव नहीं हो पा रहा है जिसके कारण कृषकों का खेती से मोहभंग होता जा रहा है। गांव के बजट का सदुपयोग न होना और भौतिक उपलब्धियों के लिए कागजी खानापूर्ति करने से चहुं और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। योजनायें कागज पर तो बनी है परन्तु धरातल पर नजर नहीं आती है। इस अन्तर भेद के कारण गांव में सामाजिक विकृति का आना एक स्वाभाविक तथा सामाजिक प्रवृत्ति बनती जा रही है। दूर-दूर तक बिखरे हुए खेतों के कारण हल-बैल ले जाना, खाद आदि की सप्लाई करना, खेतों में निराई-गुड़ाई तथा सुरक्षा प्रदान करना, सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था करना, मंडाई तथा घर तक अनाज पहुंचाना समय, शक्ति और धन की बर्बादी है। जब तक खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर रहेंगे तब तक उन खेतों में कोई भी लाभकारी योजना नहीं बन सकती है और नहीं खेता करने के वैज्ञानिक तौर-तरीकों को अपनाया जा सकता है। श्रम साध्य और अलाभकारी होने के कारण बिखरी जोतों में पहाड़ का किसान खेती पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर सकता है। खेती में घटती आत्मनिर्भरता ने इस क्षेत्र में परालम्बन का भाव जाग्रत किया है। आज नौकरी करना पहाड़ की नियति बन चुका है। पहाड़ों में बिखरी जोत ने पलायन और बंजरता को जन्म दिया है।
खेतों का यत्र-तत्र बिखरा होना, कई परिवारों की जमीन एक ही संयुक्त खाते में होने के कारण भूमि विवाद भी बढ़ा है। एक ही खेत पर अनेक परिवारों की हिस्सेदारी का होना 75 प्रतिशत परिवारों का लम्बे समय से अनुपस्थित रहना और सरकार का क्षेत्रीय कृषकों के प्रति उदासीन होना पहाड़ की खेती के लिए एक त्रासदी ही है।
हम आजादी के हीरक वर्ष में प्रवेश करने वाले हैं। यदि इतिहास उठाकर देखें तो उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्र में चकबन्दी हुई, तो उससे वहां का उत्पादन 10 से 12 गुना तक बढ़ गया । जबकि उत्तराखण्ड में चकबन्दी न होने के कारण उत्पादन निरन्तर गिरता चला गया । आजादी से पूर्व उत्तराखण्ड के पर्वतीय भू-भाग का किसान जिस खेत से सामान्यतः 2 बोरी गेहूँ का उत्पादन करता था आज उसी खेत से लगभग 10 से 15 किलो का उत्पादन मुश्किल से हो पा रहा है। यही कारण है कि पहाड़ के खेत निरन्तर बंजर होते गये। पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि विकास के लिए आजादी के बाद सही अर्थो में कोई भी ऐसा सार्थक प्रयास नहीं किये गये हैं जिससे कि इस क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि लौट पायी हो। आज से 60 से 65 वर्ष पूर्व जहां केवल 10 प्रतिशत भू-भाग पर ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध थी। आज के परिवेश में सरकारी आंकड़ों के हिसाब से लगभग 80 से 85 प्रतिशत भू-भाग पर सिंचाई के नाम पर भारी बजट खर्च किया जा रहा है। परन्तु वास्तविकता में सिर्फ दो प्रतिशत भू-भाग पर ही सिंचाई हो पा रही है। बजट की बन्दर बांट ने पहाड़ों को खोखला ही किया है।
चकबन्दी न होने से पहाड़ ने क्या खोया ?
पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी न होने से आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक नुकसान हुआ है। एक ओर जहां यहां के स्थानीय लोग कृषि कार्यों से विमुख होते चले गये तो दूसरी ओर उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक विसंगतियां पैदा हो गयी जो कि समय के साथ-साथ बढ़ती गयी। एक समय जहां कृषि पूर्ण रोजगार का साधन थी तथा कृषि आधारित लघु एवं कुटीर उद्योग यहां पर आजीविका के प्रमुख साधन थे। परन्तु भू-प्रबन्धन न होने के कारण लोग कृषि से विमुख होते चले गये तथा यहां पर कृषि आधारित अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। सामुदायिकता एवं सामूहिकता यहां की सामाजिक व्यवस्था की रीढ़ थे परन्तु घटते आर्थिक संसाधनों ने इस सामाजिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया। चकबन्दी न होने से पहाड़ों ने मुख्य रूप से जो खोया उसे निम्न बिन्दुओं से समझा जा सकता है।
पलायन का दंश
वैसे तो पलायन एक सतत् प्रक्रिया है तथा सम्पूर्ण विश्व के लोग निवास करने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर विस्थापित होते ही रहते हैं लेकिन उत्तराखण्ड का पलायन एक अभिशाप बनता जा रहा है। पहले सीमित मात्रा में पलायन होने के कारण पलायन एक समस्या नहीं थी। पहले यदि किसी परिवार में चार भाई थे तो एक या दो भाई रोजगार के लिए अन्यत्र जाते थे तो दो या तीन भाई गांव में रहकर ही खेती-बाड़ी से जुड़ कर खेती कार्य करते थे। अन्यत्र होने के बावजूद भी वह अपनी मूल जड़ों से जुड़ा रहता था। अधिकांश लोग सेवा निवृति के बाद पुनः गांव लौट जाया करते थे। पहाड़ में नौकरी करने की परम्परा अंग्रेजों के आने के बाद से बढ़ी है। पहले लोग शासकों के यहां नौकरी करते थे जो बहुत सीमित मात्रा में थे, परन्तु अंग्रेजों के आने के बाद यहां के लोग सेना में भर्ती होने लगे। यही सिलसिला आजादी के बाद भी जारी रहा। फर्क इतना पड़ा कि आजादी के बाद सेवा के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी लोग नौकरी करने लगे, जिसमें असंगठित क्षेत्र भी शमिल था। आजीविका के लिए नौकरी पर निर्भरता के कारण पहाड़ की अर्थव्यवस्था मनी ऑर्डर अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो गयी।
पहाड़ से इस प्रकार के नकारात्मक पलायन बुद्धिजीवियों एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों के लिए हमेशा ही चिन्ता का विषय रहा है। लेखकों, कवियों एवं पत्रकारों ने समय समय पर जहां पलायन के दुष्परिणामों पर सरकारों को चेताया है वहीं आम जनता से अपनी जन्मभूमि न छोड़ने की बार-बार अपील की है।
उत्तराखण्ड के संदर्भ में पलायन केवल भावनात्मक एवं सामाजिक मुद्दा नहीं है बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से जुड़ा होने के कारण सामरिक मुद्दा भी है। बढ़ती पलायन की प्रवृत्ति ने यहां की सांस्कृतिक विशिष्टताओं को बचाने के लिए जबरदस्त चुनौती दी है। यदि समय रहते इस पर कार्य न किया गया तो आने वाले समय में यहां की सांस्कृतिक धरोहर विलुप्ति के कगार पर खड़ी हो जायेगी।
भारत विविधतापूर्ण सांस्कृतिक धरोहरों सामाजिक व्यवस्थाओं, रीति-रिवाजों तथा भौगोलिक अंचलाकें का एक खूबसूरत समागम है। महासागर की गहराई से लेकर हिमालय की ऊंचाई भारत की संस्कृति को विविधता प्रदान करते हैं। भारत का भारतव्य या भारतपन वस्तुतः इन्हीं अंचलों की खुशहाली में ही समाहित है। देश में तभी समृद्धि आ सकती है जब देश का प्रत्येक अंचल समृद्धि होगा। भारत की संप्रभुता को बचाने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों से पलायन को रोकना राष्ट्रीयता को बचाने जैसा ही है। बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पलायन के मुख्य कारण रहे हैं। चकबन्दी इन सभी कारणों के मूल में हैं। बिना चकबन्दी के पर्वतीय क्षेत्रों में आर्थिक समृद्धि की बात करना तथा पलायन को रोकना बेमानी है।
कुटीर उद्योगों का हृस
पर्वतीय क्षेत्रो में कृषि कार्यों से विमुख होने के कारण कृषि आधारित लघु एवं कुटीर उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं पहले यहां पर कृषि पूर्ण रोजगार का साधन थी। तथा कृषि कई लघु एवं कुटीर उद्योग यहां पर कार्यरत थे। परन्तु भूमि का उचित प्रबन्धन न होने के कारण इसमें निरन्तर हानि होने से लोग कृषि से विमुख होते गये। इसके कारण यहां पर कृषि एवं कृषि आधारित अर्थव्यवस्था कमजोर होती चली गयी। उत्तर प्रदेश में हरित क्रान्ति की सफलता का मुख्य कारक चकबन्दी ही था। लेकिन राज्य बनने के बाद भी यहां भूमि सुधार पर कोई ध्यान नहीं दिया गया तथा यह पर्वतीय राज्य अपनी मूल अवधारणा से विस्थापित होने के कारण आर्थिक विकास में पिछड़ता ही चला गया । गांव में खेती किसानी न होने से उस पर आधारित परम्परागत लघु एवं कुटीर उद्योग समाप्त होने की कगार में हैं तथा उससे जुड़े हुए लोगों पर आजीविका का भारी संकट है। एक समय गांव में बढ़ई, लोहार, दर्जी, मिस्त्री आदि कामों में कई परिवारों की रोजी रोटी चलती थी। परन्तु बंजर होते खेत तथा बढ़ते पलायन ने इस प्रकार के कई दस्तकारों पर आजीविका का संकट ला दिया है। पर्वतीय क्षेत्रों में पहले हल लगाने का सामान, निराई गुड़ाई के यन्त्र, अनाज साफ करने के लिए सूप आदि, बांस तथा रिंगाल की टोकरी बनाने वाले, अनाज भण्डारण के लिये कोठार, काटने के लिए औजार, पर्वतीय शैली में भवन निर्माण, मूर्तिकला, काष्ठ से बनी सामग्री का निर्माण ,परम्परागत शैली में भवन निर्माण, मूर्तिकला, काष्ठ से बनी सामग्री का निर्माण, परम्परागत प्राकृतिक तथा आयुर्वेदिक चिकित्सा वैद्य, सांस्कृतिक कार्यों के निष्पादन के लिए संस्कृति कर्मी आदि अनेक क्षेत्रों में स्वरोजगार उपलब्ध था। परम्परा से जुड़े हुए लोगों के पास आज कोई काम नहीं है। ऐसी बदली हुई परिस्थितियों में ऐसे लोग पलायन करने को बाध्य हैं। गावं के परम्परागत कार्यों के समाप्त होने तथा नयी तकनीकी से आत्मसात न करने के कारण एक ओर जहां गांव जनविहीन होते जा रहे हैं तो दूसरी ओर आर्थिक ढांचा भी चरमरा गया है।
कागजों में सिमटती ग्राम विकास योजनायें
आज गांवों के विकास के लिए कितनी ही सुन्दर योजनायें क्यों न बना दी जायेंं परन्तु बिना भूमि सुधार किये उन्हें जमीन पर उतारना एक दिवास्वप्न जैसा ही है। इसीलिए उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में ग्राम विकास के लिये सरकार द्वारा संचालित अधिकांश योजनायें कागजों में सिमटकर रह गयी हैं। बीस सूत्रीय कार्यक्रम, एकीकृत ग्राम्य विकास कार्यक्रम, जलागम प्रबन्धन परियोजना, राष्ट्रीय बागवानी मिशन, जवाहर रोजगार योजना, सूखोन्मुखी क्षेत्र विकास कार्यक्रम, अम्बेडकर ग्राम, किसान रथ का भ्रमण, गांधी ग्राम, आदर्श ग्राम, अटल ग्राम, हरियाली योजना, आत्मा परियोजना, मनरेगा आदि अनेक ग्राम विकास कार्यक्रमों का लाभ जमीन पर दिखायी नहीं देता। जब तक पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी नहीं होती है तब तक ग्राम विकास की सारी योजनायें मात्र कागजों में ही सिमटती नजर आयेगीं। बिखरी जोतों के कारण वास्तविक हकदार लाभ से वंचित ही होंगे। कृषि व बागवानी को लेकर सरकार से सम्बन्धित संस्थान तथा गैर सरकारी संगठन, किसानों को कितना ही पाठ क्यों न पढ़ा लें बिना चकबन्दी के सुधार की कल्पना करना बेकार है।
घटता पशुपालन
पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक आधार रहा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन कृषि को पूर्णतः प्रदान करता है। जब से मानव ने खेती में पशुओं के उपयोग को जाना तब से पशुपालन और कृषि एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। आधुनिक दौर में भी सीमान्त और लघु किसान विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी बैलों से ही हल जोतने का कार्य कर रहे हैं। भूसी, खली, चरी तभी है जब खेत हैं। बकरी पालन, भेड़ पालन, दूध के लिए गाय पालन भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। भले ही आज तकनीकी में परिवर्तन आया है। तथा आज खेती में मशीनों का प्रयोग होने लगा है। जुताई, कटाई, मण्डाई और सिंचाई में मशीनों का प्रयोग होने लगा है। परन्तु यहां भी कृषि चकों की ही आवश्यकता है। पर्वतीय क्षेत्रों में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अभी मशीनों का सीमित ही प्रयोग होता है। यहां पर आज भी बैल ही जुताई के लिए कारगर हैं। इसके अलावा पशु गोबर की खाद भी खेती के लिए एक अनमोल पदार्थ है जिसका कोई विकल्प नहीं है। खाद के रूप में गोबर की महिमा सर्वगुण सम्पन्न जैसी है।
उत्तराखण्ड में एक समय पशुपालन की समृद्ध परम्परा रही है। पहले हर घर में गाय, भैंस पालने की परम्परा रही है उसके साथ-साथ बकरी पालन, भेड़ पालन भी अनेक परिवारों की आजीविका का साधन रहा है। दूध, घी तथा दूध से निर्मित दूसरे उत्पाद मिलने के अलावा गोबर की खाद और बैल का श्रम की सहायता मिलती थी। आज से पचास साल पूर्व घर की समृद्धि पशुधन से आंकी जाती थी। उत्तराखण्ड में बनने वाले घरों में पशुशाला का विशेष स्थान होता था। ग्रीष्मकाल में जब चारे की कमी होती थी तो पशुपालक पहाड़ों पर छनियों, खर्क, खेतों में गोठ तथा दूसरे चारागाहों में रहते थे, ताकि पशुओं को चारे की आसानी से पूर्ति हो सके। लेकिन बदलाव के दौर में खेती के साथ-साथ पशुपालन को भी तिलांजली ही दे दी है।
जोतों के बिखराव तथा चकबन्दी न होने के कारण खेती करना श्रमसाध्य और महंगा हो गया है। आज ग्रामीणों का झुकाव मनरेगा की मजदूरी की ओर चला गया है। इससे खेत बंजर होते जा रहे हैं। बंजर होते खेतों में न तो उत्पादन ही हो पायेगा न ही पशुओं के लिये चारा।
वन्य जन्तुओं का बढ़ता आतंक
उत्तराखण्ड में बंजर खेतों के कारण एक ओर नई समस्या पैदा हो गयी है यह समस्या मानव-वन्य जीव संघर्ष के रूप में सामने आयी है। वर्तमान में जिन खेतों पर खेती की जा रही है वहां पर जंगली जानवरों द्वारा खेतों को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है। कुछ ऐसे इलाकों में जहां से पलायन अधिक हुआ है वहां पर हिंसक पशुओं बाघ, भालू, गुलदार आदि के हमले अब आम बात हो गयी है। इन हमलों में अनेक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। उत्तराखण्ड जैसे शान्त वादियों में मानव-वन्य जीव संघर्ष बढ़ने का मुख्य कारण जंगलों का काटा जाना भी है। जिसके कारण जंगली पशुओं के स्थायी प्रवास नष्ट हो रहे हैं, वन्य क्षेत्रो में भोजन की कमी, जंगली जानवरों का अवैध शिकार, जंगलों में आग लगना भी है जो लोग वर्तमान समय में किसी तरह से बिखरी जोत पर खेती-बाड़ी का कार्य कर रहे हैं जंगली जानवरों द्वारा उनके खेत-खलिहानों को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है जिसके कारण उनके सामने आजीविका का संकट उत्पन्न हुआ है। ऐसे में रोजगार के लिये पलायन या मनरेगा की दिहाड़ी पर आश्रित रहना उनकी मजबूरी बनता जा रहा है। जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक से काश्तकारों की मेहनत, धन और समय तो बरबाद हो ही रहा है इसके साथ ही क्षेत्र में कृषि हतोत्साहित हो रही है।
स्वावलम्बन की घटती प्रवृत्ति
कई दशकों से उत्तराखण्ड का आर्थिक तंत्र सरकारी कर्मचारी के वेतन के बूते ही घूमता रहा है तथा यहां के समाज में जो भौतिक विकास दिखायी देता है दरअसल वह एक प्रकार से सरकारी खजाने पर आधारित विकास ही है। अंग्रेजी दौर से लेकर आज तक सरकारी कर्मचारी ने नई पीढ़ी को शिक्षा दिलाने में सबसे अधिक रूचि दिखायी है। लेकिन इस शिक्षा में निजी उद्यमशीलता का कोई पाठ न होने से सारा श्रम सरकारी नौकरी हासिल करने तक सीमित रहा है। इससे पहाड़ के लोगों में जो स्वावलम्बन का भाव था उसका हृस हुआ है। एक समय तक तो सरकारी नौकरियों की कमी नहीं थी, परन्तु आज पढ़े लिखे बेरोजगारों की बहुत बड़ी फौज खड़ी हो चुकी है। आज व्यवस्था को लेकर समाज में जो असन्तोष पनपा है उसके मूल में यही बेकारी है। अलग राज्य की मांग के मूल में भी असल में यही कारण छिपा था। औपनिवेशक दौर से लेकर वर्तमान तक पहाड़ की श्रम साध्य जनता को अपने पांवों पर खड़े होने के लिए कभी भी ठोस विकल्प नहीं दिये गये बल्कि उसे आश्रित करने के लिए मजबूर किया गया। परिस्थितियों ने समय के साथ यहां की अर्थव्यवस्था के स्वावलम्बन को निगल कर परतन्त्र की मनीआर्डरी अर्थव्यवस्था की ओर धकेलने पर मजबूर कर दिया। परालम्बन के वंशीभूत हुए आर्थिक व्यवस्था ने उत्तराखण्ड में स्वावलम्बन के अपेक्षित आर्थिक आधार को कभी पनपने ही नहीं दिया। राष्ट्रीय आवश्यकताओं के भार को ढोने वाले यहां के कन्धे कभी भी आर्थिक स्वतन्त्रता का स्वाद न चख सके। दशकों से यहां के जंगल देश की इमारतों से लेकर रेल तथा रेल की पटरियों हेतु लकड़ी उपलब्ध कराते रहे। लेकिन इसका कोई भी आर्थिक लाभ क्षेत्र के जनमानस को नसीब नहीं हो पाया। राज्य का 71 प्रतिशत भू-भाग वनीय है परन्तु जिस क्षेत्र को ग्रीन रॉयल्टी मिलनी चाहिए थे उस क्षेत्र के लोगों को वनों के अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया। यही नहीं बल्कि राज्य में अनेक पनबिजली योजनायें भी हैं जिसका सारा जोखिम राज्य के लोगों का है परन्तु विडम्बना देखऐ सारा जोखिम उठाने के बाद भी उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है। राज्य में लगभग 13 प्रतिश जमीन ही खेती योग्य है। इसमें भी अधिकांश आज भी असिंचित क्षेत्र है। बड़े बांधों और भूमि अधिग्रहण से यह क्षेत्र निरन्तर सिकुड रहा है परन्तु फिर भी यहां के स्थानीय जनमानस को आर्थिक अधिकारों से वंचित रखा गया है।
उत्तराखण्ड में जन के लिये वन का महत्ता सदैव रहा है। यही कारण है कि यहां सघन वनीय क्षेत्र है परन्तु यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आर्थिक दशाओं के लिए जल, जंगल और जमीन सदैव उत्तराखण्ड के केन्द्र में रहे हैं। वन संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण तथा पारिस्थितिकी तन्त्र के सन्तुलन की बड़ी कीमत उत्तराखण्ड का जनमानस चुका रह है फिर भी वह आज अपने आर्थिक अधिकारों से वंचित है। जिन कारणों से पहाड़ का अर्थतन्त्र ट्रेजरी पर आश्रित होता चला गया। निश्चित तौर पर धरातल पर उन्हें खोजा जा सकता है। वन जहां जीवन के इतने करीब हो वहां वन-जन का रिश्ता समझना कठिन नहीं है। जो भूमि चिपको आन्दोलन की भूमि रही हो उसी भूमि पर आज व्यथा का रोना रोया जा रहा है। इस मुद्दे पर पूर्व में कई व्यापक बहसें हो चुकी हैं तथा आगे भी होती रहेंगी परन्तु सरकारी नीतियों ने यहां के अर्थतन्त्र को पंगु बनाकर पराधीनता के लिए मजबूर किया है। इस सत्य को स्वीकार किया जाना चाहिए ।
उत्पादक से उपभोक्ता की ओर
पहाड़ का व्यक्ति पहले मूल रूप से उत्पादक था। उत्पादक होने के कारण उद्यमिता पहाड़ के रग-रग में बसी हुई थी। एक उद्यमी समाज में जब अपने सतत् विकास के लिए सरकारी नौकरी को विकल्प के रूप में चुना तो हम उत्पादक से उपभोक्ता की ओर बढ़ चले। उद्यमशीलता नष्ट होने तथा उपभोक्ता संस्कृति के पनपने के कारण हमारा आर्थिक आधार कितना कमजोर हो चुका है यह इस क्षेत्र को अलग राज्य बनने के बाद महसूस होने लगा। दशकों से जारी इस प्रक्रिया ने हमारी जो मानसिकता तैयार की है, वह आज निश्चित ही चौराहे पर खड़ी होकर ठिठकी सी लगती है। इस दौर में पहाड़ों ने जो कुछ खोया है और सिर्फ एक बिन्दु पलायन पर चिन्ता जताते हुए अन्य सरोकारों के प्रति जो निरापदता दिखायी है उसके कारण आज तक भी हमारे गांवों में स्वरोजगार के लिये माहौल तैयार ही नहीं हो पाया है। माना कि यहां पर सिंचित और उपजाऊ जमीन की भारी कमी है। परन्तु खेती की चकबन्दी न करने की चिन्ता पर सरकारी हुक्मरानों के कुछ भी नहीं किया बल्कि चकबन्दी के सीधे-साधे मुद्दे को उलझाने का प्रयास ही किया है। सरकारी हुक्मरानों ने चकबन्दी के मुद्दे पर अभी तक कभी भी गम्भीरता से चिन्तन नहीं किया। चकबन्दी के अभाव में बागवानी तथा पशुपालन जैसे रोजगारपरक क्षेत्रों में उत्तराखण्उ में शून्य ही उभर कर आया है। गहरी चिन्ता इस बात को लेकर भी है कि यहां के परम्परागत लघु एवं कुटीर उद्योगों को जिनका आधुनिकीकरण करके नये सिरे से स्थापित किया जा सकता है एक पीढ़ी पर ऐसा काला पर्दा पड़ चुका है कि शायद अगली पीढ़ी को भी इससे उबरने में वक्त लग सकता है। उपभोक्ता से पुनः उत्पादक बनने के लिए हमें मानसिकता में बदलाव लाने की आवश्यकता है। मानसिक रूप से बदलाव लाना इतना आसान भी नहीं इसके लिये पीढ़ियों का इन्तजार करना पड़ेगा । शायद आने वाली पीढ़ियां उत्पादक के महत्व को समझते हुए पुनः उस राह पर लौट जाएं जहां से हमने विचलन किया था।
सरकारी नीतियों का साया
सन् 1815 में सिंगोली की संधि के उपरान्त ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने यहां पर पांव फैलाने शुरू किये। इससे पहले यहां जंगलों पर कोई प्रशासनिक नियंत्रण नहीं था। स्थानीय लोग इन जंगलों पर अपना पैदायशी हक मानते थे। जंगल सांस्कृतिक तथा सामाजिक रूप से हमारे जीवन का हिस्सा थे। इन्हीं जंगलों में आक्रान्ताओं के खिलाफ मोर्चा बन्दी अथवा छिपने-बचने के ठिकाने, चारापत्ती घास लकड़ी, कन्दमूल फल आदि प्राप्त होते थे। आर्थिक व्यापारिक उपभोग की तो तब न यहां के शासकों ने कल्पना की और न ही स्थानीय जनमानस ने इसके बारे में कभी सोचा । राजशाही द्वारा ग्रामीणों को अधिक से अधिक खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। तब जमीन कम से कम एक पीढ़ी तक लगान मुक्त रहती थी। उन स्थानों पर जंगलों में अन्दर तक खेती करने का प्रचलन था जहां की जमीन उपजाऊ थी।
अंग्रेजों ने सबसे पहले भूमि बन्दोबस्त कर यहां की समस्त सार्वजनिक भूमि को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया। वनीय भूमि को सुरक्षित वन भूमि घोषित कर कलेक्टर के अधीन कर दिया। इस पहाड़ी क्षेत्र को अपने अधिकार में लेने के पीछे उनका असली लक्ष्य चीन से व्यापार को आसान बनाने तथा यहां के जंगलों के व्यापारिक दोहन का था। सन 1911 में वन बन्दोबस्त करते हुए नाप भूमि को छोड़कर सारी जमीन सुरक्षित वन क्षेत्र बना दी गयी। इस तरह से जंगलों से यहां के आमजनमानस को वनों से बेदखल कर दिया गया। जंगलों से अधिकार छिन जाने के कारण जंगलों में मीलों तक फैली खेती और उससे जुड़ा हुआ श्रम का जो पारम्परिक स्व-विधान यहां का आधार था। रोक के कारण यहा ंपर ना सिर्फ श्रम का स्व-विधान टूटा बल्कि यहां की उद्यमशीलता को भी बड़ा झटका लगा।
वनों पर अधिकार खोने के बाद यहां की उद्यमशीलता कब चाकरी में परिवर्तित हो गयी पता ही नहीं चला।
19वीं सदी के मध्य में पहाड़ के किसान को भू-स्वामित्व का हक तो मिला किन्तु उसके एवज में उसे बहुत बड़ी कीमती जंगलों पर अपना पैदायशी अधिकार खोकर चुकानी पड़ी। तब भू-स्विमत्व के साथ-साथ खेती के बंटवारे का प्रचलन भी शुरू हो चुका था। भूमि बंटवारे के इस प्रचलन ने पलायन को जन्म दिया। जंगलों पर आश्रित आजीविका पर सरकारी नियन्त्रण का सीधा प्रभाव यह हुआ कि खेती और काम का बोझ बढ़ गया। जंगलों के आश्रित होने तथा उसके बदले में कोई वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण आर्थिक सरोकारों के लिए सरकारी नौकरी पाने का मोहताज होना पड़ा । यहां की उद्यमशीलता का उपयोग अंग्रेज सरकार सेना में करना चाहती थी तथा इन्होंने बड़ी तादाद में यहां के लोगों को सेना में भर्ती किया। उद्यमशीलता के कारण यहां के पुरूष असाधारण वीरता के लिए जाने जाते थे। दो-दो विश्व युद्धों में यहां के उद्यमशील किसान और कारोबारी वीर लड़े। लेकिन ब्रिटिश सरकार की जीत का आधार बनी यहां की उद्यमशीलता का आर्थिक आधार कमजोर होकर मनीआर्डरी अर्थव्यवस्था पर आश्रित हो गया। परिस्थितियों ने ब्रिटिश शासनकाल में जो राह दिखायी थी उससे आज भी यह राज्य मुक्त नहीं हो पाया है।
पलायन के दुष्परिणाम
इस पर्वतीय भू-भाग में पलायन के अनेक दुष्परिणाम देखे गये हैं जिसमें मुख्य निम्नलिखित हैं-
भूमि हृस
समय पर चकबन्दी न होने के कारण भूमि का हृस हो रहा है सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य के पर्वतीय क्षेत्र में मात्र 7 प्रतिशत हिस्से पर ही कृषि कार्य सम्पादित हो रहा है लेकिन बची-खुची शेष जमीन का भी निरन्तर हृस हो रहा है। एक ओर बढ़ते पलायन के कारण कृषि भूमि के बंजर होने के कारण वह भूमि अनुपयोगी होती जा रही है तथा कुछ बंजर भूमि पर जंगल उगने लगे हैं। जंगल से सटे हुए कई स्थानों पर कृषि भूमि वनीय भूमि में बदल चुकी है। अनेक स्थानों पर विकास के नाम पर कृषि भूमि को बरबाद किया जा रहा है। पलायन के कारण नगर क्षेत्र के पहाड़ी कस्बों में जनसंख्या का दबाव बढ़ता जा रहा है। वहां पर अवस्थापन, विकास के नाम पर गैर कृषि कार्यों के लिए कृषि योग्य भूमि का उपयोग किया जा रहा है। खासकर भाबर तराई की उपजाऊ जमीन को समाप्त कर बस्तियां बसाने का कार्य किया जा रहा है। अनेक पहाड़ी नगरों के आस-पास की उपजाऊ जमीन को भी नष्ट किया जा रहा है। जैसे उदाहरण के तौर पर गौचर, उत्तरकाशी, बागेश्वर , पिथौरागढ़, चम्पावत, द्वाराहाट, बागेश्वर, श्रीनगर, गरूड़ आदि अनेक स्थानों पर देखा जा सकता है कि सड़क, बांध परियोजनाओं, बसावट तथा दूसरे गैर कृषि कार्यों के लिए कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है।
राज्य सरकार की मिली भगत से कई प्रभावशाली लोगों तथा दबंग कम्पनियों के द्वारा कृषि योग्य भूमि को बर्बाद किया जा रहा है। यही नहीं बांध सड़क योजनाओं का मलबा डंपिंग जोन में न डालकर खेतों में डाला जा रहा है। अक्सर ऐसे कार्यों में सत्ता से जुड़े प्रभावशाली लोगों के कारण स्थानीय जनां की आवाज को दबा दिया जाता है। हालांकि पर्यावरणीय प्रभावों को दृष्टिगत रखते हुए ही निर्माण कार्य होने चाहिए परन्तु अक्सर निर्माण कार्यों में पर्यावरणीय प्रभावों को अनदेखा कर दिया जाता है जिसके कारण न सिर्फ कृषि योग्य भूमि बर्बाद होती थी बल्कि पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बढ़ते निर्माण कार्यों से राज्य के जल-जंगल-जमीन तथा जैव विविधता पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।
संयुक्त परिवारों का विखण्डन
अस्सी के दशक तक पर्वतीय क्षेत्रों में संयुक्त परिवार प्रणाली थे, परन्तु 1990 के बाद उसमें तेजी से विखण्डन देखा गया। खेती एवं पशुपालन खेती एवं पशुपालन आजीविका का मुख्य स्रोत न होने के कारण संयुक्त परिवार में रहना उस दौर में पारिवारिक मजबूरी भी थी और आवश्यकता भी । खेत के काम में जितने ज्यादा हाथ होते थे उतना ज्यादा काम होता था। संयुक्त परिवार में किसका कार्य क्या होगा यह लगभग परम्परागत ढंग से बंटा होता था। लेकिन जब खेती से आजीविका नौकरी की तरफ स्थानान्तरित होने लगी तो संयुक्त परिवार टूटने लगे। इस पारिवारिक टूटन ने समाज में अलगाव को जन्म दिया जो कि एक सामाजिक बुराई के रूप में प्रदर्शित होने लगी। नौकरी में कम जोखिम होने के कारण आदमी को नौकरी करना अधिक रास आने लगा। एक बार जो नौकरी करने गया उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एकल परिवार की ओर आकर्षित होता गया।
मौसम की मार श्रम पर भारी
पहाड़ में खेती से जुड़े कामों में आजीविका चलाने के लिए अधिक श्रम की आवश्यकता होती है। चकबन्दी न होने के कारण जोतें बिखरी हुई हैं। इस कारण एक जहां व्यक्ति का समय नष्ट होता है वहीं दूसरी ओर वह योजनागत ढंग से कृषि नहीं कर पाता है। समय, श्रम और धन की बरबादी के चलते पहाड़ का व्यक्ति से विमुख होकर पलायन कर जाता है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन की मार भी पड़ती है। जब वर्षा चाहिए तब वर्षा नहीं होती तथा जब वर्षा नहीं चाहिये तब वर्षा खूब होती है।
मौसम के इस बदले हुए मिजाज के कारण पहाड़ की खेती सर्वाधिक प्रभावित हुई है। गांवों में खेती और पशुपालन ही आय के प्रमुख स्रोत हैं परन्तु जब खेती नहीं नहीं होगी तो पशुपालन स्वतः ही छोड़ना पड़ेगा। इसी विडम्बना के कारण पहाड़ का व्यक्ति पलायन के लिए मजबूर है। भूमि सुधार किये बिना इस प्रवृत्ति में बदलाव लाना सम्भव नहीं है।
समाप्त होती शिल्पकला एवं शिल्पी
किसी क्षेत्र के विकास के पैमाने के तौर पर शिल्पकला का महत्वपूर्ण स्थान है। जिस क्षेत्र की शिल्पकला जितनी परिस्कृत होगी वह क्षेत्र उतना ही विकसित माना जाता है। शिल्पकला को निखारने के कुशल शिल्पियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं उत्तराखण्ड में प्राचीन काल से ही शिल्पकला की समृद्ध परम्परा रही है। पलायन, बाजारवाद और वैश्विकरण के बढ़ते प्रभाव के कारण प्रभावित यहां की शिल्पकला संरक्षण के अभाव में दम तोड़ती नजर आ रही है। वर्तमान समय में उत्तराखण्ड की परम्परागत शिल्पकला तथा उसे जुड़े हुए शिल्पकला हस्त शिल्पकार लगभग विलुप्त होने के कगार पर हैं।
प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के विकास का आधार वहां की शिल्पकला ही मानी जाती थी। स्थानीय लोकजीवन के रंग में रंगी लोकमनभावन शिल्पकला ने न सिर्फ जीवन जीने के मार्ग सुगम किये बल्कि लोक जीवन का एक सार्थक और महत्वपूर्ण भाग भी बन गया।
आधुनिक तकनीकी से तैयार आयातित सामान ने पहाड़ की शिल्पकला को न सिर्फ मिटाने का कार्य किया है बल्कि यहां के कुशल शिल्पियों के सामने रोजी-रोटी का संकट भी खड़ा किया है। आधुनिक तकनीकी से तैयार आयातित सामान भले ही कुछ सस्ता हो सकता है परन्तु क्या ऐसे सामान लोकजीवन के रंग भरने के लिए अपनापन व आत्मीयता का आभास सम्भव है ? एक समय कठोर परिश्रम से निर्मित स्थानीय शिल्पियों द्वारा तैयार सामान न सिर्फ अपनापन व आत्मीयता का एहसास कराता था बल्कि शिल्पकला की दृष्टि से भी उत्कृष्ट नमूना होता था।
लुप्त होती भवन कला एवं काष्ठ कला
इस पर्वतीय क्षेत्र को अनेक संघर्षों से गुजरना पड़ा है जिसके कारण यहां की शिल्पकला भी प्रभावित हुई है। गढ़पतियों और उसके बाद राजशाही के उत्थान और पतन के साथ ही यहां की शिल्पकला का इतिहास छिपा है। राजशाही के समय यहां की शिल्पकला तथा कुशल शिल्पियों का राजाश्रय प्राप्त था जिसके कारण उस समय यहां की शिल्पकला अपने चरम पर थी। गोरखाओं के आक्रमण के बाद यहां की शिल्पकला को भारी हानि हुई। गढ़वाल की राजधानी चांदपुर गढ़ी तथा अनेक स्थानों पर शिल्पकला की अद्भुत नमूनों को देखकर आसानी से प्रमाणित किया जा सकता है कि उस काल में पहाड़ की प्रस्तर शिल्पकला कितना उन्नत किस्म की रही होगी। अपने इसी शिल्पकला हुनर के बलबूते उस समय समाज को शिल्पियों को बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।
भवन निर्माण की पहाड़ी शैली का बेजोड़ कला, मंदिर निर्माण कला, मूर्ति कला, काष्ठ कला, धातु, आभूषण, परिधान शिल्प से साथ रिंगाल और बांस से निर्मित वस्तुआेंं की माफी मांग थी।
उत्तराखण्ड की तत्कालीन गृह निर्माण कला बहुत उन्नत और बेजोड़ थी। उत्तराखण्ड की देश का ऐसा क्षेत्र था जहां का गृह निर्माण शिल्प अत्यन्त विकसित था। इस क्षेत्र में आज भी पुराने भवनों में दरवाजे, खिड़िकियों, चौखट, महराब, खम्भों, ब्रकेट्स पर की गयी नक्कासी से लेकर तिवारी ,खोली और नीमदारी तक भवन निर्माण में प्रयुक्त काष्ठ शिल्प पर देवी-देवताओं, मानवाकृतियों, सजावटी बेल-बूटे, पशु-पक्षी, और पेड़-पौधों को सुन्दर ढंग से किया गया चित्रण देखा जा सकता है।
खांटी जौनसार-भाबर सहित कुछ क्षेत्रों में आज भी कुछ गिने-चुने शिल्पहस्त कारीगरों द्वारा लकड़ियों से शानदार मकान तैयार किये जा रहे हैं। भवन निर्माण के साथ ही काष्ठ कला का यह बेजोड़ संगम अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। निःसन्देह उत्तराखण्ड की शिल्पहस्त कला बहुत ही परिष्कृत थी। परंतु संरक्षण के अभाव में आज दम तोड़ती नजर आ रही है।
राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड की भवन निर्माण कला को बचाने की आवश्यकता थी। परन्तु सत्ता प्रतिष्ठानों में मचे घमासान ने उसे भुला दिया। बढ़ते पलायन के कारण यहां भी भवन निर्माण कला के शिल्पहस्त राजमिस्त्री गिने-चुने ही बचे हुए हैं। किसी समय इन्हीं राजमिस्त्रियों ने पहाड़ की विशिष्ट भवन निर्माण शैली को उत्कृष्टता प्रदान की थी। वर्तमान समय में देखा-देखी में पत्थरों का पठाल या स्लैट का स्थान ईंट-गारा, सीमेन्ट सरिया ने ले लिया है। जो सीमित अवधि बाद ध्वस्त हो जाते हैं या उसका क्षरण हो जाता है। जबकि सालों पूर्व पहाड़ के शिल्पियों द्वारा तरासे गये पत्थरों से निर्मित भवन आज भी शान से खड़े हैं। अंग्रेजों के समय भी अनेक स्थानो ंपर पहाड़ के राजमिस्त्रियों ने भव्य व बेहतरीन बंगलों का निर्माण किया परन्तु आज यह कला समाप्ति की ओर अग्रसर है।
लुप्त होता मूर्ति और प्रस्तर शिल्प
शताब्दियों पूर्व पहाड़ की मन्दिर व मूर्ति शिल्पकला अपने परम वैभव पर था। इस राज्य में मन्दिरों की अधिकता तथा भव्यता के कारण ही इस राज्य को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। आठवीं से लेकर चौदहवीं विक्रमी सदी तक का काल पहाड़ में मन्दिर वास्तु शिल्प का उत्कृष्ट काल कहा जाता है। गोपेश्वर, लाखामण्डल, पैठाणी, बैजनाथ, जागेश्वर, राजराजेश्वरी, देवप्रयाग का रघुनाथ मंदिर, कोशी कटारमल के सूर्य मन्दिर आदि मन्दिर शैलियों में विभिन्न कालखण्डों में निर्मित हुए हैं। उत्तराखण्ड में मूर्ति कला से सम्बन्धित यह प्राचीन शिल्प अब लगभग प्रचलन से बाहर हो चुका है। शायद ही आज पहाड़ में इस शिल्पकला को जानने वाला कोई शिल्पी मौजूद है। प्रस्तर शिल्प में जल स्रोतों के धारों पर की गयी नक्काशी, घराट, जन्दरा, सिलबट्टा, खोली, मोरी, पन्देरा धारा, बावड़ी, छज्जा आदि अनेक वस्तुओं पर बेहतरी नक्काशी की जाती थी। इसके अलावा मकानों की छत पर लगने वाली पठाल या स्लेट आज धीरे-धीरे अनुपयोगी हो चुकी है। इस प्रकार की शिल्पकला के प्रचलन से बाहर होने के कारण शिल्पियों ने पलायन किया या आजीविका के दूसरे साधन ढूंढ लिये जिसके कारण यह कला भी अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही है।
लुप्तप्रायः हुआ धातु शिल्प उद्योग
उत्तराखण्ड में प्राचीन काल से ही धातु शिल्प उद्योग का भी महत्व रहा है। विभिन्न धातुओं के शिल्पियों को पहाड़ में विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे लोहे का काम करने वाला लोहार, सोने-चांदी का कार्य करने वाला सुनार, तांबा और कांस्य का काम करने वाला टम्टा कहा जाता था। पहाड़ में इन विभिन्न धातुओं के शिल्पियों को यथोचित सम्मान प्राप्त था। खेती के औजारों से लेकर युद्ध और आखेट के लिए हथियार बनाने में ये शिल्पी सिद्धहस्त थे। विभिन्न वाद्ययन्त्रों का निर्माण भी यही शिल्पी करते थे। प्राचीन राजाओं और गढ़पतियों द्वारा इन शिल्पियों को आश्रय प्रदान किया जाता था। बदलते समय में उत्तराखण्ड के धातु शिल्प उद्योग का भी भारी हृस हुआ है।
घटते वाद्ययन्त्रों के जानकार
उत्तराखण्ड में पहले परम्परागत वाद्य यन्त्रों के सिद्धहस्त जानकार थे परन्तु पलायन की मार के कारण इनकी संख्या भी निरन्तर घट रही है। ढोल बजाने वाले पहले ढोल सागर में प्रवीण तथा सिद्धहस्त होते थे। परन्तु आज कुछ गिने चुने ही ढोल सागर के ज्ञाता बचे हैं । परम्परागत वाद्ययन्त्रों तथा उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक पहचान ढोल सागर को आज संरक्षित एवं संवर्द्धन की आवश्यकता है।
सिमटता वस्त्र शिल्प उद्योग
आभूषण और परिधान शिल्प में भी पहाड़ के पुराने शिल्पी सिद्धहस्त थे। भौगोलिक परिस्थितियो ंके अनुसार यहां पर ऊनी वस्त्रों को अधिक महत्व दिया जाता था। ऊनी वस्त्रों के लिए कच्चा माल ऊन यहां पर परम्परागत भेड़ पालन व्यवसाय के कारण आसानी से उपलब्ध थी। त्यूंखा, मिरजई, फतूगी, अगड़ी, लवा, कम्बल, टोपी आदि यहां के परम्परागत पहनावा था। ऊनी कालीन और दरी बनाने में भी यहां के कारीगर निपुण थे। आधुनिक परिवेश में रंगने के कारण आज यहां पर इन परिधानों का प्रचलन लगभग समाप्त हो चुका है। कालीन, गलीचे, ऊनी कम्बल, चुटके, थुलमें जैसे हस्तशिल्प की परम्परा तिब्बत की सीमा से लगे क्षेत्रों में अधिक होता था, परन्तु वर्तमान परिवेश में यह उद्योग भी सिमटता जा रहा है।
सिमटता स्थानीय आभूषण शिल्प
पहले उत्तराखण्ड में सोने और चांदी के आभूषणों में नक्कासी का कार्य खूब प्रचलित था। परन्तु अब यह स्थानीय आभूषण शिल्प भी सिमटता जा रहा है। सोने के आभूषणों में नथ, बुलॉक, फूली, गोरण, बाली और मुरखला का प्रचलन अधिक था बाद में गुलबन्द और विसार तथा मांगटीका का प्रचलन भी बढ़ा। चांदी के गहनों में लच्छा, छिंवरा, पोंटा, मुरबुला, कर्णफूल, शीषफूल, करधनी, स्यूड़ा, चूड़ी, पौंछी, कड़ा, थगुला, हंसला, थगुली, हंसली, छुपकी, कटेला, चन्द्रहार, चांदी के रूपयों की माला आदि आज लगभग पुरानी धरोहर की चीजें रह गयी हैं। स्थानीय स्वर्ण तथा चांदी के आभूषणों की नक्काशी करने वाले शिल्पी आज लगभग नगण्य हो चुके हैं। आज यहां के बाजारों में जो स्वर्ण तथा चांदी के आभूषण उपलब्ध हैं वे रेडीमेड ही हैं। शिल्पहस्त शिल्पियों की कमी के कारण हमारी प्राचीन आभूषण शिल्पकला की समृद्ध परम्परा आज अन्तिम सांसे गिन रही है।
अस्तित्व खोता रिंगाल एवं बांस शिल्प उद्योग
रिंगाल एवं बांस से बनी वस्तुओं का पहाड़ के लोकजीवन में अपना विशिष्ट महत्व रहा है। रिंगाल से जुड़े शिल्प का विशेष ज्ञान एक जाति विशेष के लोग जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘रूड्या’ कहते थे। रूड्या जाति के लोग रिंगाल शिल्पहस्त कला में माहिर होते थे। पहले रूड्या जाति के लोग पहाड़ के अधिकांश गांवों मेंं मिल जाते थै। ये रिंगाल शिल्पी रिंगाल से कंडिया, सूप, टोकरियां, बड़े टोकरे, चटाई, अनाज रखने के लिए बड़े-छोटे कुन्ने आदि बनाते थे।
बढ़ते प्लास्टिक प्रचलन तथा मशीनीकरण ने रिंगाल से बनी इन कलात्मक वस्तुओं के शिल्प का सीमित कर दिया है। जीविकोपार्जन के लिए मुश्किल दौर का सामना करने के कारण आज यह शिल्प भी दम तोड़ता जा रहा है। अब बहुत सीमित क्षेत्रों में रूड़या लोग रिंगाल पर कार्य कर रहे हैं । चमोली जिले के पीपलकोटी तथा जोशीमठ के बीच रूड्या लोग आज भी रिंगाल का व्यवसाय करते हैं। बागेश्वर एवं पिथौरागढ़ जिलों में बांस व रिंगाल के शिल्पी आज भी कार्यरत हैं, परन्तु सीमित बिक्री होने के कारण इस परम्परागत उद्योग पर अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं। कभी रिंगाल से बनी वस्तुऐं डोके डालिया, टोकरियां, सूप आदि आमजन के जीवन में रची-बसी रोजमर्रा की अनिवार्य वस्तु होने के कारण यह विधा स्थानीय उद्योग के रूप में विकसित हुयी थी। कभी कुमैयां अदेले (लोहे की कढ़ाई) लोहाघाट का प्रमुख उद्योग था। प्रमुख उद्योग होने के कारण ही इस क्षेत्र का नाम लोहाघाट पड़ा था। इस पर्वतीय प्रदेश के अधिकांश लघु एवं कुटीर उद्योग या तो पूर्ण रूप से बन्द हो चुके या बन्द होने की कगार में खड़े हैं। मात्र कुछ स्थानीय उद्योग ही गांव-देहात में किसी प्रकार अपने को बचाये हुये हैं।
मनन का समय
यदि इस क्षेत्र में समय रहते भूमि सुधार हुआ होता तो शायद पलायन की इतनी बड़ी मार इस राज्य में नहीं पड़ती। यदि गांव आबाद होते तो निश्चित रूप से यहां के परम्परागत लघु एवं कुटीर उद्योग भी जीवित रहते। लघु एवं कुटीर उद्योगों से हजारों हाथों को काम मिलता तथा स्थानीय आर्थिकी भी निश्चित रूप से मजबूत होती। राज्य की मनी आर्डरी आर्थिक संस्कृति के बजाय आर्थिकी का सशक्त आधार तैयार होता तो यह राज्य आर्थिक रूप से समृद्ध होता। बढ़ती बेरोजगारी की फौज, घटते आर्थिक संसाधन, बंजर होते खेत, खण्डहर होते गांव आज यही सोचने पर विवश कर रहे हैं कि राज्य की नीतियों पर फिर से मनन करने की आवश्यकता है। आज पुनः इस बात पर मनन करने की आवश्यकता महसूस हो रही है कहां पर चूक हुई है। यदि वास्तव में इस राज्य को आर्थिक रूप से समृद्ध करना है तो अनिवार्य चकबन्दी ही एकमात्र विकल्प है। बिना चकबन्दी किए राज्य की समृद्धि की कल्पना करना बेकार है।
चकबन्दी आन्दोलन साल-दर-साल
चकबन्दी की मांग
भूमि सुधार की मांग सभी राज्यों में समय-समय पर उठती रही है। भारत में सर्वप्रथम चकबन्दी की प्रायोगिक शुरूआत सन् 1920 में हुई थी। सन् 1936 में पंजाब में सर्वप्रथम चकबन्दी कानून पास किया गया था। संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) में भी टुकड़ों में बंटी जमीन पर काम करना मुश्किल होता जा रहा था। पंजाब की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी चकबन्दी की मांग उठने लगी। वास्तविक हालातों को देखते हुए उत्तर प्रदेश में चकबन्दी की मांग को हर राजनीतिक दल का समर्थन मिलने लगा। सन 1937 में जब उत्तर प्रदेश में संयुक्त प्रान्त के एसेम्बली चुनाव हुए तो सभी राजनैतिक दलों ने अपने घोषणा पत्र में चकबन्दी को शामिल किया। संयुक्त प्रान्त में तत्कालीन समय में गोविन्द वल्लभ पंत के नेतृत्व में सरकार बनी तथा चकबन्दी कानून अस्तित्व में आया। 1939 में जोत चकबन्दी कानून बनाकर संयुक्त प्रान्त ( उत्तर प्रदेश) में 6004 गांवों में चकबन्दी की गयी। स्वतंत्र भारत में उत्तर प्रदेश का 1954 में चकबन्दी कानून बना तथा 1958 में अनिवार्य चकबन्दी का कानून सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में लागू कर दिया गया। 1958 में जबकि सम्पूर्ण उत्तर प्रदश्े में अनिवार्य चकबन्दी लागू की गयी थी तो पर्वतीय क्षेत्रों (उत्तराखण्ड) में यह कहकर अलग रखा गया था कि, जब पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी शुरू की जायेगी तो भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप ही यहां पर चकबन्दी कानून बनाया जायेगा। तब से अब तक यह क्षेत्र अनिवार्य चकबन्दी से अछूता ही है।
उत्तराखण्ड में चकबन्दी आन्दोलन की शुरूआत-
उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों (वर्तमान उत्तराखण्ड) में भू-सुधारों को लेकर जब लम्बे समय तक प्रदेश सरकार ने चुप्पी साध ली थी तो यहां पर भूमि सम्बन्धी अनेक समस्यायें पैदा होने लगी। इस कारण इस क्षेत्र में योजना बनाकर कृषि कार्य करना कठिन होता चला गया। श्रम साध्य होने के कारण युवाओं का रूझान इस ओर घटने लगा। पर्वतीय क्षेत्रों में बेरूखी के कारण कृषि का रकबा घटने लगा परन्तु इसके निदान के लिए तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कोई भी कदम नहीं उठाये गये । जब भूमि सुधार की ओर लम्बे समय तक सरकार द्वारा ध्यान नहीं दिया गया तो 1975 में सबसे पहले दिल्ली में अखिल भारतीय गढ़वाली प्रगतिशील संगठन के तत्वावधान में पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी को लेकर एक बैठक का आयोजन किया गया। संगठन ने तत्कालीन प्रदेश सरकार से चकबन्दी की मांग की। चकबन्दी के जगरी गणेश सिंह ‘गरीब’ ने चकबन्दी का पर्वतीय क्षेत्रों का विकास का मूलमन्त्र मानते हुए चकबन्दी को ही जीवन का मिशन बनाया। सन 1977 में अखिल भारतीय प्रगतिशील गढ़वाली संगठन ने पर्वतीय क्षेत्रों में हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर पुनः अनिवार्य चकबन्दी की मांग की। संगठन ने पर्वतीय क्षेत्रों में भ्रमण भी किया तथा चकबन्दी के लिए माहौल तैयार करने के उद्देश्य से कई गांवों में बैठकों का आयोजन भी किया परन्तु पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी का कोई भी प्रायोगिक मॉडल न होने के कारण संवाद से क्षेत्रीय किसानों को वास्तविक रूप में समझाने में विफल रहे। जनसंवाद से निकली प्रायोगिक मॉडल की बात संगठन के सददस्यों के मन में भी थी परन्तु पहल कौन करेगा। इसके लिए कशमाकश थी। ऐसे समय गणेश सिंह ‘गरीब’ आगे आये और उन्होंने चकबन्दी मॉडल तैयार करने के लिए दिल्ली की सुख सुविधाओं को त्यागकर अपने गांव आना स्वीकार किया। 26 जनवरी 1981 को गणेश सिंह ‘गरीब’ अपने गांव-सूला, पट्टी-असवालस्यूॅ, पौड़ी गढ़वाल वापस चले आये तथा अपनी उपजाऊ जमीन के बदले बेकार पड़ी बंजर भूमि पर एकमुश्त 18 नाली का चक तैयार कर उत्तराखण्ड में सर्वप्रथम प्रायोगिक चक तैयार किया। उत्तराखण्ड में यह चकबन्दी का प्रथम उदाहरण था। हालांकि तब गणेश सिंह ‘गरीब’ ने अपनी उपजाऊ भूमि के बदले बंजर जमीन लेना स्वीकार किया था ताकि चकबन्दी मॉडल तैयार किया जा सके। उनके द्वारा की गयी कड़ी मेहनत और लगन ने चकबन्दी का एक सफल उदाहरण प्रस्तुत किया। ’चन्दन वाटिका’ के नाम से प्रसिद्ध आपका चक आज उत्तराखण्ड सरकार के सामने एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है परन्तु राज्य बनने के बाद भी उत्तराखण्ड सरकार ने चकबन्दी को कभी भी गम्भीरता से नहीं लिया। चकबन्दी को जीवन का मिशन बनाने वाले गरीब ने पर्वतीय क्षेत्रों में अनिवार्य चकबन्दी के लिये निरन्तर जनजागरण के साथ सरकार को भी जागृत करते रहे। उन्होंने पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी करने के बावत सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों एवं शासन-प्रशासन में बैठे हजारों लोगों से संपर्क किया, सैकड़ों पत्र भेजे, अनेक गांवों में पदयात्रायें की। विचार गोष्ठियों और जनसम्पर्क के माध्यम से चकबन्दी की मशाल को जलाये रखा। विकासखण्ड, जिला एवं राज्य स्तर पर चकबन्दी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन आयोजित किये। उनके निरन्तर प्रयास के कारण अनेक बुद्धिजीवी चकबन्दी आन्दोलन से जुड़े। चकबन्दी की आवाज बुलन्द करने के लिए 1984 में पर्वतीय विकास संगठन का गठन किया गया। इसी प्रकार सन 1986 मे ंचकबन्दी आन्दोलन को धार देने के लिए मजदूर कृषक संघ का गठन किया गया। उनके सार्थक प्रयासों के कारण ही 1983 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी दिल्ली के किसान सेल की दो दिवसीय गोष्ठी में पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी पर जोर दिया गया। इसी वर्ष पौड़ी में गढ़वाल मण्डल आयुक्त की अध्यक्षता चकबन्दी सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें तत्कालीन गढ़वाल जिलाधिकारी, विधायक पौड़ी, जिलाध्यक्ष एवं अनेक पंचायत प्रतिनिधियों ने पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी लागू करने की पुरजोर मांग की। 1989 में क्षेत्र के सभी जिला पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों तथा ग्राम पंचायतों की ओर से सरकार को चकबन्दी कराये जाने के लिए प्रस्ताव भेजे गये। बढ़ते जनदबाव को देखते हुये 1989 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने पर्वतीय क्षेत्रों में चकन्दी कराये जाने का निर्णय लिया। इसी क्रम में सन 1990 में गढ़वाल मण्डल के पौड़ी जनपद तथा कुमाऊँ मण्डल के अल्मोड़ा जनपद में चकबन्दी कार्यालय खोले गये। चकबन्दी को अनिवार्य बनाये जाने के लिए तथा सरकार पर दबाव बनाने के लिए 1992 में गरीब बेरोजगार संघ का गठन किया गया। सन 1996 में चकबन्दी को समर्थन देते हुए चकबन्दी समिति का गठन किया गया। कमजोर राजनैतिक इच्छा शक्ति ने एक बार पुनः जोर मारा तथा 1990 में पौड़ी और अल्मोड़ा में जो कार्यालय खुले थे स्पष्टवादिता, दृष्टि का अभाव, प्रारूप तथा निमय कानून तैयार न कर पाने के कारण सन 1996 में उन्हें बन्द कर दिया गया। सन् 1997 में उत्तर प्रदेश सरकार ने पर्वतीय विकास विभाग के प्रमुख आर0एस0 टोलिया को चकबन्दी प्रारूप तैयार करने का दायित्व सौंपा गया परन्तु पुनः राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी के कारण इसका कोई भी परिणाम नहीं निकल पाया। 1997 में चकबन्दी के समर्थन में चकबन्दी विकास समिति का गठन किया गया। इसी क्रम में सन 2000 में चकबन्दी परामर्श समिति का गठन किया गया। सन 2001 में मूल नागरिक किसान मंच का गठन कर उत्तराखण्ड में चकबन्दी पर जोर दिया गया। सन 2001 में राज्य में गठित प्रथम अन्तरिम सरकार ने चकबन्दी के समर्थन में संकल्प पारित किया। सन 2002 में उत्तराखण्ड बनने के बाद प्रथम निर्वाचित सरकार के मुख्य मंत्री नारायणदत्त तिवारी ने चकबन्दी के संकल्प को दोहराया तथा प्रदेश के राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला ने 15 अगस्त 2002 के अभिभाषण में पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी करने का उल्लेख किया। 2003 में चकबन्दी आन्दोलन को धार देने के लिये चकबन्दी संघर्ष समिति का गठन किया गया तथा इसी वर्ष में तत्कालीन राजस्व मंत्री डॉ0 हरक सिंह रावत की अध्यक्षता में प्रदेश में चकबन्दी करने के लिए चकबन्दी परामर्श समिति का गठन किया गया। 1 माह के अन्दर चकबन्दी का प्रारूप तैयार कर सरकार के सम्मुख प्रस्तुत करने को कहा गया परन्तु फिर से राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव में एक बार पुनः मामला जस का तस लटका रह गया क्योंकि चकबन्दी परामर्श समिति को कानूनी मान्यता प्रदान नहीं दी गयी। सन 2004 में पूरन सिंह डंगवाल की अध्यक्षता में भूमि सुधार परिषद का गठन किया गया। इस परिषद को चकबन्दी का प्रारूप तैयार करने की जिम्मेदारी दी गयी। 2004 -05 में परिषद ने पौड़ी जनपद के कल्जीखाल विकास खण्ड तथा अल्मोड़ा के ताड़ीखेत विकासखण्ड की एक एक न्याय पचांयत का चयन कर उन स्थानों पर अनेक बैठकों का आयोजन किया तथा अनेक प्रस्तावों को लिया। प्रदेश की प्रथम निर्वाचित सरकार में चकबन्दी का फुटबाल का दौर चलता रहा तथा 2007 में सरकार का कार्यकाल पूरा हो गया। 2007 में सरकार बदल गयी। इस सरकार ने भी चकबन्दी लागू करने की बात दोहरायी तथा 2009 में स्वैच्छिक चकबन्दी लागू करने के लिए तत्कालीन कृषि मन्त्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की अध्यक्षता में चकबन्दी परामर्श समिति गठित की गयी। इस समिति को भी चकबन्दी का प्रारूप तैयार करने का दायित्व सौंपा गया परन्तु राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव में यह समिति चकबन्दी का कोई भी प्रारूप तैयार न कर सकी और न ही चकबन्दी के लिए आम सहमति बना सकी। सन 2012 में राज्य में तीसरी नई सरकार का गठन हुआ तथा सरकार के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने मंत्रीमण्डल की बैठक में उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 का संशोधन किया ताकि प्रदेश में चकबन्दी का रास्ता साफ हो सके। 2012 में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने श्रीनगर गढवाल की समीक्षा बैठक में पूरे प्रदेश में चकबन्दी लागू करने के निर्देश दिये। 2012 में गरीब क्रान्ति अभियान के बैनर तले चकबन्दी के समर्थन में सरकार को ज्ञापन प्रस्तुत किये गये। साथ ही आम जन में प्रचार-प्रसार के उद््देश्य से सोशल मीडिया तथा अन्य प्रचार प्रसार माध्यमों ने चकबन्दी के समर्थन में जनजागरण अभियान चलाया तथा श्रीनगर व देहरादून में विचार गोष्ठियों का आयोजन किया। जन्तर-मन्तर नई दिल्ी में चकबन्दी दिवस का आयेजन कर सरकार को जगाने का प्रयास किया। अगस्त 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने राज्य सरकार द्वारा प्रदेश में अनिवार्य चकबन्दी लागू करने के लिए मन्त्री परिषद की तीन सदस्यीय उपसमिति का गठन किया। डॉ0 हरक सिंह रावत की अध्यक्षता में गठित इस समिति में इन्दिरा हृदयेश तथा यशपाल आर्य को सदस्य बनाया गया था। निर्णय लिया गया था कि यह समिति प्रदेश के सांसदों, विधायकों, राजनैतिक दल के नेताओं तथा चकबन्दी से समाज सेवियों से सुझाव लेकर सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी । फिर इन सुझावों पर अमल करते हुए उन्हें कानूनी जामा पहनाने के लिए विधानसभा के पटल पर रखा जायेगा।
सितम्बर 2013 में प्रदेश सरकार द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों मेंं अनिवार्य चकबन्दी की घोषणा की गयी तथा मन्त्रिमण्डल में चकबन्दी का प्रस्ताव पास किया गया और विधानसभा में विधेयक लाने के लिए वचनबद्धता दोहरायी गयी। एक मार्च 2014 को गरीब क्रान्ति के बैनर तले जन्तर-मन्तर नई दिल्ली में चकबन्दी दिवस का आयोजन किया गया इस आयोजन में उत्तरांचल युवा प्रवासी समिति तथा उत्तराखण्ड से जुड़े कई संगठनों ने भाग लिया। प्रदेश सरकार द्वारा मार्च 2014 में चकबन्दी (पर्वतीय) निदेशालय का गठन किया गया तथा तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी करने के लिए गणेश सिंह ‘गरीब’ से वार्ता कर सुझाव मांगे। अगस्त 2014 में राज्य सरकार द्वारा प्रदेश के 200 गाँवों में चकबन्दी करने के लिए घोषणा की गयी।
जनवरी 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पर्वतीय चकबन्दी समिति का गठन किया तथा समिति के अध्यक्ष केदार सिंह रावत को नियुक्त किया गया। इस समिति का कार्य पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी के लिए ड्राफ्ट तैयार करना था। अक्टूबर 2015 में पर्वतीय चकबन्दी समिति द्वारा चकबन्दी के लिए ड्राफ्ट तैयार किया गया। ड्राफ्ट तैयार करने के लिए समिति ने हिमाचल, अरूणाचल तथा उत्तर प्रदेश के चकबन्दी प्रावधानों का अध्ययन किया तथा सात बैठकों का आयोजन किया गया। उत्तराखण्ड में 250 ऐसे गांवों को चिन्हित किया गया जहां चकबन्दी को लेकर आम सहमति थी। चकबन्दी अधिनियम के ड्राफ्ट में पर्वतीय क्षेत्रों में तीन प्रकार के चक बनाने का प्राविधान रखा गया। ड्राफ्ट में पर्वतीय क्षेत्रों में वनों की भूमि को अलग वर्ग में रखा गया तथा वनीय भूमि का अलग चक बनाने का प्राविधान रखा गया। इसी प्रकार गांव के आस-पास की भूमि को दो अलग-अलग वर्गों में बांट कर दो प्रकार के चक बनाने का प्राविधान रखा गया। गांव छोड़ चुके लोगों की जमीन ।इेमदजमम स्ंदक स्वंतक (अनुपस्थित भूस्वामी) का अलग चक बनाये जाने का प्राविधान भी इस ड्राफ्ट में शामिल किया गया।
जुलाई 2016 में ’जोत चकबन्दी एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम-2016’ को विधानसभा में पास किया गया। मार्च 2017 में नवोदित राज्य उत्तराखण्ड में चौथी बार नयी सरकार का गठन हुआ तथा उम्मीद की गयी कि राज्य की नई सरकार राज्य चकबन्दी के कार्यों पर तीव्रता लायेगी, परन्तु ऐसा कुछ भी न हो सका। नवम्बर 2017 में उत्तराखण्ड सरकार ने घोषणा की कि, प्रदेश में चकबन्दी की शुरूआत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जनपद पौड़ी गढ़वाल के विकासखण्ड यमकेश्वर की ग्राम सभा सीला के राजस्व ग्राम पंचूर तथा उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत के सतपुली तहसील के अन्तर्गत खैरागांव से की जायेगी।
दिसम्बर 2018 में गरीब क्रान्ति से जुड़े हुए चकबन्दी के समर्थक कार्यकर्ताओं ने सचिवालय में राजस्व सचिव से मिलकर पहाडों में चकबन्दी की नियमावली बनाने की मांग की। मई 2020 में ’उत्तराखण्ड पर्वतीय जोत चकबन्दी और भूमि व्यवस्था नियमावली-2020’ को उत्तराखण्ड सरकार के मन्त्रीमण्डल द्वारा मंजूरी प्रदान की गयी।
पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी किये जाने पर उत्तर प्रदेश सरकार हो या उत्तराखण्ड सरकार सभी ने स्वीकृति प्रदान की है परन्तु राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव में अभी तक पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी नहीं हो पायी है। चकबन्दी के समर्थक पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी की आज भी बाट जोह रहे हैं। उत्तराखण्ड को बने 20 साल हो चुके हैं तथा एक अन्तरिम सरकार सहित यह चौथी निर्वाचित सरकार का कार्यकाल भी पूर्ण होने वाला है परन्तु राज्य में अभी भी चकबन्दी एक सपना बना हुआ है।
चकबन्दी न होने से पहाड़ ने क्या खोया ?
पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी न होने से आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक नुकसान हुआ है। एक ओर जहां यहां के स्थानीय लोग कृषि कार्यों से विमुख होते चले गये तो दूसरी ओर उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक विसंगतियां पैदा हो गयी जो कि समय के साथ-साथ बढ़ती गयी। एक समय जहां कृषि पूर्ण रोजगार का साधन थी तथा कृषि आधारित लघु एवं कुटीर उद्योग यहां पर आजीविका के प्रमुख साधन थे। परन्तु भू-प्रबन्धन न होने के कारण लोग कृषि से विमुख होते चले गये तथा यहां पर कृषि आधारित अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। सामुदायिकता एवं सामूहिकता यहां की सामाजिक व्यवस्था की रीढ़ थे परन्तु घटते आर्थिक संसाधनों ने इस सामाजिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया। चकबन्दी न होने से पहाड़ों ने मुख्य रूप से जो खोया उसे निम्न बिन्दुओं से समझा जा सकता है।
पलायन का दंश
वैसे तो पलायन एक सतत् प्रक्रिया है तथा सम्पूर्ण विश्व के लोग निवास करने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर विस्थापित होते ही रहते हैं लेकिन उत्तराखण्ड का पलायन एक अभिशाप बनता जा रहा है। पहले सीमित मात्रा में पलायन होने के कारण पलायन एक समस्या नहीं थी। पहले यदि किसी परिवार में चार भाई थे तो एक या दो भाई रोजगार के लिए अन्यत्र जाते थे तो दो या तीन भाई गांव में रहकर ही खेती-बाड़ी से जुड़ कर खेती कार्य करते थे। अन्यत्र होने के बावजूद भी वह अपनी मूल जड़ों से जुड़ा रहता था। अधिकांश लोग सेवा निवृति के बाद पुनः गांव लौट जाया करते थे। पहाड़ में नौकरी करने की परम्परा अंग्रेजों के आने के बाद से बढ़ी है। पहले लोग शासकों के यहां नौकरी करते थे जो बहुत सीमित मात्रा में थे, परन्तु अंग्रेजों के आने के बाद यहां के लोग सेना में भर्ती होने लगे। यही सिलसिला आजादी के बाद भी जारी रहा। फर्क इतना पड़ा कि आजादी के बाद सेवा के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी लोग नौकरी करने लगे, जिसमें असंगठित क्षेत्र भी शमिल था। आजीविका के लिए नौकरी पर निर्भरता के कारण पहाड़ की अर्थव्यवस्था मनी ऑर्डर अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो गयी।
पहाड़ से इस प्रकार के नकारात्मक पलायन बुद्धिजीवियों एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों के लिए हमेशा ही चिन्ता का विषय रहा है। लेखकों, कवियों एवं पत्रकारों ने समय समय पर जहां पलायन के दुष्परिणामों पर सरकारों को चेताया है वहीं आम जनता से अपनी जन्मभूमि न छोड़ने की बार-बार अपील की है।
उत्तराखण्ड के संदर्भ में पलायन केवल भावनात्मक एवं सामाजिक मुद्दा नहीं है बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से जुड़ा होने के कारण सामरिक मुद्दा भी है। बढ़ती पलायन की प्रवृत्ति ने यहां की सांस्कृतिक विशिष्टताओं को बचाने के लिए जबरदस्त चुनौती दी है। यदि समय रहते इस पर कार्य न किया गया तो आने वाले समय में यहां की सांस्कृतिक धरोहर विलुप्ति के कगार पर खड़ी हो जायेगी।
भारत विविधतापूर्ण सांस्कृतिक धरोहरों सामाजिक व्यवस्थाओं, रीति-रिवाजों तथा भौगोलिक अंचलाकें का एक खूबसूरत समागम है। महासागर की गहराई से लेकर हिमालय की ऊंचाई भारत की संस्कृति को विविधता प्रदान करते हैं। भारत का भारतव्य या भारतपन वस्तुतः इन्हीं अंचलों की खुशहाली में ही समाहित है। देश में तभी समृद्धि आ सकती है जब देश का प्रत्येक अंचल समृद्धि होगा। भारत की संप्रभुता को बचाने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों से पलायन को रोकना राष्ट्रीयता को बचाने जैसा ही है। बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पलायन के मुख्य कारण रहे हैं। चकबन्दी इन सभी कारणों के मूल में हैं। बिना चकबन्दी के पर्वतीय क्षेत्रों में आर्थिक समृद्धि की बात करना तथा पलायन को रोकना बेमानी है।
कुटीर उद्योगों का हृस
पर्वतीय क्षेत्रो में कृषि कार्यों से विमुख होने के कारण कृषि आधारित लघु एवं कुटीर उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं पहले यहां पर कृषि पूर्ण रोजगार का साधन थी। तथा कृषि कई लघु एवं कुटीर उद्योग यहां पर कार्यरत थे। परन्तु भूमि का उचित प्रबन्धन न होने के कारण इसमें निरन्तर हानि होने से लोग कृषि से विमुख होते गये। इसके कारण यहां पर कृषि एवं कृषि आधारित अर्थव्यवस्था कमजोर होती चली गयी। उत्तर प्रदेश में हरित क्रान्ति की सफलता का मुख्य कारक चकबन्दी ही था। लेकिन राज्य बनने के बाद भी यहां भूमि सुधार पर कोई ध्यान नहीं दिया गया तथा यह पर्वतीय राज्य अपनी मूल अवधारणा से विस्थापित होने के कारण आर्थिक विकास में पिछड़ता ही चला गया । गांव में खेती किसानी न होने से उस पर आधारित परम्परागत लघु एवं कुटीर उद्योग समाप्त होने की कगार में हैं तथा उससे जुड़े हुए लोगों पर आजीविका का भारी संकट है। एक समय गांव में बढ़ई, लोहार, दर्जी, मिस्त्री आदि कामों में कई परिवारों की रोजी रोटी चलती थी। परन्तु बंजर होते खेत तथा बढ़ते पलायन ने इस प्रकार के कई दस्तकारों पर आजीविका का संकट ला दिया है। पर्वतीय क्षेत्रों में पहले हल लगाने का सामान, निराई गुड़ाई के यन्त्र, अनाज साफ करने के लिए सूप आदि, बांस तथा रिंगाल की टोकरी बनाने वाले, अनाज भण्डारण के लिये कोठार, काटने के लिए औजार, पर्वतीय शैली में भवन निर्माण, मूर्तिकला, काष्ठ से बनी सामग्री का निर्माण ,परम्परागत शैली में भवन निर्माण, मूर्तिकला, काष्ठ से बनी सामग्री का निर्माण, परम्परागत प्राकृतिक तथा आयुर्वेदिक चिकित्सा वैद्य, सांस्कृतिक कार्यों के निष्पादन के लिए संस्कृति कर्मी आदि अनेक क्षेत्रों में स्वरोजगार उपलब्ध था। परम्परा से जुड़े हुए लोगों के पास आज कोई काम नहीं है। ऐसी बदली हुई परिस्थितियों में ऐसे लोग पलायन करने को बाध्य हैं। गावं के परम्परागत कार्यों के समाप्त होने तथा नयी तकनीकी से आत्मसात न करने के कारण एक ओर जहां गांव जनविहीन होते जा रहे हैं तो दूसरी ओर आर्थिक ढांचा भी चरमरा गया है।
कागजों में सिमटती ग्राम विकास योजनायें
आज गांवों के विकास के लिए कितनी ही सुन्दर योजनायें क्यों न बना दी जायेंं परन्तु बिना भूमि सुधार किये उन्हें जमीन पर उतारना एक दिवास्वप्न जैसा ही है। इसीलिए उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में ग्राम विकास के लिये सरकार द्वारा संचालित अधिकांश योजनायें कागजों में सिमटकर रह गयी हैं। बीस सूत्रीय कार्यक्रम, एकीकृत ग्राम्य विकास कार्यक्रम, जलागम प्रबन्धन परियोजना, राष्ट्रीय बागवानी मिशन, जवाहर रोजगार योजना, सूखोन्मुखी क्षेत्र विकास कार्यक्रम, अम्बेडकर ग्राम, किसान रथ का भ्रमण, गांधी ग्राम, आदर्श ग्राम, अटल ग्राम, हरियाली योजना, आत्मा परियोजना, मनरेगा आदि अनेक ग्राम विकास कार्यक्रमों का लाभ जमीन पर दिखायी नहीं देता। जब तक पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी नहीं होती है तब तक ग्राम विकास की सारी योजनायें मात्र कागजों में ही सिमटती नजर आयेगीं। बिखरी जोतों के कारण वास्तविक हकदार लाभ से वंचित ही होंगे। कृषि व बागवानी को लेकर सरकार से सम्बन्धित संस्थान तथा गैर सरकारी संगठन, किसानों को कितना ही पाठ क्यों न पढ़ा लें बिना चकबन्दी के सुधार की कल्पना करना बेकार है।
घटता पशुपालन
पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक आधार रहा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन कृषि को पूर्णतः प्रदान करता है। जब से मानव ने खेती में पशुओं के उपयोग को जाना तब से पशुपालन और कृषि एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। आधुनिक दौर में भी सीमान्त और लघु किसान विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी बैलों से ही हल जोतने का कार्य कर रहे हैं। भूसी, खली, चरी तभी है जब खेत हैं। बकरी पालन, भेड़ पालन, दूध के लिए गाय पालन भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। भले ही आज तकनीकी में परिवर्तन आया है। तथा आज खेती में मशीनों का प्रयोग होने लगा है। जुताई, कटाई, मण्डाई और सिंचाई में मशीनों का प्रयोग होने लगा है। परन्तु यहां भी कृषि चकों की ही आवश्यकता है। पर्वतीय क्षेत्रों में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अभी मशीनों का सीमित ही प्रयोग होता है। यहां पर आज भी बैल ही जुताई के लिए कारगर हैं। इसके अलावा पशु गोबर की खाद भी खेती के लिए एक अनमोल पदार्थ है जिसका कोई विकल्प नहीं है। खाद के रूप में गोबर की महिमा सर्वगुण सम्पन्न जैसी है।
उत्तराखण्ड में एक समय पशुपालन की समृद्ध परम्परा रही है। पहले हर घर में गाय, भैंस पालने की परम्परा रही है उसके साथ-साथ बकरी पालन, भेड़ पालन भी अनेक परिवारों की आजीविका का साधन रहा है। दूध, घी तथा दूध से निर्मित दूसरे उत्पाद मिलने के अलावा गोबर की खाद और बैल का श्रम की सहायता मिलती थी। आज से पचास साल पूर्व घर की समृद्धि पशुधन से आंकी जाती थी। उत्तराखण्ड में बनने वाले घरों में पशुशाला का विशेष स्थान होता था। ग्रीष्मकाल में जब चारे की कमी होती थी तो पशुपालक पहाड़ों पर छनियों, खर्क, खेतों में गोठ तथा दूसरे चारागाहों में रहते थे, ताकि पशुओं को चारे की आसानी से पूर्ति हो सके। लेकिन बदलाव के दौर में खेती के साथ-साथ पशुपालन को भी तिलांजली ही दे दी है।
जोतों के बिखराव तथा चकबन्दी न होने के कारण खेती करना श्रमसाध्य और महंगा हो गया है। आज ग्रामीणों का झुकाव मनरेगा की मजदूरी की ओर चला गया है। इससे खेत बंजर होते जा रहे हैं। बंजर होते खेतों में न तो उत्पादन ही हो पायेगा न ही पशुओं के लिये चारा।
वन्य जन्तुओं का बढ़ता आतंक
उत्तराखण्ड में बंजर खेतों के कारण एक ओर नई समस्या पैदा हो गयी है यह समस्या मानव-वन्य जीव संघर्ष के रूप में सामने आयी है। वर्तमान में जिन खेतों पर खेती की जा रही है वहां पर जंगली जानवरों द्वारा खेतों को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है। कुछ ऐसे इलाकों में जहां से पलायन अधिक हुआ है वहां पर हिंसक पशुओं बाघ, भालू, गुलदार आदि के हमले अब आम बात हो गयी है। इन हमलों में अनेक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। उत्तराखण्ड जैसे शान्त वादियों में मानव-वन्य जीव संघर्ष बढ़ने का मुख्य कारण जंगलों का काटा जाना भी है। जिसके कारण जंगली पशुओं के स्थायी प्रवास नष्ट हो रहे हैं, वन्य क्षेत्रो में भोजन की कमी, जंगली जानवरों का अवैध शिकार, जंगलों में आग लगना भी है जो लोग वर्तमान समय में किसी तरह से बिखरी जोत पर खेती-बाड़ी का कार्य कर रहे हैं जंगली जानवरों द्वारा उनके खेत-खलिहानों को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है जिसके कारण उनके सामने आजीविका का संकट उत्पन्न हुआ है। ऐसे में रोजगार के लिये पलायन या मनरेगा की दिहाड़ी पर आश्रित रहना उनकी मजबूरी बनता जा रहा है। जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक से काश्तकारों की मेहनत, धन और समय तो बरबाद हो ही रहा है इसके साथ ही क्षेत्र में कृषि हतोत्साहित हो रही है।
स्वावलम्बन की घटती प्रवृत्ति
कई दशकों से उत्तराखण्ड का आर्थिक तंत्र सरकारी कर्मचारी के वेतन के बूते ही घूमता रहा है तथा यहां के समाज में जो भौतिक विकास दिखायी देता है दरअसल वह एक प्रकार से सरकारी खजाने पर आधारित विकास ही है। अंग्रेजी दौर से लेकर आज तक सरकारी कर्मचारी ने नई पीढ़ी को शिक्षा दिलाने में सबसे अधिक रूचि दिखायी है। लेकिन इस शिक्षा में निजी उद्यमशीलता का कोई पाठ न होने से सारा श्रम सरकारी नौकरी हासिल करने तक सीमित रहा है। इससे पहाड़ के लोगों में जो स्वावलम्बन का भाव था उसका हृस हुआ है। एक समय तक तो सरकारी नौकरियों की कमी नहीं थी, परन्तु आज पढ़े लिखे बेरोजगारों की बहुत बड़ी फौज खड़ी हो चुकी है। आज व्यवस्था को लेकर समाज में जो असन्तोष पनपा है उसके मूल में यही बेकारी है। अलग राज्य की मांग के मूल में भी असल में यही कारण छिपा था। औपनिवेशक दौर से लेकर वर्तमान तक पहाड़ की श्रम साध्य जनता को अपने पांवों पर खड़े होने के लिए कभी भी ठोस विकल्प नहीं दिये गये बल्कि उसे आश्रित करने के लिए मजबूर किया गया। परिस्थितियों ने समय के साथ यहां की अर्थव्यवस्था के स्वावलम्बन को निगल कर परतन्त्र की मनीआर्डरी अर्थव्यवस्था की ओर धकेलने पर मजबूर कर दिया। परालम्बन के वंशीभूत हुए आर्थिक व्यवस्था ने उत्तराखण्ड में स्वावलम्बन के अपेक्षित आर्थिक आधार को कभी पनपने ही नहीं दिया। राष्ट्रीय आवश्यकताओं के भार को ढोने वाले यहां के कन्धे कभी भी आर्थिक स्वतन्त्रता का स्वाद न चख सके। दशकों से यहां के जंगल देश की इमारतों से लेकर रेल तथा रेल की पटरियों हेतु लकड़ी उपलब्ध कराते रहे। लेकिन इसका कोई भी आर्थिक लाभ क्षेत्र के जनमानस को नसीब नहीं हो पाया। राज्य का 71 प्रतिशत भू-भाग वनीय है परन्तु जिस क्षेत्र को ग्रीन रॉयल्टी मिलनी चाहिए थे उस क्षेत्र के लोगों को वनों के अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया। यही नहीं बल्कि राज्य में अनेक पनबिजली योजनायें भी हैं जिसका सारा जोखिम राज्य के लोगों का है परन्तु विडम्बना देखऐ सारा जोखिम उठाने के बाद भी उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है। राज्य में लगभग 13 प्रतिश जमीन ही खेती योग्य है। इसमें भी अधिकांश आज भी असिंचित क्षेत्र है। बड़े बांधों और भूमि अधिग्रहण से यह क्षेत्र निरन्तर सिकुड रहा है परन्तु फिर भी यहां के स्थानीय जनमानस को आर्थिक अधिकारों से वंचित रखा गया है।
उत्तराखण्ड में जन के लिये वन का महत्ता सदैव रहा है। यही कारण है कि यहां सघन वनीय क्षेत्र है परन्तु यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आर्थिक दशाओं के लिए जल, जंगल और जमीन सदैव उत्तराखण्ड के केन्द्र में रहे हैं। वन संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण तथा पारिस्थितिकी तन्त्र के सन्तुलन की बड़ी कीमत उत्तराखण्ड का जनमानस चुका रह है फिर भी वह आज अपने आर्थिक अधिकारों से वंचित है। जिन कारणों से पहाड़ का अर्थतन्त्र ट्रेजरी पर आश्रित होता चला गया। निश्चित तौर पर धरातल पर उन्हें खोजा जा सकता है। वन जहां जीवन के इतने करीब हो वहां वन-जन का रिश्ता समझना कठिन नहीं है। जो भूमि चिपको आन्दोलन की भूमि रही हो उसी भूमि पर आज व्यथा का रोना रोया जा रहा है। इस मुद्दे पर पूर्व में कई व्यापक बहसें हो चुकी हैं तथा आगे भी होती रहेंगी परन्तु सरकारी नीतियों ने यहां के अर्थतन्त्र को पंगु बनाकर पराधीनता के लिए मजबूर किया है। इस सत्य को स्वीकार किया जाना चाहिए ।
उत्पादक से उपभोक्ता की ओर
पहाड़ का व्यक्ति पहले मूल रूप से उत्पादक था। उत्पादक होने के कारण उद्यमिता पहाड़ के रग-रग में बसी हुई थी। एक उद्यमी समाज में जब अपने सतत् विकास के लिए सरकारी नौकरी को विकल्प के रूप में चुना तो हम उत्पादक से उपभोक्ता की ओर बढ़ चले। उद्यमशीलता नष्ट होने तथा उपभोक्ता संस्कृति के पनपने के कारण हमारा आर्थिक आधार कितना कमजोर हो चुका है यह इस क्षेत्र को अलग राज्य बनने के बाद महसूस होने लगा। दशकों से जारी इस प्रक्रिया ने हमारी जो मानसिकता तैयार की है, वह आज निश्चित ही चौराहे पर खड़ी होकर ठिठकी सी लगती है। इस दौर में पहाड़ों ने जो कुछ खोया है और सिर्फ एक बिन्दु पलायन पर चिन्ता जताते हुए अन्य सरोकारों के प्रति जो निरापदता दिखायी है उसके कारण आज तक भी हमारे गांवों में स्वरोजगार के लिये माहौल तैयार ही नहीं हो पाया है। माना कि यहां पर सिंचित और उपजाऊ जमीन की भारी कमी है। परन्तु खेती की चकबन्दी न करने की चिन्ता पर सरकारी हुक्मरानों के कुछ भी नहीं किया बल्कि चकबन्दी के सीधे-साधे मुद्दे को उलझाने का प्रयास ही किया है। सरकारी हुक्मरानों ने चकबन्दी के मुद्दे पर अभी तक कभी भी गम्भीरता से चिन्तन नहीं किया। चकबन्दी के अभाव में बागवानी तथा पशुपालन जैसे रोजगारपरक क्षेत्रों में उत्तराखण्उ में शून्य ही उभर कर आया है। गहरी चिन्ता इस बात को लेकर भी है कि यहां के परम्परागत लघु एवं कुटीर उद्योगों को जिनका आधुनिकीकरण करके नये सिरे से स्थापित किया जा सकता है एक पीढ़ी पर ऐसा काला पर्दा पड़ चुका है कि शायद अगली पीढ़ी को भी इससे उबरने में वक्त लग सकता है। उपभोक्ता से पुनः उत्पादक बनने के लिए हमें मानसिकता में बदलाव लाने की आवश्यकता है। मानसिक रूप से बदलाव लाना इतना आसान भी नहीं इसके लिये पीढ़ियों का इन्तजार करना पड़ेगा । शायद आने वाली पीढ़ियां उत्पादक के महत्व को समझते हुए पुनः उस राह पर लौट जाएं जहां से हमने विचलन किया था।
सरकारी नीतियों का साया
सन् 1815 में सिंगोली की संधि के उपरान्त ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने यहां पर पांव फैलाने शुरू किये। इससे पहले यहां जंगलों पर कोई प्रशासनिक नियंत्रण नहीं था। स्थानीय लोग इन जंगलों पर अपना पैदायशी हक मानते थे। जंगल सांस्कृतिक तथा सामाजिक रूप से हमारे जीवन का हिस्सा थे। इन्हीं जंगलों में आक्रान्ताओं के खिलाफ मोर्चा बन्दी अथवा छिपने-बचने के ठिकाने, चारापत्ती घास लकड़ी, कन्दमूल फल आदि प्राप्त होते थे। आर्थिक व्यापारिक उपभोग की तो तब न यहां के शासकों ने कल्पना की और न ही स्थानीय जनमानस ने इसके बारे में कभी सोचा । राजशाही द्वारा ग्रामीणों को अधिक से अधिक खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। तब जमीन कम से कम एक पीढ़ी तक लगान मुक्त रहती थी। उन स्थानों पर जंगलों में अन्दर तक खेती करने का प्रचलन था जहां की जमीन उपजाऊ थी।
अंग्रेजों ने सबसे पहले भूमि बन्दोबस्त कर यहां की समस्त सार्वजनिक भूमि को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया। वनीय भूमि को सुरक्षित वन भूमि घोषित कर कलेक्टर के अधीन कर दिया। इस पहाड़ी क्षेत्र को अपने अधिकार में लेने के पीछे उनका असली लक्ष्य चीन से व्यापार को आसान बनाने तथा यहां के जंगलों के व्यापारिक दोहन का था। सन 1911 में वन बन्दोबस्त करते हुए नाप भूमि को छोड़कर सारी जमीन सुरक्षित वन क्षेत्र बना दी गयी। इस तरह से जंगलों से यहां के आमजनमानस को वनों से बेदखल कर दिया गया। जंगलों से अधिकार छिन जाने के कारण जंगलों में मीलों तक फैली खेती और उससे जुड़ा हुआ श्रम का जो पारम्परिक स्व-विधान यहां का आधार था। रोक के कारण यहा ंपर ना सिर्फ श्रम का स्व-विधान टूटा बल्कि यहां की उद्यमशीलता को भी बड़ा झटका लगा।
वनों पर अधिकार खोने के बाद यहां की उद्यमशीलता कब चाकरी में परिवर्तित हो गयी पता ही नहीं चला।
19वीं सदी के मध्य में पहाड़ के किसान को भू-स्वामित्व का हक तो मिला किन्तु उसके एवज में उसे बहुत बड़ी कीमती जंगलों पर अपना पैदायशी अधिकार खोकर चुकानी पड़ी। तब भू-स्विमत्व के साथ-साथ खेती के बंटवारे का प्रचलन भी शुरू हो चुका था। भूमि बंटवारे के इस प्रचलन ने पलायन को जन्म दिया। जंगलों पर आश्रित आजीविका पर सरकारी नियन्त्रण का सीधा प्रभाव यह हुआ कि खेती और काम का बोझ बढ़ गया। जंगलों के आश्रित होने तथा उसके बदले में कोई वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण आर्थिक सरोकारों के लिए सरकारी नौकरी पाने का मोहताज होना पड़ा । यहां की उद्यमशीलता का उपयोग अंग्रेज सरकार सेना में करना चाहती थी तथा इन्होंने बड़ी तादाद में यहां के लोगों को सेना में भर्ती किया। उद्यमशीलता के कारण यहां के पुरूष असाधारण वीरता के लिए जाने जाते थे। दो-दो विश्व युद्धों में यहां के उद्यमशील किसान और कारोबारी वीर लड़े। लेकिन ब्रिटिश सरकार की जीत का आधार बनी यहां की उद्यमशीलता का आर्थिक आधार कमजोर होकर मनीआर्डरी अर्थव्यवस्था पर आश्रित हो गया। परिस्थितियों ने ब्रिटिश शासनकाल में जो राह दिखायी थी उससे आज भी यह राज्य मुक्त नहीं हो पाया है।
पलायन के दुष्परिणाम
इस पर्वतीय भू-भाग में पलायन के अनेक दुष्परिणाम देखे गये हैं जिसमें मुख्य निम्नलिखित हैं-
भूमि हृस
समय पर चकबन्दी न होने के कारण भूमि का हृस हो रहा है सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य के पर्वतीय क्षेत्र में मात्र 7 प्रतिशत हिस्से पर ही कृषि कार्य सम्पादित हो रहा है लेकिन बची-खुची शेष जमीन का भी निरन्तर हृस हो रहा है। एक ओर बढ़ते पलायन के कारण कृषि भूमि के बंजर होने के कारण वह भूमि अनुपयोगी होती जा रही है तथा कुछ बंजर भूमि पर जंगल उगने लगे हैं। जंगल से सटे हुए कई स्थानों पर कृषि भूमि वनीय भूमि में बदल चुकी है। अनेक स्थानों पर विकास के नाम पर कृषि भूमि को बरबाद किया जा रहा है। पलायन के कारण नगर क्षेत्र के पहाड़ी कस्बों में जनसंख्या का दबाव बढ़ता जा रहा है। वहां पर अवस्थापन, विकास के नाम पर गैर कृषि कार्यों के लिए कृषि योग्य भूमि का उपयोग किया जा रहा है। खासकर भाबर तराई की उपजाऊ जमीन को समाप्त कर बस्तियां बसाने का कार्य किया जा रहा है। अनेक पहाड़ी नगरों के आस-पास की उपजाऊ जमीन को भी नष्ट किया जा रहा है। जैसे उदाहरण के तौर पर गौचर, उत्तरकाशी, बागेश्वर , पिथौरागढ़, चम्पावत, द्वाराहाट, बागेश्वर, श्रीनगर, गरूड़ आदि अनेक स्थानों पर देखा जा सकता है कि सड़क, बांध परियोजनाओं, बसावट तथा दूसरे गैर कृषि कार्यों के लिए कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है।
राज्य सरकार की मिली भगत से कई प्रभावशाली लोगों तथा दबंग कम्पनियों के द्वारा कृषि योग्य भूमि को बर्बाद किया जा रहा है। यही नहीं बांध सड़क योजनाओं का मलबा डंपिंग जोन में न डालकर खेतों में डाला जा रहा है। अक्सर ऐसे कार्यों में सत्ता से जुड़े प्रभावशाली लोगों के कारण स्थानीय जनां की आवाज को दबा दिया जाता है। हालांकि पर्यावरणीय प्रभावों को दृष्टिगत रखते हुए ही निर्माण कार्य होने चाहिए परन्तु अक्सर निर्माण कार्यों में पर्यावरणीय प्रभावों को अनदेखा कर दिया जाता है जिसके कारण न सिर्फ कृषि योग्य भूमि बर्बाद होती थी बल्कि पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बढ़ते निर्माण कार्यों से राज्य के जल-जंगल-जमीन तथा जैव विविधता पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।
संयुक्त परिवारों का विखण्डन
अस्सी के दशक तक पर्वतीय क्षेत्रों में संयुक्त परिवार प्रणाली थे, परन्तु 1990 के बाद उसमें तेजी से विखण्डन देखा गया। खेती एवं पशुपालन खेती एवं पशुपालन आजीविका का मुख्य स्रोत न होने के कारण संयुक्त परिवार में रहना उस दौर में पारिवारिक मजबूरी भी थी और आवश्यकता भी । खेत के काम में जितने ज्यादा हाथ होते थे उतना ज्यादा काम होता था। संयुक्त परिवार में किसका कार्य क्या होगा यह लगभग परम्परागत ढंग से बंटा होता था। लेकिन जब खेती से आजीविका नौकरी की तरफ स्थानान्तरित होने लगी तो संयुक्त परिवार टूटने लगे। इस पारिवारिक टूटन ने समाज में अलगाव को जन्म दिया जो कि एक सामाजिक बुराई के रूप में प्रदर्शित होने लगी। नौकरी में कम जोखिम होने के कारण आदमी को नौकरी करना अधिक रास आने लगा। एक बार जो नौकरी करने गया उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एकल परिवार की ओर आकर्षित होता गया।
मौसम की मार श्रम पर भारी
पहाड़ में खेती से जुड़े कामों में आजीविका चलाने के लिए अधिक श्रम की आवश्यकता होती है। चकबन्दी न होने के कारण जोतें बिखरी हुई हैं। इस कारण एक जहां व्यक्ति का समय नष्ट होता है वहीं दूसरी ओर वह योजनागत ढंग से कृषि नहीं कर पाता है। समय, श्रम और धन की बरबादी के चलते पहाड़ का व्यक्ति से विमुख होकर पलायन कर जाता है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन की मार भी पड़ती है। जब वर्षा चाहिए तब वर्षा नहीं होती तथा जब वर्षा नहीं चाहिये तब वर्षा खूब होती है।
मौसम के इस बदले हुए मिजाज के कारण पहाड़ की खेती सर्वाधिक प्रभावित हुई है। गांवों में खेती और पशुपालन ही आय के प्रमुख स्रोत हैं परन्तु जब खेती नहीं नहीं होगी तो पशुपालन स्वतः ही छोड़ना पड़ेगा। इसी विडम्बना के कारण पहाड़ का व्यक्ति पलायन के लिए मजबूर है। भूमि सुधार किये बिना इस प्रवृत्ति में बदलाव लाना सम्भव नहीं है।
समाप्त होती शिल्पकला एवं शिल्पी
किसी क्षेत्र के विकास के पैमाने के तौर पर शिल्पकला का महत्वपूर्ण स्थान है। जिस क्षेत्र की शिल्पकला जितनी परिस्कृत होगी वह क्षेत्र उतना ही विकसित माना जाता है। शिल्पकला को निखारने के कुशल शिल्पियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं उत्तराखण्ड में प्राचीन काल से ही शिल्पकला की समृद्ध परम्परा रही है। पलायन, बाजारवाद और वैश्विकरण के बढ़ते प्रभाव के कारण प्रभावित यहां की शिल्पकला संरक्षण के अभाव में दम तोड़ती नजर आ रही है। वर्तमान समय में उत्तराखण्ड की परम्परागत शिल्पकला तथा उसे जुड़े हुए शिल्पकला हस्त शिल्पकार लगभग विलुप्त होने के कगार पर हैं।
प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के विकास का आधार वहां की शिल्पकला ही मानी जाती थी। स्थानीय लोकजीवन के रंग में रंगी लोकमनभावन शिल्पकला ने न सिर्फ जीवन जीने के मार्ग सुगम किये बल्कि लोक जीवन का एक सार्थक और महत्वपूर्ण भाग भी बन गया।
आधुनिक तकनीकी से तैयार आयातित सामान ने पहाड़ की शिल्पकला को न सिर्फ मिटाने का कार्य किया है बल्कि यहां के कुशल शिल्पियों के सामने रोजी-रोटी का संकट भी खड़ा किया है। आधुनिक तकनीकी से तैयार आयातित सामान भले ही कुछ सस्ता हो सकता है परन्तु क्या ऐसे सामान लोकजीवन के रंग भरने के लिए अपनापन व आत्मीयता का आभास सम्भव है ? एक समय कठोर परिश्रम से निर्मित स्थानीय शिल्पियों द्वारा तैयार सामान न सिर्फ अपनापन व आत्मीयता का एहसास कराता था बल्कि शिल्पकला की दृष्टि से भी उत्कृष्ट नमूना होता था।
लुप्त होती भवन कला एवं काष्ठ कला
इस पर्वतीय क्षेत्र को अनेक संघर्षों से गुजरना पड़ा है जिसके कारण यहां की शिल्पकला भी प्रभावित हुई है। गढ़पतियों और उसके बाद राजशाही के उत्थान और पतन के साथ ही यहां की शिल्पकला का इतिहास छिपा है। राजशाही के समय यहां की शिल्पकला तथा कुशल शिल्पियों का राजाश्रय प्राप्त था जिसके कारण उस समय यहां की शिल्पकला अपने चरम पर थी। गोरखाओं के आक्रमण के बाद यहां की शिल्पकला को भारी हानि हुई। गढ़वाल की राजधानी चांदपुर गढ़ी तथा अनेक स्थानों पर शिल्पकला की अद्भुत नमूनों को देखकर आसानी से प्रमाणित किया जा सकता है कि उस काल में पहाड़ की प्रस्तर शिल्पकला कितना उन्नत किस्म की रही होगी। अपने इसी शिल्पकला हुनर के बलबूते उस समय समाज को शिल्पियों को बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।
भवन निर्माण की पहाड़ी शैली का बेजोड़ कला, मंदिर निर्माण कला, मूर्ति कला, काष्ठ कला, धातु, आभूषण, परिधान शिल्प से साथ रिंगाल और बांस से निर्मित वस्तुआेंं की माफी मांग थी।
उत्तराखण्ड की तत्कालीन गृह निर्माण कला बहुत उन्नत और बेजोड़ थी। उत्तराखण्ड की देश का ऐसा क्षेत्र था जहां का गृह निर्माण शिल्प अत्यन्त विकसित था। इस क्षेत्र में आज भी पुराने भवनों में दरवाजे, खिड़िकियों, चौखट, महराब, खम्भों, ब्रकेट्स पर की गयी नक्कासी से लेकर तिवारी ,खोली और नीमदारी तक भवन निर्माण में प्रयुक्त काष्ठ शिल्प पर देवी-देवताओं, मानवाकृतियों, सजावटी बेल-बूटे, पशु-पक्षी, और पेड़-पौधों को सुन्दर ढंग से किया गया चित्रण देखा जा सकता है।
खांटी जौनसार-भाबर सहित कुछ क्षेत्रों में आज भी कुछ गिने-चुने शिल्पहस्त कारीगरों द्वारा लकड़ियों से शानदार मकान तैयार किये जा रहे हैं। भवन निर्माण के साथ ही काष्ठ कला का यह बेजोड़ संगम अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। निःसन्देह उत्तराखण्ड की शिल्पहस्त कला बहुत ही परिष्कृत थी। परंतु संरक्षण के अभाव में आज दम तोड़ती नजर आ रही है।
राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड की भवन निर्माण कला को बचाने की आवश्यकता थी। परन्तु सत्ता प्रतिष्ठानों में मचे घमासान ने उसे भुला दिया। बढ़ते पलायन के कारण यहां भी भवन निर्माण कला के शिल्पहस्त राजमिस्त्री गिने-चुने ही बचे हुए हैं। किसी समय इन्हीं राजमिस्त्रियों ने पहाड़ की विशिष्ट भवन निर्माण शैली को उत्कृष्टता प्रदान की थी। वर्तमान समय में देखा-देखी में पत्थरों का पठाल या स्लैट का स्थान ईंट-गारा, सीमेन्ट सरिया ने ले लिया है। जो सीमित अवधि बाद ध्वस्त हो जाते हैं या उसका क्षरण हो जाता है। जबकि सालों पूर्व पहाड़ के शिल्पियों द्वारा तरासे गये पत्थरों से निर्मित भवन आज भी शान से खड़े हैं। अंग्रेजों के समय भी अनेक स्थानो ंपर पहाड़ के राजमिस्त्रियों ने भव्य व बेहतरीन बंगलों का निर्माण किया परन्तु आज यह कला समाप्ति की ओर अग्रसर है।
लुप्त होता मूर्ति और प्रस्तर शिल्प
शताब्दियों पूर्व पहाड़ की मन्दिर व मूर्ति शिल्पकला अपने परम वैभव पर था। इस राज्य में मन्दिरों की अधिकता तथा भव्यता के कारण ही इस राज्य को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। आठवीं से लेकर चौदहवीं विक्रमी सदी तक का काल पहाड़ में मन्दिर वास्तु शिल्प का उत्कृष्ट काल कहा जाता है। गोपेश्वर, लाखामण्डल, पैठाणी, बैजनाथ, जागेश्वर, राजराजेश्वरी, देवप्रयाग का रघुनाथ मंदिर, कोशी कटारमल के सूर्य मन्दिर आदि मन्दिर शैलियों में विभिन्न कालखण्डों में निर्मित हुए हैं। उत्तराखण्ड में मूर्ति कला से सम्बन्धित यह प्राचीन शिल्प अब लगभग प्रचलन से बाहर हो चुका है। शायद ही आज पहाड़ में इस शिल्पकला को जानने वाला कोई शिल्पी मौजूद है। प्रस्तर शिल्प में जल स्रोतों के धारों पर की गयी नक्काशी, घराट, जन्दरा, सिलबट्टा, खोली, मोरी, पन्देरा धारा, बावड़ी, छज्जा आदि अनेक वस्तुओं पर बेहतरी नक्काशी की जाती थी। इसके अलावा मकानों की छत पर लगने वाली पठाल या स्लेट आज धीरे-धीरे अनुपयोगी हो चुकी है। इस प्रकार की शिल्पकला के प्रचलन से बाहर होने के कारण शिल्पियों ने पलायन किया या आजीविका के दूसरे साधन ढूंढ लिये जिसके कारण यह कला भी अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही है।
लुप्तप्रायः हुआ धातु शिल्प उद्योग
उत्तराखण्ड में प्राचीन काल से ही धातु शिल्प उद्योग का भी महत्व रहा है। विभिन्न धातुओं के शिल्पियों को पहाड़ में विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे लोहे का काम करने वाला लोहार, सोने-चांदी का कार्य करने वाला सुनार, तांबा और कांस्य का काम करने वाला टम्टा कहा जाता था। पहाड़ में इन विभिन्न धातुओं के शिल्पियों को यथोचित सम्मान प्राप्त था। खेती के औजारों से लेकर युद्ध और आखेट के लिए हथियार बनाने में ये शिल्पी सिद्धहस्त थे। विभिन्न वाद्ययन्त्रों का निर्माण भी यही शिल्पी करते थे। प्राचीन राजाओं और गढ़पतियों द्वारा इन शिल्पियों को आश्रय प्रदान किया जाता था। बदलते समय में उत्तराखण्ड के धातु शिल्प उद्योग का भी भारी हृस हुआ है।
घटते वाद्ययन्त्रों के जानकार
उत्तराखण्ड में पहले परम्परागत वाद्य यन्त्रों के सिद्धहस्त जानकार थे परन्तु पलायन की मार के कारण इनकी संख्या भी निरन्तर घट रही है। ढोल बजाने वाले पहले ढोल सागर में प्रवीण तथा सिद्धहस्त होते थे। परन्तु आज कुछ गिने चुने ही ढोल सागर के ज्ञाता बचे हैं । परम्परागत वाद्ययन्त्रों तथा उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक पहचान ढोल सागर को आज संरक्षित एवं संवर्द्धन की आवश्यकता है।
सिमटता वस्त्र शिल्प उद्योग
आभूषण और परिधान शिल्प में भी पहाड़ के पुराने शिल्पी सिद्धहस्त थे। भौगोलिक परिस्थितियो ंके अनुसार यहां पर ऊनी वस्त्रों को अधिक महत्व दिया जाता था। ऊनी वस्त्रों के लिए कच्चा माल ऊन यहां पर परम्परागत भेड़ पालन व्यवसाय के कारण आसानी से उपलब्ध थी। त्यूंखा, मिरजई, फतूगी, अगड़ी, लवा, कम्बल, टोपी आदि यहां के परम्परागत पहनावा था। ऊनी कालीन और दरी बनाने में भी यहां के कारीगर निपुण थे। आधुनिक परिवेश में रंगने के कारण आज यहां पर इन परिधानों का प्रचलन लगभग समाप्त हो चुका है। कालीन, गलीचे, ऊनी कम्बल, चुटके, थुलमें जैसे हस्तशिल्प की परम्परा तिब्बत की सीमा से लगे क्षेत्रों में अधिक होता था, परन्तु वर्तमान परिवेश में यह उद्योग भी सिमटता जा रहा है।
सिमटता स्थानीय आभूषण शिल्प
पहले उत्तराखण्ड में सोने और चांदी के आभूषणों में नक्कासी का कार्य खूब प्रचलित था। परन्तु अब यह स्थानीय आभूषण शिल्प भी सिमटता जा रहा है। सोने के आभूषणों में नथ, बुलॉक, फूली, गोरण, बाली और मुरखला का प्रचलन अधिक था बाद में गुलबन्द और विसार तथा मांगटीका का प्रचलन भी बढ़ा। चांदी के गहनों में लच्छा, छिंवरा, पोंटा, मुरबुला, कर्णफूल, शीषफूल, करधनी, स्यूड़ा, चूड़ी, पौंछी, कड़ा, थगुला, हंसला, थगुली, हंसली, छुपकी, कटेला, चन्द्रहार, चांदी के रूपयों की माला आदि आज लगभग पुरानी धरोहर की चीजें रह गयी हैं। स्थानीय स्वर्ण तथा चांदी के आभूषणों की नक्काशी करने वाले शिल्पी आज लगभग नगण्य हो चुके हैं। आज यहां के बाजारों में जो स्वर्ण तथा चांदी के आभूषण उपलब्ध हैं वे रेडीमेड ही हैं। शिल्पहस्त शिल्पियों की कमी के कारण हमारी प्राचीन आभूषण शिल्पकला की समृद्ध परम्परा आज अन्तिम सांसे गिन रही है।
अस्तित्व खोता रिंगाल एवं बांस शिल्प उद्योग
रिंगाल एवं बांस से बनी वस्तुओं का पहाड़ के लोकजीवन में अपना विशिष्ट महत्व रहा है। रिंगाल से जुड़े शिल्प का विशेष ज्ञान एक जाति विशेष के लोग जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘रूड्या’ कहते थे। रूड्या जाति के लोग रिंगाल शिल्पहस्त कला में माहिर होते थे। पहले रूड्या जाति के लोग पहाड़ के अधिकांश गांवों मेंं मिल जाते थै। ये रिंगाल शिल्पी रिंगाल से कंडिया, सूप, टोकरियां, बड़े टोकरे, चटाई, अनाज रखने के लिए बड़े-छोटे कुन्ने आदि बनाते थे।
बढ़ते प्लास्टिक प्रचलन तथा मशीनीकरण ने रिंगाल से बनी इन कलात्मक वस्तुओं के शिल्प का सीमित कर दिया है। जीविकोपार्जन के लिए मुश्किल दौर का सामना करने के कारण आज यह शिल्प भी दम तोड़ता जा रहा है। अब बहुत सीमित क्षेत्रों में रूड़या लोग रिंगाल पर कार्य कर रहे हैं । चमोली जिले के पीपलकोटी तथा जोशीमठ के बीच रूड्या लोग आज भी रिंगाल का व्यवसाय करते हैं। बागेश्वर एवं पिथौरागढ़ जिलों में बांस व रिंगाल के शिल्पी आज भी कार्यरत हैं, परन्तु सीमित बिक्री होने के कारण इस परम्परागत उद्योग पर अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं। कभी रिंगाल से बनी वस्तुऐं डोके डालिया, टोकरियां, सूप आदि आमजन के जीवन में रची-बसी रोजमर्रा की अनिवार्य वस्तु होने के कारण यह विधा स्थानीय उद्योग के रूप में विकसित हुयी थी। कभी कुमैयां अदेले (लोहे की कढ़ाई) लोहाघाट का प्रमुख उद्योग था। प्रमुख उद्योग होने के कारण ही इस क्षेत्र का नाम लोहाघाट पड़ा था। इस पर्वतीय प्रदेश के अधिकांश लघु एवं कुटीर उद्योग या तो पूर्ण रूप से बन्द हो चुके या बन्द होने की कगार में खड़े हैं। मात्र कुछ स्थानीय उद्योग ही गांव-देहात में किसी प्रकार अपने को बचाये हुये हैं।
मनन का समय
यदि इस क्षेत्र में समय रहते भूमि सुधार हुआ होता तो शायद पलायन की इतनी बड़ी मार इस राज्य में नहीं पड़ती। यदि गांव आबाद होते तो निश्चित रूप से यहां के परम्परागत लघु एवं कुटीर उद्योग भी जीवित रहते। लघु एवं कुटीर उद्योगों से हजारों हाथों को काम मिलता तथा स्थानीय आर्थिकी भी निश्चित रूप से मजबूत होती। राज्य की मनी आर्डरी आर्थिक संस्कृति के बजाय आर्थिकी का सशक्त आधार तैयार होता तो यह राज्य आर्थिक रूप से समृद्ध होता। बढ़ती बेरोजगारी की फौज, घटते आर्थिक संसाधन, बंजर होते खेत, खण्डहर होते गांव आज यही सोचने पर विवश कर रहे हैं कि राज्य की नीतियों पर फिर से मनन करने की आवश्यकता है। आज पुनः इस बात पर मनन करने की आवश्यकता महसूस हो रही है कहां पर चूक हुई है। यदि वास्तव में इस राज्य को आर्थिक रूप से समृद्ध करना है तो अनिवार्य चकबन्दी ही एकमात्र विकल्प है। बिना चकबन्दी किए राज्य की समृद्धि की कल्पना करना बेकार है।
चकबन्दी में समाया है समृद्धि का मूलमन्त्र
उत्तराखण्ड में भूमि बन्दोबस्त
ब्रिटिश काल से पूर्व राज्य में जो भी भूमि बन्दोबस्त किये गये थे वे सभी मनुस्मृति पर आधारित थे। अंग्रेजों से पूर्व 1812 में भी इस क्षेत्र में गोरखाओं ने भी सीमित क्षेत्र में भूमि बन्दोबस्त करवाया था परन्तु ब्रिटिश सरकार के आने से पूर्व भूमि का कोई लिखित दस्तावेज नहीं हुआ करता था। किसके पास कितनी जमीन है यह जानने के लिए अंग्रेज शासकों ने अपने शासनकाल में भूमि बन्दोबस्त की पहल की। भूमि बन्दोबस्त का उद्देश्य प्रत्येक परिवार के पास कितनी भूमि है इसका पता लगाना तथा
अंग्रेजी शासनकाल में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि, उन्होंने यहां के ग्रामीण समाज में मौजूद सामंती भूमि प्रथा को बिना छेड़छाड़ किये ही भूमि बन्दोबस्त किया।
प्रथम भूमि बन्दोबस्त की शुरूआत अंग्रेज शासक ई0 गार्डनर के निर्देशन में 1815-16 में हुई। इसके बाद कमिश्नर ट्रेल ने 1817 में दूसरा, 1818 में तीसरा, तथा 1820 में चौथा भूमि बन्दोबस्त करवाया। सन 1823 में पांचवां भूमि बन्दोबस्त हुआ जिसे अस्सी साला बन्दोबस्त के नाम से जाना जाता है। आज भी दो गांवों में भूमि सम्बन्धी विवाद होने पर अस्सी साला भूमि बन्दोबस्त की मदद ली जाती है। 1829 में क्षेत्र में छटवां भूमि बन्दोबस्त हुआ। 1830-31 में प्राकृतिक आपदा से हुए भू-कटाव के कारण जनता की मांग पर कमिश्नर ट्रेल द्वारा सातवां भूमि बन्दोबस्त कराया गया। कमिश्नर बेटन ने सन 1842 एवं 1846 के बीच नवां बन्दोबस्त कराया। इस भूमि बन्दोबस्त को चकनामें के नाम से भी जाता है। इस बन्दोबस्त में आसामीवाद, फांट बनी और हिस्सेदारी और खायकारी कुमाऊं का पहला वैज्ञानिक भूमि बन्दोबस्त सन् 1863 से 1873 के बीच जी.के.विकेट द्वारा करवाया गया। यह दसवां भूमि बन्दोबस्त था। इस बन्दोबस्त द्वारा प्रत्येक गांव के नक्शे, खसरे, पर्चे बनाये गये। जमीन को तलाऊ, अव्वल, दोयम, इजरान और कटील जैसे श्रेणियों में बांटा गया। इसके अलावा ऐसे भूमि को भी नपवाया गया जो भूमि खेती किसानी के योग्य हो सकती थी। ऐसी भूमि को बेपढ़त भूमि कहा गया जाता था। यह बन्देबस्त विकेट बन्दोबस्त के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
कमिश्नर गूज द्वारा 1899-1902 के बीच ग्यारहवां भूमि बन्दोबस्त करवाया गया। कुमांऊ क्षेत्र में 1928 में तथा गढ़वाल क्षेत्र में अंग्रेज अधिकारी ईबटसन के द्वारा 1934 में भूमि बन्दोबस्त करवाया गया। टिहरी रियासत में भी ब्रिटिश शासन व्यवस्था की तर्ज पर भूमि बन्दोबस्त हुए। आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन कानून बना तथा उसके साथ ही नया भूमि बन्दोबस्त करवाया गया। आजादी के बाद 1958 से 1964 तक भूमि बन्दोबस्त करवाया गया था हालांकि इस भूमि बन्दोबस्त में पुरानी बन्दोबस्त की नकल से अधिक कुछ नहीं हो पाया। मूलभूत परिवर्तन से वंछित इस भूमि बन्दोबस्त में पक्के खामकारों सिरतानों को भूमि अधिकार दिये गये तथा ब्रिटिश राज में चली आ रही पुरानी प्रथा मालगुजार, थोकदार,पदान जैसी व्यवस्थाओं को समाप्त कर दिया गया। लेकिन इस बन्दोबस्त में पहाड़ में प्रचलित गोल खाता व्यवस्था को समाप्त नहीं किया गया।
आज भी पहाड़ में प्रत्येक खातेदार अपनी भूमि का स्वतंत्र खातेदार न होकर संयुक्त रूप से हिस्सेदार है। इसके अतिरिक्त किसानों और ग्रामीणों द्वारा उपयोग में लायी जा रही सार्वजनिक भूमि जैसे चारे पत्ती के लिए उपयोग की जा रही भूमि, चरगाह, पनघट, ईंधन तथा लघु वन उत्पाद सहित अन्य उपयोग की भूमि सारी भूमि को राज्य सरकार के अधीन कर दिया गया। उस समय अगली भूमि बन्दोबस्त की सीमा 40 वर्ष के लिए निर्धारित की गयी थी। 1964 के बाद 2004 में भूमि बन्दोबस्त किया जाना था परन्तु निर्णय लिया गया कि चकबन्दी भूमि बन्दोबस्त से अधिक महत्वपर्णू है अतः बन्दोबस्त के बाजार भू-चकबन्दी की जायेगी। उत्तराखण्ड राज्य गठन से ठीक पूर्व राज्य में कुल सक्रिय जोतें 9.26 लाख एकड़ थी जो कि राज्य गठन के बाद 3.6 प्रतिशत घटकर 8.91 लाख एकड़ रह गयी है। यह गिरावट अभी भी निरन्तर जारी है।
भूमि बन्दोबस्त एवं चकबन्दी
भूमि बन्दोबस्त तथा चकबन्दी में कुछ समानतायें हैं परन्तु बेहतर भू-प्रबन्धन की दृष्टि से चकबन्दी को बन्दोबस्त से श्रेष्ठ माना जाता है।
बन्दोबस्त एवं चकबन्दी में समानतायें एवं अन्तर
समानतायें
बन्दोबस्त चकबन्दी
1- भूमि बन्दोबस्त में भूमि की नापतौल चकबन्दी में भी भूमि की नापतौल होती है।
की जाती है।
2- शजरे नक्शे की दुरस्ती की जाती है। चकबंदी में भी यही प्रक्रिया अपनायी जाती है।
3- सामान्य वादों और विवादों का भूमि सम्बन्धी सामान्य वादों और विवादों के निस्तारण के लिए
निस्तारण किया जाता है जैसे मृतक का चकबन्दी में भी यही प्रक्रिया अपनायी जाती है।
बयनामें का दाखिला खारिज आदि
4- बन्दोबस्त में भू-अभिलेखों का नवीनीकरण चकबन्दी में भी भू-अभिलेखों का नवीनीकरण करते हुए भूमि का नया नक्शा
कर नया भूमि का नक्शा तैयार किया जाता है। तैयार किया जाता है।
5- बन्दोबस्त में भू-स्वामियों का स्पष्ट चकबन्दी में भी भू-स्वामियों का स्पष्ट उल्लेख के साथ-साथ खसरा-खतौनी,
उल्लेख के साथ खसरा-खतौनी खेत नंबर खेत नम्बर आदि दुरस्त करते हुए शजरे (नक्शा) का दुरस्ती का काम किया
आदि दुरस्त करते हुए शजरे (नक्शे) जाता है।
का दुरस्ती का काम किया जाता है।
असमानतायें-
1- भूमि बन्दोबस्त में खसरा-खतौनी, चकबन्दी में बन्दोबस्त के अतिरिक्त अन्य कई महत्वपूर्ण कार्य भी सम्पन्न किये
खेत नम्बर तथा शजरे के दुरस्ती के जाते हैं। जो कि बन्दोबस्त में नहीं होते हैं।
वाद प्रक्रिया को पूर्ण माना जाता है।
2- भूमि बन्दोबस्त सरकार द्वारा नियुक्त चकबन्दी में समस्त कार्य गांव के कृषकों
अधिकारी करते हैं द्वारा चयनित चकबन्दी समिति के परामर्श
से सहायक चकबन्दी अधिकारी करते हैं।
3- भूमि बन्दोबस्त का समय चकबन्दी एक नियोजित और समयबद्ध कार्यक्रम है। निर्धारित नहीं होता।
4-भूमि बन्दोबस्त में भूमि सम्बन्धी
त्रुटियां, अशुद्धियों तथा विवादो चकबन्दी में भूमि सम्बन्धी समस्त त्रुटियां, अशुद्धियों तथा विवादो विवादों को पूर्ण रूप से गुंजाइश रहती है। पूर्णरूपेण निस्तारण किया जाता है।
5- भूमि बन्दोबस्त में अदालतों में विचाराधीन मामलों जब किसी गांव में चकबन्दी प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है तो भूमि सम्बन्धी विचार नहीं किया जाता है। कोई भी विवाद चाहे वह उच्च न्यायालय में ही क्यों न हो
स्थगित हो जाता है। पुनः वह वाद चकबन्दी अदालत में चलाया जाता है। जिसका अन्तिम निर्णय चकबन्दी अदालत में किया
जाता है तथा इस निर्णय को अन्य अदालतों में चुनौती नहीं दी जा
सकती है।
5- भूमि बन्दोबस्त के बाद भी भूमि चकबन्दी प्रक्रिया के दौरान यदि भूमि
सम्बन्धी वाद-विवाद जारी रह सकते हैं। सम्बन्धी कोई विवाद नहीं उठाया जाता है
तो भविष्य में भी विवाद को नहीं उठाया जा सकता है। अतः चकबन्दी के बाद भूमि सम्बन्धी कोई भी वाद-विवाद शेष नहीं रह
जाता है।
6- भूमि बन्दोबस्त में एक ही खातेदार का चकबन्दी में एक खातेदार का नाम समस्त ग्राम में एक ही खाते
नाम एक से अधिक खातों में दर्ज हो सकता है। में रहता है भले ही पहले उसका नाम एक से अधिक
कितने ही खातों में क्यों न दर्ज हो। खातेदार का विभिन्न खातों के
अंश को पृथक कर एक खाते में दर्ज किया जाता है। यह इसलिए
किया जाता है कि प्रत्येक खातेदार का एक चक बन सके।
7- बन्दोबस्त में नियोजन कार्यो के लिए चकबन्दी में नियोजन भी किया जाता है। ग्राम की आवश्यकतानुसार
भूमि बैंक बनाने का कोई प्रावधान नहीं है। सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए भूमि सुरक्षित की जाती है जिन्हें
भूमि बैंक भी कह सकते हैं। भविष्य में गावं का विकास बाधित न हो इसके लिए गांव की कुछ भूमि को सुरक्षित रख दिया जाता है ताकि,
भविष्य में उस भूमि पर नियोजन सम्बन्धी कार्यों का निष्पादन किया जा
सके। जैसे आबादी का विस्तार, खेल का मैदान, विद्यालय, औषधालय,
पंचायत घर, सिंचित क्षेत्रों के लिए गूल का विस्तार आदि।
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि भूमि बन्दोबस्त से चकबन्दी अधिक लाभदायक है।
स्वैच्छिक चकबन्दी समाधान नहीं
पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि सुधारों को लेकर प्रदेश सरकारें हमेशा ही दुविधा में रही हैं । उत्तर प्रदेश के समय से ही यह दुविधा चली आ रही है कि पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी का कार्य किस प्रकार से सम्पादित किया जाय।
9 नवम्बर 2000 को जब उत्तराखण्ड राज्य का गठन हुआ तो प्रारम्भ से ही प्रदेश सरकार इस उधेड़बुन में लगी रही कि क्षेत्र में चकबन्दी तो होनी चाहिए परन्तु उसके लिए कौन सी विधि अपनायी जानी चाहिए। समय-समय पर प्रदेश में चकबन्दी के लिये योजनायें बनती रही परन्तु उन्हें विभिन्न कारणों से धरती पर नहीं उतारा जा सका। यही कारण है कि अन्तरिम सरकार में भी सिर्फ चकबन्दी का संकल्प पारित तो हुआ परन्तु चकबन्दी नहीं हुई । 2002 में जब प्रथम निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी के मुख्यमंत्रित्व काल में पहले चकबन्दी की घोषणा की गयी थी परन्तु बाद में विचार बदल दिया गया। ध्यान रहे कि, 1989 में जब नारायण दत्त तिवारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब भी पर्वतीय क्षेत्रों में चकबन्दी की बात हुई थी। उनके कार्यकाल सन 2004 में स्वैच्छिक चकबन्दी पर कार्य योजना बनी तथा भूमि सुधार परिषद का गठन किया गया। पूरन सिंह डंगवाल परिषद के अध्यक्ष बनाये गये परन्तु प्रगति शून्य थी। इसके बाद की सरकारों ने भी कभी अनिवार्य चकबन्दी तो कभी स्वैच्छिक चकबन्दी और कभी भूमि बन्दोबस्त की बात की परन्तु प्रगति हर बार शून्य ही रही। स्वैच्छिक चकबन्दी करने वाले गांव को 1 करोड़ रूपया देने की बातें भी हुई परन्तु नतीजा शून्य ही रहा। वर्तमान सरकार भी चकबन्दी के दोराहे पर खड़ी है। अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है। अलग-अलग समय में सरकार की बातें अलग-अलग रहती हैं। कभी अनिवार्य चकबन्दी की बात होती है तो कभी स्वैच्छिक चकबन्दी की। स्पष्ट है कि शासन-प्रशासन स्वयं भी नहीं समझ पा रहा है कि क्या किया जाए और कैसे किया जाय? शासन-प्रशासन यह तो समझ रहा है कि क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि के लिए चकबन्दी आवश्यक है परन्तु कैसे हो, इसका समाधान किसी के पास नहीं है।
चकबन्दी का समाधान खोजा जा सकता है बशर्त शासन-प्रशासन चकबन्दी के जानकार सेवानिवृत्त अधिकारियो,ं कर्मचारियों, भूमि से जुड़े चकबन्दी सामाजिक कार्यकर्ताओं एव ंखेती किसानी से जुड़े किसानों से परामर्श करे तो चकबन्दी का आसान उपाय खोजा जा सकता है।
वास्तव में स्वैच्छिक चकबन्दी समाधान नहीं है। आर्थिक सशक्किरण के लिए अनिवार्य चकबन्दी ही पर्वतीय क्षेत्रों का एकमात्र समाधान है। अस्सी के दशक में स्व0 राजेन्द्र सिंह रावत के विशेष प्रयासों से उत्तरकाशी जिले के ग्राम बीफ और खरसाली गाँवों में स्वैच्छिक चकबन्दी हुई। परन्तु विडम्बना ही कई जायेगी कि स्वैच्छिक चकबन्दी के उक्त दोनों गाँवों का अभी तक भू-अभिलेखीकरण नहीं हो पाया है। कारण बिना अधिनियम के अन्तर्गत यह कार्य सम्पन्न किया गया था। यदि आज भी उक्त गाँवों का कोई व्यक्ति उस स्वैच्छिक चकबन्दी के विरूद्ध किसी सक्षम न्यायालय में वाद दायर करता है तो वह स्वैच्छिक चकबन्दी अमान्य हो जायेगी क्योंकि यह चकबन्दी विधि मान्य नहीं है। यही कारण रहा है कि उक्त दोनों के अतिरिक्त अन्य किसी भी गांव में स्वैच्छिक चकबन्दी सफल नहीं हो पायी। उत्तर प्रदेश जोत चकबन्दी अधिनियम के अन्तर्गत जनपद देहरादून के सलाण गांव में 1972 में पूर्ण रूप से पहाड़ीनुमा सीढ़ीदार खेतों में सफलता पूर्वक चकबन्दी की गयी। परन्तु दुर्भाग्य यह रहा कि इस गांव में अभी तक शासन प्रशासन ने चकबन्दी का कोई संज्ञान नहीं लिया है। यदि उस समय में इसका संज्ञान लिया होता तो 1973 में ही इस गांव की चकबन्दी पूर्ण हो चुकी होती तथा इसी को मॉडल मानते हुये उत्तर प्रदेश जोत चकबन्दी अधिनियम के अन्तर्गत समस्त पर्वतीय भू भाग मेंं चकबन्दी का कार्य वर्षो पूर्व पूर्ण हो चुका होता।
वास्तविक स्थिति
यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो सन 2000 में राज्य की कुल खेती योग्य भूमि 8,31,980 परिवारों के नाम पर दर्ज थी। इनमें 5 एकड़ से 10 एकड़ 10 एकड़ से 25 एकड़ और 25 एकड़ से ऊपर की तीनों श्रेणियों की जोतों की संख्या 10,8,863 थी। इन 10,8,863 परिवारों के नाम 4,02,422 हेक्टेयर कृषि भूमि दर्ज थी यानि कि, राज्य की कुल कृषि भूमि की लगभग आधी भूमि।पांच एकड़ से कम जोत वाली कृषि भूमि दर्ज थी। पहाड़ में अधिकांश परिवारों के पास 5 एकड़ से कम कृषि भूमि है और वह भी कई जगहों पर बिखरी पड़ी हुई है। बिखरी जोत के कारण कृषि कार्य करना मुश्किल होता जा रहा है। राज्य में एक बड़ी आबादी नामात्र कृषि योग्य भूमि के कारण लगभग भूमिहीन कृषक जैसा ही है। निरन्तर पलायन ने इस समस्या को अधिक विकट बना दिया है।
कैसे होती है चकबन्दी ?
कृषक की कुल जोत भूमि जो कि भूमि बन्दोबस्त रिकार्ड में उसके नाम दर्ज है तथा वह यत्र-तत्र बिखरी हुई है उतने ही मूल्य के बराबर रास्तों, सार्वजनिक सुविधाओं, चकमार्गों आदि के लिए यथोचित स्थान छोड़ते हुए किसी एक स्थान पर एक मुश्त चक के रूप में कृषक को जो भूमि उपलब्ध करायी जाती है वही चकबन्दी कहलाती है। इस पूरी प्रक्रिया में चक बनाने के साथ साथ भूमि बन्दोबस्त, भू-अभिलेखों का पुर्निरक्षण एवं शुद्धिकरण तथा विधिवत दस्तावेजीकरण किया जाता है। ग्राम नियोजन के लिए भूमि बैंक सुरक्षित करना भी चकबन्दी का हिस्सा है।
ै चकबन्दी प्रक्रिया
नियुक्तियां
शासन द्वारा किसी क्षेत्र विशेष में चकबन्दी प्रक्रिया को सम्पन्न करने के लिये सर्वप्रथम कुशल अधिकारियों तथा कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है। नियुक्तियों का क्रम निम्न प्रकार से हो सकता है- निदेशक/आयुक्त चकबन्दी, संयुक्त संचालक चकबन्दी, उप संचालक चकबन्दी, भूमि बन्दोबस्त अधिकारी चकबन्दी, चकबन्दी अधिकारी, सहायक चकबन्दी अधिकारी, ड्राफ्टसमैन, लेखपाल चकबन्दी, ट्रेसर कार्यालय लिपिक, चैनमैन तथा चपरासी योजना में एक इकाई सहायक चकबन्दी अधिकारी का क्षेत्र होता है। इस क्षेत्र में लगभग पांच से छः हजार तक कृषि योग्य भूमि ली जाती है। सहायक चकबन्दी अधिकारी के अधीन दो चकबन्दीकर्ता, लेखपाल, पेशकार, चपरासी, डाक रनर होता है। चकबन्दी कर्ता के पास उक्त 6 लेखपालों में से 3-3 लेखपाल एवं 1-1 चेनमैन होता है। चकबन्दी अधिकारी के अधीन 3-5 सहायक चकबन्दी अधिकारी क्षेत्र होते हैं साथ ही एक पेशकार, एक अलहमद एवं एक ड्राफ्ट्समैन एवं दो ट्रेसर तथा दो चपरासी होते हैं। कार्यालय लिपिक वर्ग आदि भी इसमें शामिल होता है। चकबन्दी क्रियाआें के सफल कार्यान्वयन के लिए अति आवश्यक है कि चकबन्दी योजना से जुड़े अधिकारी एवं कर्मचारी अपने कार्य के प्रति पूर्ण निष्ठावान हों तभी चकबन्दी जैसा जटिल कार्य पूर्ण हो सकता है।
चकबन्दी क्रियाओं का प्रारम्भ
1- चकबन्दी प्रक्रिया के लिए ग्राम स्तर पर सूचना-
किसी क्षेत्र विशेष में चकबन्दी प्रक्रिया को आरम्भ करने के लिए सर्वप्रथम सरकार द्वारा सरकारी गजट नोटिफिकेशन किया जाता है। गजट नोटिफिकेशन के प्रकाशन के उपरान्त, सहायक चकबन्दी अधिकारी विधिवत चकबन्दी कर्ता हर गांव में इसका प्रकाशन ग्राम सभा की बैठक बुलाकर करते हैं। इसमें प्रत्येक ग्रामवासी को यह यह सूचना दी जाती है कि आज से ग्राम से चकबन्दी की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है। इसलिए जब तक गांव में चकबन्दी की प्रक्रियायें पूर्ण नहीं होती तब तक कोई भी भूमि का खातेदार या अन्य व्यक्ति कृषि योग्य खाते की भूमि का क्रय-विक्रय बिना बन्देबस्त अधिकारी चकबन्दी के अनुमति के बिना नहीं कर सकता है। कृषि कार्य के अतिरिक्त कृषि खाते की भूमि का उपयोग गैर कृषि कार्यों के लिए करना पूर्णतया वर्जित है। भूमि सम्बन्धी समस्त वाद विवाद यदि किसी न्यायालय में लम्बित हों तो स्थगित माने जाते हैं तथा ऐसे सभी मामले चकबन्दी न्यायालयों में स्थानान्तरित हो जाते हैं।
2- चकबन्दी समिति का गठन-
विधिवत प्रस्ताव देकर ग्रामवासियों को सूचित किया जाता है कि भूमि प्रबन्धक समिति में से चकबन्दी समिति के अध्यक्ष एवं सदस्यों का चुनाव किया जाना है। चुनाव के लिए एक तिथि निश्चित की जाती है तथा निश्चित तिथि पर चकबन्दी कर्ता समिति का गठन करता है। इसमें पिछड़ी जाति एवं अनुसूचित जाति/जनजाति का कम से कम एक सदस्य होना अनिवार्य है। अन्यथा बन्दोबस्त अधिकारी चकबन्दी द्वारा एक सदस्य मनोनीत भी किया जा सकता है। यह ग्राम चकबन्दी समिति चकबन्दी के हर स्तर के काम में चकबन्दी कर्मचारियों को अपना सुझाव तथा सहायता प्रदान करती है। समिति के सुझावों को ध्यान में रखते हुए अधिकांश महत्वपूर्ण कार्य समिति के परामर्श से ही सम्पन्न किये जाते हैं।
3- शजरा (नक्शा) दुरूस्ती-
चकबन्दी लेखपाल सरसरी तौर पर गांव के खेतों के मौके पर नक्शे से मिलान करता है। मामूली नक्शा दुरूस्ती लेखपाल मौकानुसार स्वयं ही कर देता है। उसके इस कार्य की जाचं चकबन्दीकर्ता एवं सहायक चकबन्दी अधिकारी अपने स्तर से भी करते हैं। यदि मौजूदा नक्शे और मौके पर खेतों के क्षेत्रफल, आकृति आदि में अधिक असमानता मिलती है तो उस ग्राम के चकबन्दी कर्मचारियों द्वारा दोबारा सर्वे करके मौके के हिसाब से नक्शा तैयार किया जाता है। तथा खेतों का तद्नुसार क्षेत्रफल अंकित किया जाता है।
4- चकबन्दी जांच-
नक्शा दुरूस्ती के उपरान्त लख्ेपाल तहसील से प्राप्त खसरे के आधार पर खसरा तैयार करता है तथा इसमें समय-समय पर अन्य प्रविष्टियां भी की जाती है। इस चकबन्दी खसरे में सम्बन्धित गांव के सभी खेतों को क्रमवार अंकित किया जाता है। प्रत्येक खेत का खसरे में दर्ज क्षेत्रफल के साथ-साथ नक्शे दुरूस्ती में प्राप्त क्षेत्रफल को भी अंकित किया जाता है। लेखपाल भूमि से सम्बन्धित समस्त जानकारियां भी इसमें दर्ज करता है। जैसे कि पूर्व बन्दोबस्त में दर्ज हैं। उदाहरणतः खेत सिंचित है या असिंचित। एक फसली है या द्विफसली, भूमि का प्रकार आदि।
जब विधिवत भू-अभिलेख लेखपाल द्वारा तैयार कर लिया जाता है तो विधिवत रूप में ग्राम प्रस्ताव के साथ जारी किया जाता है तथा चकबन्दी कर्ता द्वारा घोषणा की जाती है कि वह सम्बन्धित खेतों की पड़ताल करने आयेगा। अतः सभी सम्बन्धित पक्ष, चकबन्दी समिति एवं कृषक उस दिन (घोषित दिन) उपस्थित रहकर कार्य के निष्पादन में सहयोग प्रदान करें।
ठीक निर्धारित तिथि पर चकबन्दी कर्ता एवं लेखपाल गांव में पहुंचकर चकबन्दी समिति की उपस्थिति में पड़ताल से सम्बन्धित कार्यों का उल्लेख करता है तथा तदनुसार कार्यवाही पुस्तिका में दर्ज कर चकबन्दी समिति तथा उपस्थित भू-स्वामियों के साथ मौके पर जाता है तथा प्रथम खेत से पड़ताल का कार्य शुरू करता है। इसमें चकबन्दी कर्ता प्रत्येक खेत पर खतेदार के अतिरिक्त यदि किसी अन्य व्यक्ति का कब्जा बताया जाता है। या कब्जेदार स्वयं बताता है तो उसका कब्जा कब से और और किस हैसियत से है इन सब बातों की प्रविष्टियां चकबन्दी कर्ता खसरे मेंं करता है।
खेत में पेड़-कुंआ या अन्य कोई मार्क या उन्नति के साधन हों तो उनका इन्द्राज भी खसरे में किया जाता है। खेत एक फसली है द्विफसली है, बन्जर है। असिंचित है, सिंचित है गांव की आबादी से खेत कितनी दूरी पर स्थित है। खेत की प्राकृतिक बनावट कैसा है, भूमि किस प्रकार की है, खेत समतल है या उबड़-खाबड़ है, जंगल या किसी बाग के पास है। खेत की समस्त जानकारी खसरे में समाहित की जाती है।
5- खतौनी सत्यापन (तस्दीक)
गांव में चकबन्दी सम्बन्धी जांच पूरी होने के बाद खतौनी सत्यापन का कार्य किया जाता है। खतौनी सत्यापन के लिए चकबन्दी कर्ता चकबन्दी समिति तथा गांव के भू-स्वामियों के साथ मिलकर खतौनी सत्यापन के लिए दिन निश्चित करते हैं। निश्चित दिन पर चकबन्दी कर्ता गांव में आकर चकबन्दी समिति तथा गांव के कृषकों को तहसील से प्राप्त खतौनी या खातेवार प्रत्येक खातेदार को पढ़कर सुनाता है तथा इसमें दर्ज खातेदार का नाम, पिता का नाम, निवास स्थान, सही अंकित है या नहीं, यह पूछता है। खाते में खातेदार के क्या अंश हैं किसी सह खातेदार भाई,चाचा, ताउ, भतीजा, पोता आदि अथवा बेनामा आदि संयुक्त रूप से ली गयी भूमि किसी का नाम अंकित होने से रह तो नहीं गया है, किसी खातेदार का नाम खाते में गलत तरीके से तो दर्ज नहीं है, खतौनी में सभी प्रकार की विसंगतियांं को चकबन्दीकर्ता एक रजिस्टर में अंकित करता है। इस रजिस्टर में सत्यापन खतौनी के समय पायी गयी गलतियों के साथ पड़ताल के समय पाये गये कब्जेदारों को भी नोट किया जाता है। चकबन्दीकर्ता उक्त सत्यापन खतौनी के समय खाते में दर्ज नाबालिग, जड़, पागल, आदि की भी एक सूची तैयार करता है जिसमें यदि पहले से उनके अभिभावक दर्ज नहीं हैं तो अभिभावक का नाम उसका नाबालिग, जड़, पागल से रिश्ता भी दर्ज करता है। इन सभी विसंगतियों को दूर करने के लिए व्यापक चर्चा की जाती है चकबन्दी समिति तथा अन्य कृषको ंकी उपस्थिति में सही गलतियों या कमियों का पता लगाकर विसंगतियों को दूर किया जाता है इस पर सहायक चकबन्दी अधिकारी विधिवत् आदेश पारित करता है जिससे चकबन्दी क्रियाओं के दौरान सबके हितों की रक्षा की जाय। ृृृृृ
6- विनिमय अनुपात मूल्य निर्धारित करने के लिए खेतों का चुनावः
सहायक चकबन्दी अधिकारी, चकबन्दी समिति तथा भू-स्वामियों की विनिमय अनुपात मूल्य निर्धारित करने के लिए अपनाय जाने वाले तरीके को समझाने के लिए बैठक का आयोजन करता है। सभी सम्बन्धित पक्षों की उपस्थिति में सहायक चकबन्दी अधिकारी विनिमय अनुपात के बारे में विधिवत् जानकारी देता है। चकबन्दी प्रक्रिया का यह बहुत अहम और महत्वपूर्ण भाग है। विनिमय अनुपात मूल्य निर्धारण प्रक्रिया में गावोंं के समस्त खेतों में दो-चार ऐसे खेत चुने जाते हैं जो आपस में हर दशा में एक समान हों अर्थात उपज, किस्म, सिंचाई के साधन एवं गांव से दूरी हर दशा में एक ही श्रेणी के ऐसे खेत दोषरहित गावं के समस्त खेतों में सबसे उत्तम चुने जाते हैं। ऐसे दो-चार जो भी खेत चुने जाते हैं उनका मौका मुआयना करने के उपरान्त वह मानक गाटे (खेत) घोषित किये जाते हें। इस प्रकार शेष खेतों का विनिमय अनुपात सहायक चकबन्दी अधिकारी द्वारा चकबन्दी समिति एवं उपस्थित जानकार किसानों की मदद से निर्धारित किया जाता है। इन मानक गाटों (खेतों) का मूल्यांकन 100 पैसे प्रति बीघा/एकड़ या हेक्टैयर के हिसाब से निर्धारित होता है। इसके उसका मानक मानकर अन्य खेतों का मूल्यांकन निर्धारित किया जाता है।
7- खेतों के विनिमय अनुपात का निर्धारण
यह कार्य सहायक चकबन्दी अधिकारी द्वारा चकबन्दी समिति तथा गांव के सभी उपस्थित किसानों के सम्मुख बैठक में किया जाता है। सहायक चकबन्दी अध्किरी सभी सम्बन्धित पक्षों को खेती का विनिमय अनुपात (खेतों का मूल्य) के बारे में विस्तार से समझाता है। इसमें ग्राम के खेत जो कि लगभग एक समान हों, समानता के आधार पर कई खण्डों में बांटा जाता है। उन बड़े खण्डों का आपस में किस विनिमय अनुपात से अदला बदली होगी यह नक्शे में भी दर्शाया जाता है। मानक गाटे (सबसे उत्तम खेत) की तुलना मे शेष खेतों का मूल्य क्या होगा। इसका निर्धारण किया जाता है।
मानक गाटे की कीमती 100 पैसे/इकाई के रूप में मानी जाती हैं तथा उसी के आधार पर अन्य सभी खेतों का मूल्य निर्धारित किया जाता है। यह विनिमय अनुपात 5,10,15,20,95 पैसे तक हो सकता है। इस विनिमय अनुपात को मूल्य निर्धारण के बाद सहायक चकबन्दी अधिकारी नक्शे पर भी अंकित करता है। इस प्रक्रिया के दौरान खेत में विद्यमान पेड़, कुआं तथा उन्नति के अन्य साधनों का प्रतिकर भी चकबन्दी समिति तथा कृषकों की आम सहमति के आधार पर तय किया जाता है। गांव की बैठक के दौरान सहायक चकबन्दी अधिकारी खतौनी सत्यापन के समय पायी गयी अश्ुद्धियों एवं विसंगतियों का निस्तारण भी करता है। साथ ही चकबन्दी कर्ता द्वारा तैयार की गयी नाबालिक जड़, पागल आदि के अभिभावकों की नियुक्ति भी करता है ताकि चकबन्दी प्रक्रिया के दौरान सभी हितधारकों के हितों की रक्षा की जा सके।
8- सार्वजनिक प्रयोजन हेतु भूमि को सुरक्षित किया जाना।
ग्राम नियोजन के लिए कुछ भूमि सुरक्षित की जाती है भले ही इस प्रक्रिया का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चकबन्दी प्रक्रिया के कोई सम्बन्ध नहीं है परन्तु भविष्य में गांव के विकास के लिए यह आवश्यक है कि सार्वजनिक प्रयोजन के लिए कुछ भूमि सुरक्षित रखी जाय। सार्वजनिक प्रयोजन के लिए भूमि सुरक्षित रखने हेतु सहायक चकबन्दी अधिकारी, चकबन्दी समिति तथा सभी ग्रामवासियों की बैठक बुलाता है। सभी पक्षों की उपस्थिति में यह तय किया जाता है कि ग्राम नियोजन के भूमि सुरक्षित की जा रही है। मुख्य रूप से गांव के आबादी विस्तार, भूमिहीन तथा अनुसूचित वर्ग के लोगांं के लिए आवास, खाद के गड्ढों, ग्रामीण मार्गों के लिए चक मार्ग, विद्यालय, पंचायत घर, क्रीड़ास्थल, अस्पताल, पौधशाला, वृक्षारोपण स्थल, नहर, गूल, मरघट, कब्रिस्तान सार्वजनिक सिंचाई के लिए टैंक आदि ग्राम की आवश्यकतानुसार खाते की या ग्राम समाज की भूमि सुरक्षित की जाती है। यह एक ऐसा कार्य है जिसमें ग्राम के चौमुखी विकास के लिए भूमि की उपलब्धता रहती है।
इस कार्यवाही के दौरान गांव की आवश्यकता को दृष्टिगत रखते हुए भूमि सुरक्षित की जाती है तथा उसके एवज में प्रत्येक खातेदार से उसकी समस्त भूमि के मूलयांकन से 3 से 5 प्रतिशत मूल्याकंन की भूमि ली जाती है सार्वजनिक प्रयोजनों हेतु सहायक चकबन्दी अधिकारी चकबन्दी समिति के परामर्श से उचित स्थान पर भूमि सुरक्षित करता है।
9- खतौनी के नकल का वितरण -
तहसील से प्राप्त खतौनी की नकल प्रत्येक खातेदार तथा कब्जेदार को उपलबध करायी जाती है। खतौनी में खातेदार का खाता संख्या, खेतों का खतौनी में दर्ज समस्त खेतों का रकबा, रिसर्वे या चकबन्दी पडताल में पाया गया कि खेतों का क्षेत्रफल, कब्जेदार का नाम, पूरा पता सहित तथा खेतों की विनिमय दर अंकित किया जाता है। इस हिसाब से खेत की कुल कीमती, जैसे उदाहरण के तौर पर यदि किसी का खेत आधा एकड़ का है तथा उसका विनिमय दर प्रति एकड़ 40 पैसे निर्धारित किया गया है तो आधा एकड़ की कीमत 20 पैसे होगी। इस प्रकार से विनिमय दर के हिसाब से प्रत्येक खाते की कीमत तय की जाती है तथा उसमें खातेदार का कितना अंश है, खेत में पेड़, कुआं या अन्य उन्नति के साधन उपलब्ध हैं तो उसका प्रतिकर तथा उसमें से किस खातेदार का कितना अंश है यह भी अंकित किया जाता है। यदि किसी खातेदार की भूमि से सार्वजनिक हितों के लिए भूमि सुरक्षित की गयी है तो उसका उल्लेख भी खतौनी में किया जाना चाहिए। इसी प्रकार कब्जेदार को भी खतौनी की एक नकल जारी की जाती है जिसमें खेत या खेतों पर उसका कब्जा पड़ताल के समय बताया गया था। उक्त सभी विवरणों के साथ वितरित किया जाता है। इन उद्धरणों के साथ ही प्रत्येक खातेदार को एक नोटिस भी वितरित किया जाता है यदि खतौनी में अंकित विवरण से किसी व्यक्तियों को आपत्ति हो तो वह अपनी आपत्ति लिखित रूप से साधारण कागज पर बिना कोर्ट फीस का टिकट लगाए निर्धारित अवधि के अन्दर सहायक चकबन्दी अधिकारी के कार्यालय में कर सकता है।
10- अशुद्धियों एवं आपत्तियों का निराकरण
आपत्ति करने के लिए निर्धारित समय के उपरान्त समस्त विवादित या अशुद्धि वाले खातों की कार्यालय प्रतिलिपि सम्बन्धित लेखपाल, सहायक चकबन्दी अधिकारी के पेशकार को उपलब्ध करता है पेशकार प्रत्येक विवादित खाते की प्रतिलिपि एवं कब्जेदार को दी गयी प्रतिलिपि के साथ उस खाते से सम्बन्धित प्राप्त सभी आपतितयों को संलग्न कर अलग-अलग पत्रावलियां बनाकर उन्हें विधिवत मिसिल बन्दकर रजिस्टर में दर्ज करता है।
इसके उपरान्त विधिवत सूचना देकर सहायक चकबन्दी अधिकारी गावं में जाते हैं तथा प्रत्येक पत्रावली का समझौते के आधार पर निस्तारण करने का प्रयास करते हैं। यदि सम्बन्धित पक्षों तथा चकबन्दी समिति की उपस्थिति पढ़कर सुनाया जाता है और इसमें सम्बन्धित पक्षों के हस्ताक्षर या अंगूठा निशानी एवं साक्षी के तौर पर दो चकबन्दी समिति के सदस्यों के हस्ताक्षर भी लिये जाते हैं। इस समझौते के आधार पर सहायक चकबन्दी अधिकारी आदेश पारित कर सकता है।
जो वाद सहायक चकबन्दी अधिकारी समझौते के आधार पर चकबन्दी खतौनी तैयार करता है इस खतौनी में एक मुख्य बात यह होती है कि संयुक्त खातों के प्रत्येक खातेदार के क्या अंश हैं। आदेश के अनुसार दर्ज किये जाते हैं तथा अन्य बातें खतौनी के अनुसार ही दर्ज होती है। इस प्रकार पुनः चकबन्दी प्रक्रियाओं के दौरान भू-अभिलेख तथा नक्शे की दुरूस्ती का कार्य पूर्ण किया जाता है।
11- चकों का निर्धारण
सहायक चकबन्दी अधिकारी, चकबन्दी समिति तथा ग्राम कृषकों की उपस्थिति में चक निर्धारण का कार्य नशे पर अभिलेखों एवं उपस्थित चकबन्दी समिति व कृषकों के सहयोग से निर्धारित करता है। सर्वप्रथम यदि किसी मुख्य मार्ग की आवश्यकता है तो ेउसे उपस्थित लोगों के परामर्श से गावं की सुविधानुसार नक्शे पर दर्शाया जाता है इसी प्रकार अन्य सहायक मार्गों को भी नक्शे पर बनाया जाता है इसके उपरान्त मौके पर जाकर नजरी सीमांकन किया जाता है। यदि मार्गों में नक्शे के अनुसार तथा वास्तविकता में अन्तर है तो मौकानुसार संशोधन किया जाता है।
12- नये भू-अभिलेखों को तैयार करना
नये निर्धारित चकों पर कब्जा दिलाये जाने के उपरान्त खातेदारों के नये भू-अभिलेख तैयार किये जाते हैं। इसमें प्रत्येक चक में पुराने कितने ही खेत क्यों न हों सब का कुल रकबा सहित एक नया नम्बर दिया जाता है। तदनुसार उसका लगान भी अंकित किया जाता है। यदि किसी कृषक को दो या तीन चक मिले हों तो उसमें भी खाते के दो-तीन खेत की रकबे सहित अंकित किये जाते हैं।
इसी प्रकार नक्शा भी नये नम्बर का बनाया जाता है। नये नम्बरों का खसरा, खतौनी तथा नक्शा तैयार करने के बाद उसकी विभिन्न स्तरों पर जांच की जाती है। पूर्ण संतुष्टि के उपरान्त नये खसरा, खतौनी तथा नक्शा तैयार कर तहसील को भेज दिये जाते हैं। इस प्रकार खातेदार का एक चक मिल जाता है तथा वह तहसील के रिकार्ड में भी विधिवत दर्ज हो जाता है। पूर्ण सन्तुष्टि होने पर चकबन्दी प्रक्रियण को समाप्त माना जाता है।
उत्तर प्रदेश में लागू चकबन्दी नियम व अधिनियम के तहत ही उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में भी चकबन्दी की जा सकती है। बस इसमें भौगोलिक परिस्थितियों को मध्यनजर रखते हुए मामूली संशोधन की आवश्यकता है। यहां ंपर भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार चौकोर या आयताकार चक तैयार नहीं किये जा सकते हैं परन्तु बिखरे खेतों को इकट्ठा करके चक को तैयार किये जा सकते हैं। यही चकबन्दी का मूल उद्देश्य है।
समृद्धि का मूल मन्त्र है चकबन्दी
पर्वतीय क्षेत्रों में समृद्धि का मूल मन्त्र चकबन्दी में समाया हुआ है। यदि पर्वतीय क्षेत्रों मेंं चकबन्दी होती है तो पर्यावरण, पशुपालन, मत्स्य पालन, बागवानी, उद्यानीकरण, वानिकी, जड़ी बूटियों का उत्पाद, जल संरक्षण आदि में इस क्षेत्र में बेहतरीन कार्य किया जा सकता है। पहाड़ में खेतों का बिखराव चरम पर है जिसकी वजह से यहां पर स्वरोजगार से सम्बन्धित कार्य करना मुश्किल होता जा रहा है। स्थिति यह कि यहां पर आधुनिक खेती तो दूर परम्परागत खेती करने के भी लाले पड़े हुए हैं चकबन्दी होने से पर्वतीय क्षेत्रों में असीम सम्भावनायें समायी हुई हैं।
पहाड़ी दालों की खेती
पर्वतीय क्षेत्रों में उगने वाले अनाज, तथा सब्जियों की गुणवत्ता मैदानी के क्षेत्रों के मुकाबले अधिक अच्छी होती है। प्राकृतिक गुणों से भरपूर यहां की पैदावार प्रोटीन विटामिन्स, मिनरल्स आदि पौष्टिकता से भरपूर होने के साथ जैविक उत्पादन होने के कारण श्रेष्ठता लिए हुए है। भारतीय भोजन में दाल एक मुख्य अवयव है। संतुलित भोजन में दाल प्रोटीन के साथ-साथ विटामिन, लवण आदि की पूर्ति करते हैं। रोटी हो या चावल बिना दाल के अपूर्ण माने जाते हैं।
उत्तराखण्ड में यदि दलहन की फसलों को प्रोत्साहन दिया जाय तो यहां का किसान आर्थिक रूप से समृद्ध हो सकता है लेकिन चकबन्दी के अभाव में यहां की परम्परागत दालें आज धीरे-धीरे विलुप्तप्रायः होती जा रही हैं।
उत्तराखण्ड उड़द, राजमा, गहथ, मसूर, मटर, सोयाबीन, तुअर, लोबिया, सून्टा, रयांस (मूंग प्रजाति की दाल) आदि दालों की बहुत अच्छी पैदावार हो सकती है।
सगन्द पादप
उत्तराखण्ड वनस्पतिक विविधता पूरे विश्व में अद्वितीय है यहां विभिन्न वनस्पतियां होने के कारण इस क्षेत्र को विशिष्टतायें प्रदान करती है। कुंणजू, झूम (झुनझुनिया) जैसे सगंद के पौधे यहां प्राकृतिक रूप से मौजूद हैं। इन पौधों से वैज्ञानिक कई प्रकार की कीटनाशक दवाइयां बनाने के लिए करते हैं। यदि इन पौधों का व्यवसाययिक खेती की जाय तो क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि लायी जा सकती है। इसके साथ ही लैवेनर, लैमन ग्रास, जिरेनियम, रोजमेरी, क्लेरीसेज, मार्डन सेज जैसे अनेक पौधे हैं जिसकी व्यवसायिक खेती इस क्षेत्र में की जा सकती है।
क्लेरीसेज, थाइम (वनजीरा) पिपरमेन्ट, एस्पेराइजस आदि ऐसे पौधे हैं जिन्हें सीढ़ीनुमा खेतों पर सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।
नये विदेशी फलों की सम्भावनायें
उत्तराखण्ड में पारम्परिक फलोत्पादन के अलावा अन्य कई विदेशी फलों के कारोबार की असीम सम्भावनायें हैं बीसवीं सदी के प्रारम्भ में जब हिमाचल की धरती पर विदेशी सेब लाया गया था तो तब किसी ने कल्पना भी नहीं की थी यही सेब एक दिन हिमालय की अर्थव्यवस्था की रीढ़ साबित होगा तथा हिमाचल की पहचान बन जायेगा। इसी प्रकार उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य भारत में चीन से आयी गयी चाय ने भारत को आज चाय का अग्रणी निर्यातक देश बना दिया। अभी भी अनेक विदेशी फल, फूल हैं जिनका भारत में अच्छा उत्पादन किया जा सकता है।
उत्तराखण्ड की धरती में भी अनेकों विदेशी फलों का सफल परीक्षण हो चुका है। इन फलों में कीवी, नैक्टरीन, पेसिओन, पीकनट, स्ट्राबेरी आदि हैं जिसका कि उत्तराखण्ड में व्यावसायिक खेती की जा सकती है।
सब्जियों में रोजगार
उत्तराखण्ड में परम्परागत सब्जियों में आलू, पालक, मूली, गाजर, फूलगोभी, बन्दगोभी, लौकी, बैंगन, मिर्च, परासबीन, सेम, तोरी, कद्दू, भिण्डी, चचिण्डा, करेला, प्याज, टमाटर आदि की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। इसके अतिरिक्त कुछ विदेशी सब्जियों की खेती भी यहां पर की जा सकती है। इनमेंं मुख्य सब्जियां हैं- ग्लोब, आर्टिचोक, रूटाबागा, कार्टून, स्विसचार्ड, सूबार्व, चार्ड, एस्पारेगस, स्कोरजेनेरा, लोक, मेलो, ब्रोकली, केल, रेड कैबेज, सेल्टयूस, चायनीज कैबेज, साल्सीफाई, ब्रुसेल्स, स्प्राउट्स, कोरियन सीनेज, सेलेरियाक, लेटयूस, एन्डिव, पार्सली, स्वीट फेनल, लैक पेनल, न्यूजीलैण्ड स्पीनेज आदि के प्रयोग भी सफल रहे हैं।
फूलां की खेती
उत्तराखण्ड में पुष्पोत्पादन की असीम सम्भावनायें हैं। किन्तु अभी तक इस क्षेत्र में कोई खास ध्यान नहीं दिया गया है। आज भारत में लगभग डेढ हजार करोड़ रूपये के आस-पास सालाना फूलों का कारोबार होता है। विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी भी इसी प्रदेश में स्थित है।
उत्तराखण्ड में जलवायु ठण्डी होने के कारण यदि फूलों के उत्पादन में वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया जाय तो पुष्पोत्पादन के क्षेत्र में कदम बढ़ाना लाभ का सौदा साबित हो सकता है।
जड़ी-बूटी उत्पादन से रोजगार
प्राकृतिक रूप से समृद्ध इस क्षेत्र में जड़ी-बूटी उत्पादन की भी असीम सम्भावनायें छिपी हुई हैं ं। जड़ी-बूटी उत्पादन भी यहां के कृषकों को आर्थिक आधार प्रदान कर सकता है। विश्व में औषधीय तथा सगन्ध पादपों का उत्पादन 7 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। वर्तमान में एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग चौदह हजार करोड़ रूपये का सालाना कारोबार होता है। इस प्रदेश में वनौषधियों के उत्पादन की असीम सम्भावनायें छिपी हुई है। राज्य में लगभग 500 प्रकार की प्रजातियां ऐसी हैं जिन जड़ी बूटियों की बाजार में भारी मांग है। इसके अलावा 160 ऐसी प्रजातियां हैं जिनके निरन्तर दोहन होने के कारण लुप्त प्रायः प्रजातियों की श्रेणी में रखा गया है। इनके कृषिकरण के प्रोत्साहन और इनको बचाने की भी वैज्ञानिकों पर बड़ी जिम्मेदारी हैं इस राज्य में प्रतिवर्ष लगभग 300 करोड़ रूपये मूल्य की वनौषधियांं का निर्यात किया जाता है।
उत्तराखण्ड में अधिकांश किसान लघु एवं सीमान्त कृषक की श्रेणी में आता है। इन छोटी जोतों पर वनौषधियों का उत्पादन कर कम भूमि से अधिक लाभ लिया जा सकता है।
औषधीय वृक्षों की खेती
औषधीय वृक्षों की खेती को अपनाकर भी राज्य में आर्थिक रूप से समृद्धि लायी जा सकती है। जिन स्थानों पर अन्य खेती सम्भव नहीं है। उन स्थानों पर औषधीय वृक्ष लगाकर भी लाभ कमाया जा सकता है। कई स्थानों पर नकद खेती करना सम्भव नहीं हो पाता है। क्योंकि यहां पर धरती की ऊपरी परत हर साल बह जाती है, नमी की कमी, वनस्पति विहीनता, पारिस्थितिकीय असन्तुलन, पौधों का रोगग्रस्त हो जाना , सिंचाई की सुविधा न होना, भूमिगत जल स्तर की कमी आदि की समस्या वाले क्षेत्रों में यदि ऐसे औषधीय वृक्षों की खेती की जाय जो कि इस क्षेत्र के माकूल हों तो दोहरा लाभ लिया जा सकता है। इसमें सम्बन्धित उद्योगों के लिए कच्चा माल भी प्राप्त होगा। और पारिस्थितिकीय सन्तुलन स्थापित करने के साथ साथ रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। पर्यावरण संरक्षण में भी ये औषधीय वृक्ष बड़ा योगदान निभाते हैं।
इन औषधीय वृक्षों में मुख्य हैं -दालचीनी/तेजपत्ता, बांस, आंवला, हरड़ और बहेड़ा, रीठा, भीमल, खैर, टिमरू, थुनेर
आदि।
अन्य स्वरोजगार के साधन
राज्य में मशरूम उत्पादन, मत्स्य पालन मौनपालन तथा रेशम कीट पालन भी स्वरोजगार के बेहतरीन विकल्प हैं।
पशुपालन
उत्तराखण्ड में एक समय पशुपालन की समृद्ध परम्परा थी। कृषि और पशुपालन एक दूसरे से जुड़े हुए हैं उत्तराखण्ड में पशुपालन की असीम सम्भावनायें हैं। यदि यहां इनको प्रोत्साहित करने वाली योजनाआें का क्रियान्वयन पूर्ण निष्ठा से किया जाय तो यह व्यवसाय एक बार पुनः गति पकड़ सकता है। यदि खेतों की चकबन्दी हो तथा काश्तकारों को गाय, भेड़, बकरी के लिए पालन के लिए प्रोत्साहित किया जाय तो उत्तराखण्उ में पुनः खुशहाली लौट सकती है।
बीज एवं पौधालय
अच्छे किस्म के बीजों का उत्पादन तथा उत्तम गुणवत्ता के पौधों के साथ पौधालय स्थापित करके भी आर्थिक संसाधन जुटाये जा सकते हैं। बेहतरीन कृषि के लिए अच्छे बीजों तथा पौधों का होना भी नितान्त आवश्यक है। क्षेत्र में आधुनिकतम तरीकों को अपनाते हुए एक बेहतरीन पौधशाला तैयार की जा सकती है। इसी प्रकार राज्य में स्थानीय बीजों की मांग सदा बनी रहती है। स्थानीय बीजों से उगने वाली सब्जियां स्वाद और गुणवत्ता में श्रेष्ठ हैं।
हिमाचल में चकबन्दी
हिमाचल में चकबन्दी की शुरूआत 1954 में हुई । हिमाचल में 1953 में बड़ी जोत के लिए जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम पारित हुआ। यह सारे भारतवर्ष में मुजारों यानि काश्तकारों को भूमि देने सम्बन्धी पहला कानून था। हिमाचल में वर्तमान भूमि प्रबन्धन इसी अधिनियम के तहत चलाया जाता है। अधिनियम के तहत सरकार किसी सम्पदा के राजस्व निर्धारण पर उसकी पुनरावृत्ति का आदेश दे सकती है। एक बार किया गया निर्धारण 40 साल तक लागू रह सकता है। राजस्व प्रबन्ध चलाने के लिए अधिनियम में सहायक समाहती (तहसीलदार), द्वितीय श्रेणी सहायक समाहती (नायब तहसीलदार) होते हैं। इसके अतिरिक्त समाहती (उपमंडलाधिकारी तथा जिलाधीश ) भी होते हैं । कर्मचारी स्तर पर पटवारी, कानूनगो और नंबरदारी का प्रावधान है। सन 1972 में हिमाचल प्रदेश मुजारियत व भूमि सुधार अधिनियम 1972 ;ज्ीम भ्पउंबींस च्तंकमे ज्मदंदबल ंदक स्ंदक त्मवितउे ।बज 1971द्ध पारित हुआ। इस अधिनियम के अन्तर्गत छोटे भू-स्वामी यानी डेढ़ एकड़ सिंचित भूमि से कम तथा तीन एकड़ असिंचित भूमि से कम के स्वामी अपनी मुजारों से भूमि सुधार अधिकारी को प्रार्थना पत्र देकर वापस ले सकते थे।
1972 में एक अन्य हिमाचल प्रदेश भूमि जोत सीमा अधिनियम के अनुसार 21 जनवरी 1971 के बाद कोई भी भू-स्वामी दो फसलें देने वाली भूमि की सूरत में दस एकड़, एक फसल देने वाली भूमि से 15 एकड़ से अधिक भूमि नहीं रख सकता था।
हिमाचल प्रदेश गांव शामलात भूमि अधिनियम 1974 में पारित किया गया। इस अधिनियम के अनुसार शामलात भूमियां मे से जो कि पहले पंचायतों के नियंत्रण में भी, 50 प्रतिशत भूमि गांव के साझे उपयोग के लिए सुरक्षित कर दी गयी। शेष भूमि सरकार के स्वामित्व में शामिल भूमि भूमिहीनों में बांटने तथा उन गरीब काश्तकारों की जमीनें देने के लिए है जिन काश्तकारों के पास जिसके पास एक एकड़ से कम भूमि है।
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