भारतीय ज्ञान प्रणाली के माध्यम से भविष्य के प्रबंधन की नई दिशा पर हुआ मंथन
भारतीय ज्ञान एवं दर्शन से ही वैश्विक शांति और समृद्धि संभव – प्रो. (डॉ.) एच. सी. पुरोहित
देहरादून। (14 जुलाई, मंगलवार) देवभूमि उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एलाइड साइंसेज़ द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय संकाय विकास कार्यक्रम (Faculty Development Programme – FDP) "Indian Knowledge Systems for Innovation, Sustainability and Future-Ready Technologies" के अंतर्गत दूसरे दिन का मुख्य व्याख्यान दून विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के डीन एवं सेंटर फॉर हिन्दू स्टडीज़ के समन्वयक प्रो. (डॉ.) एच. सी. पुरोहित द्वारा "Indian Knowledge System: Future of Management" विषय पर दिया गया। कार्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में आधुनिक प्रबंधन, नवाचार, सतत विकास तथा वैश्विक नेतृत्व की अवधारणाओं पर विस्तृत चर्चा की गई।
यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय के अध्यक्ष श्री संजय बंसल, उपाध्यक्ष श्री अमन बंसल, सहायक उपाध्यक्ष श्रीमती नैन्सी बंसल, कुलपति प्रो. (डॉ.) अजय कुमार, प्रो-वाइस चांसलर प्रो. ऋतिका मेहरा, प्रो-वाइस चांसलर प्रो. आर. के. त्रिपाठी तथा कुलसचिव डॉ. शुभाशीष गोस्वामी के मार्गदर्शन एवं संरक्षण में आयोजित किया गया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में डॉ. शिखा भास्कर, एसोसिएट डीन, स्कूल ऑफ एलाइड साइंसेज़ एवं आयोजन सचिव ने सभी अतिथियों, संसाधन व्यक्तियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि नवाचार, सतत विकास और वैश्विक नेतृत्व का एक सशक्त आधार है। उन्होंने शिक्षकों से भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षण, अनुसंधान तथा पाठ्यक्रम विकास में समाहित करने का आह्वान किया।
अपने मुख्य व्याख्यान में प्रो. (डॉ.) एच. सी. पुरोहित ने भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित प्रबंधन सिद्धांतों का आधुनिक संगठनात्मक प्रबंधन से संबंध स्थापित करते हुए कहा कि भारतीय दर्शन में वर्णित धर्म, कर्तव्य, नैतिक नेतृत्व, सामूहिक निर्णय, लोककल्याण तथा सतत विकास जैसे सिद्धांत आज के प्रबंधन विज्ञान की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य के प्रबंधन मॉडल के लिए एक प्रभावी मार्गदर्शक है। उन्होंने भगवद्गीता, अर्थशास्त्र, उपनिषदों तथा अन्य भारतीय ग्रंथों में वर्णित नेतृत्व, निर्णय क्षमता, संसाधन प्रबंधन, संगठनात्मक नैतिकता एवं मानव-केंद्रित प्रशासन के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन मूल्यों को अपनाकर संस्थान अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी तथा सतत विकास उन्मुख बन सकते हैं। उन्होंने प्रतिभागियों से भारतीय ज्ञान प्रणाली के सिद्धांतों को शोध, शिक्षण एवं प्रशासनिक कार्यों में व्यवहारिक रूप से अपनाने का आह्वान किया।
इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रो. (डॉ.) एच. सी. पुरोहित ने कहा कि वर्तमान समय में विश्व एक अत्यंत अनिश्चित और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। अमेरिका द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिशें, रूस–यूक्रेन के बीच लंबे समय से जारी युद्ध तथा चीन सहित अन्य वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा यह दर्शाती है कि विश्व संसाधनों पर वर्चस्व स्थापित करने की होड़ में उलझा हुआ है। ऐसे समय में वैश्विक शांति, पर्यावरणीय संतुलन तथा सतत विकास जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर सर्वसम्मति स्थापित करना विश्व समुदाय के सामने एक बड़ी चुनौती है।
उन्होंने कहा कि आज भी विश्व के अनेक देश खाद्यान्न और स्वच्छ पेयजल जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे देशों की वास्तविक समस्याओं का स्थायी समाधान तभी संभव है जब विश्व भारतीय ज्ञान एवं दर्शन के मानवीय मूल्यों को अपनाए। भारतीय दर्शन "वसुधैव कुटुम्बकम्" तथा "सर्वे भवन्तु सुखिनः" के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित है, जो समस्त मानवता के कल्याण, शांति, सद्भाव और साझा समृद्धि का संदेश देता है।
प्रो. पुरोहित ने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली का समावेश केवल प्रबंधन शिक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सभी विषयों के पाठ्यक्रमों का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के अंतर्गत भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रमों में शामिल करने का प्रावधान युवाओं में समग्र दृष्टिकोण, नैतिक नेतृत्व, सामाजिक उत्तरदायित्व और वैश्विक सोच का विकास करेगा तथा उन्हें विश्व को अधिक शांतिपूर्ण, समावेशी और सतत भविष्य की दिशा में नेतृत्व प्रदान करने के योग्य बनाएगा।
उन्होंने कहा कि यदि विश्व वास्तव में सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करना चाहता है तो उसे भारतीय दार्शनिक मूल्यों से प्रेरित विकास एवं अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाना होगा। यही मॉडल वैश्विक समुदाय को सामूहिक कल्याण, पर्यावरणीय संतुलन, सतत विकास तथा स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ा सकता है।
इस अवसर पर कुलपति प्रो. (डॉ.) अजय कुमार ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 भारतीय ज्ञान प्रणाली को उच्च शिक्षा का महत्वपूर्ण आधार मानती है। विश्वविद्यालयों का दायित्व है कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अनुसंधान एवं नवाचार के साथ जोड़ते हुए विद्यार्थियों में मूल्यपरक, उत्तरदायी और वैश्विक दृष्टिकोण विकसित करें। ऐसे कार्यक्रम शिक्षकों और शोधार्थियों को नई दिशा प्रदान करते हैं तथा भारत की ज्ञान परंपरा को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
व्याख्यान के पश्चात प्रतिभागियों एवं संकाय सदस्यों के साथ संवादात्मक प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया, जिसमें भारतीय ज्ञान प्रणाली आधारित प्रबंधन मॉडल, नेतृत्व विकास तथा उच्च शिक्षा में इसके व्यावहारिक अनुप्रयोगों पर सार्थक चर्चा हुई।
अंत में आयोजन समिति की ओर से श्री मोहम्मद सुहैल, संयोजक ने सभी विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों, विश्वविद्यालय प्रशासन एवं आयोजन समिति के सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह संकाय विकास कार्यक्रम भारतीय ज्ञान प्रणाली को आधुनिक शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा तथा प्रतिभागियों को भविष्य उन्मुख शिक्षण एवं नेतृत्व के लिए प्रेरित करेगा।

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